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पुलिस ही हमलावर तो किससे करें उम्मीद: सियाराम पांडेय ‘शांत’
By Swadesh | Publish Date: 15/10/2018 3:17:24 PM
पुलिस ही हमलावर तो किससे करें उम्मीद:  सियाराम पांडेय ‘शांत’

पुलिस से लोगों को बड़ी उम्मीद होती है लेकिन पुलिस की भूमिका ही इन दिनों संदेह के घेरे में हैं। आजकल पुलिस मुंह से नहीं, गोली से बात करती है, यह बात हर आम और खास के दिमाग में हैं। पुलिस के व्यवहार में आया यह बदलाव अपने आप में रहस्य है, जिसका भेदन अभी किया नहीं जा सका है। मनोवैज्ञानिक जांच के बगैर सत्य सामने नहीं आने वाला, लेकिन पुलिस है कि कयासों में ही दिन काटे जा रही है। पुलिस जिस तरह के अपराध कर रही है, उससे यह तो लगता है कि पुलिस मनोवैज्ञानिक दबाव में हैं। बड़े तनाव में है। गहरे अवसाद में है। गुड़गांव के सेक्टर 49 स्थित आर्केडिया मार्केट में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश श्रीकांत शर्मा के गनर महिपाल ने उनकी पत्नी और बेटे को दिनदहाड़े गोली मार दी। पत्नी को लात से ठोकर मारी और बेटे को घसीटकर जज की सरकारी गाड़ी में लादने की कोशिश की। भीड़ बढ़ती देख उसे गाड़ी लेकर अकेले ही भागना पड़ा। दोनों को मेदांता अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां पत्नी का निधन हो गया और बेटे की हालत गंभीर बनी हुई थी। भले ही गनर महिपाल को गिरफ्तार कर लिया गया है लेकिन इस घटना ने पुलिस की भूमिका पर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं।

 
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनउ के गोमती नगर थाना क्षेत्र में गत दिनों दो पुलिसकर्मियों ने एक निजी कंपनी के मैनेजर विवेक तिवारी की गोली मारकर हत्या कर दी थी। घटना तब हुई थी जब वे अपनी महिला मित्र सना खान के साथ देर रात घर लौट रहे थे। इस घटना की जमकर आलोचना हुई थी। सभी विरोधी दलों ने इस घटना को लेकर योगी आदित्यनाथ सरकार की जमकर लानत-मलामत की थी। विवेक तिवारी के त्रयोदशाह के दिन उपमुख्यमंत्री, मंत्री, महापौर और नगर निगम के अधिकारी ने जिस तरह विवेक तिवारी के घर जाकर उनकी पत्नी को नियुक्ति पत्र सौंपा, उस पर भी सवाल उठाए जाने लगे हैं। कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या सरकार ऐसा ही सम्मान अन्य लोगों को भी देगी। कुछ लोग इसे चुनावी चश्मे से भी देखने लगे हैं। हर घटना के दो पहलू हैं। कल तक जो लोग मुख्यमंत्री के विवेक तिवारी के घर न जाने पर सवाल उठा रहे थे, अब उन्हें इस बात पर एतराज है कि आर्थिक अनुदान के साथ, नौकरी देना तो ठीक है लेकिन सरकार अतिशय सम्मान दे, यह ठीक नहीं है। विपक्ष को अपना स्टैंड तो स्पष्ट करना ही चाहिए। चित भी अपनी और पट भी अपनी का सिद्धांत ठीक नहीं है। 
 
जिस महिला से उसका पति छिन गया हो, जिन बच्चों के सिर से उनके पिता का साया उठ गया हो, उनके साथ सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार वक्त की जरूरत है। दूसरी ओर अपने साथी को बचाने के लिए पुलिस बगावत कर रही है। काला फीता बांध रही है। सोशल मीडिया पर पोस्ट कर रही है। आरोपित सिपाही की पत्नी के बैंक अकाउंट में पैसे डाले जा रहे हैं,यह सब क्या है। चोरी और सीनाजोरी, लेकिन किसी भी विपक्षी दल ने इस पर मुंह खोलना उचित नहीं समझा। मानवाधिकार पुलिस वाले का भी होता है। अपने देश में आम आदमी का मौलिक अधिकार भले ही चूल्हे भाड़ में चला जाए लेकिन अपराधियों के मौलिक अधिकार सुरक्षित रखने की हर संभव कोशिश होती है। पहली बार किसी को आंसू सूखने से पहले ही बिना किसी दौड़ भाग के नौकरी मिली है तो इस संदर्भ में भी विचार होना चाहिए। सरकार का मानवीय पक्ष भी देखा जाना चाहिए। 
 
सवाल उठता है कि क्या पुलिस इतनी निरंकुश हो गई है कि उसे अपने हितों के अलावा जनता की सुरक्षा की चिंता नहीं है। न्यायाधीश तो सभी के मानवाधिकारों की चिंता करते हैं तो उनकी पत्नी और बेटे को गोली मारने का क्या औचित्य था? इतना ही नहीं, गोली मारने के बाद आरोपित ने जज को फोन पर इत्तिला भी दी कि तुम्हारे बीवी-बच्चों को मैंने गोली मार दी है,उन्हें जाकर देख लो। यह परले सिरे की बदमाशी है। उच्च कोटि का अपराध है। इसकी जितनी भी निंदा की जाए, कम है। गुड़गांव में हुई घटना के पीछे तर्क दिया गया है कि छुट्टी न मिलने से गनर महिपाल तनाव में था। तनाव किसे नहीं होता। इसका मतलब यह नहीं कि तनाव हो तो किसी को भी गोली मार दी जाए। पुलिस आज आक्रामक, अराजक और बगावती तेवर क्यों अपना रही है? इन सवालों के जवाब तो इस देश को मिलने ही चाहिए। रही बात आलोचना की तो विपक्ष को सरकार की आलोचना का पूरा हक है। वह कह सकती है कि यूपी या हरियाणा पुलिस को मनबढ़ किसने बनाया है? अपराध उन्मूलन के लिए पुलिस को खुली छूट देना तो ठीक है लेकिन उस पर प्रभावी नियंत्रण भी बनाए रखना होगा। इसमें संदेह नहीं कि पुलिस वालों को विपरीत परिस्थितियों में काम करना पड़ता है। वे अपनी मौजूदा स्थिति से खुश नहीं है। अवकाश हर व्यक्ति की जरूरत है चाहे वह सरकारी क्षेत्र में काम कर रहा हो या निजी, पारिवारिक काम होते हैं, सामाजिक काम होते हैं, उनके उपर बैठे अधिकारियों को स्वविवेक से निर्णय लेना चाहिए। 
 
पुलिस आम जन का विश्वास भी है क्योंकि जब कभी भी संकट पड़ता है तो भुक्तभोगी की नजर सबसे पहले पुलिस पर ही जाती है। चोरी, डकैती हो, छिनैती हो या हत्या, लोग फरियाद लेकर पुलिस के ही पास जाते हैं। अगर पुलिस वाले ही गोली मारने लगेंगे तो क्या होगा? उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक ओमप्रकाश सिंह ने कहा था कि विवेक तिवारी को गोली मारने वाले पुलिस के ब्रांड अंबेसडर नहीं हैं। शायद हरियाणा पुलिस के ममहानिदेशक भी ऐसा ही कुछ कहें लेकिन बड़ा सवाल यह है कि पुलिस विभाग का ब्रांड अंबेसडर कौन है? बड़े पुलिस वाले फर्जी एनकाउंटर कर रहे हैं और छोटे वाले वसूली। सड़कों पर जिधर भी नजर दौड़ाओ, कोई न कोई पुलिस वाला वसूली करता दिख जाएगा। बताते हैं कि इस वसूली के पैसे अकेले उसकी जेब में नहीं रहते, उपर तक जाते हैं। थाने बिकते हैं। कौन बेचता है? थानों में कारखास कौन रखता है, क्या करते हैं ये कारखास, यह जांच का विषय है। 
 
देश को भ्रष्टाचार मुक्त कराना है तो कार्रवाई बड़े स्तर से शुरू करनी होगी। इस समस्या की जड़ें काफी गहरी हो चुकी हैं। अवैध कमाई से मिलने वाला पैसा आंखों में खुशी की चमक तो देता है लेकिन दिमाग में तनाव भी पैदा करता है। इस बात को सलीके से समझना होगा। जब जज और उनके परिवार तक सुरक्षित नहीं हैं तो आम आदमी की सुरक्षा की कल्पना ही क्या की जाए? इंदिरा गांधी को गोली उन्हीं के अपने गार्डों ने मार दी थी। जज की पत्नी और बेटे को गोली भी उनके गार्ड ने ही मारी है। यह सिलसिला चलता रहा तो लोग गनर रखना बंद कर देंगे। बहुत सारे लोगों ने अपने खर्च पर गार्ड रख लिए हैं। पुलिस पर उनका कभी भरोसा ही नहीं रहा, वजह चाहे जो भी हो लेकिन इससे विपक्ष को सरकार के खिलाफ विरोध-विरोध खेलने का मौका तो मिलता ही है। अब भी समय है जब सरकारों को पुलिसकर्मियों का समय-समय पर मनोवैज्ञानिक परीक्षण कराना चाहिए। पुलिस जनता के लिए सिरदर्द बनेगी तो जनता पुलिस और सरकार के खिलाफ हो सकती है। 
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