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बना है मंदिर निर्माण की प्रक्रिया तय करने का माहौल : सिद्धार्थ शंकर गौतम
By Swadesh | Publish Date: 3/12/2018 1:09:39 PM
बना है मंदिर निर्माण की प्रक्रिया तय करने का माहौल : सिद्धार्थ शंकर गौतम

अयोध्या में इस बार देश भर से आये हुए साधु- सन्यासियों की धर्मसभा हुई तो इसके साथ ही एक विशेष दृश्य देश-दुनिया ने 36 घंटे से अधिक समय तक लगातार देखा। 15 मार्च, 2002 के शिलादान कार्यक्रम के बाद यह पहला मौका था, जब अयोध्या में भारी भीड़ जुटी। हालांकि इस बार ''रामलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे'' की जगह ''हर हिंदू की यही पुकार, पहले मंदिर फिर सरकार'' के नारे ने केंद्र सरकार की पेशानी पर बल तो डाल दिए हैं। ''राज तिलक की करो तैयारी, आ रहे हैं भगवाधारी'' का नारा लगाते हुए हिन्दू समाज के लोग सिर्फ यही सोच रहे थे कि जब कांग्रेस की सरकार थी और मंदिर नहीं बनने दे रही थी तब तक तो बात समझ में आती थी, लेकिन अब तो भाजपा की सरकार है। फिर भी फैसले कांग्रेस ले रही है क्या? यहाँ तक कि सर्वोच्च न्यायालय की इस मुद्दे पर की गई ढिलाई ने भी हिन्दू जनमानस को भीतर तक झकझोर दिया। केंद्र सरकार की अपनी जो भी मजबूरियां हों, किन्तु अब दबाव निश्चित रूप से सियासी से अधिक भावनात्मक हो चला है। हिन्दू समाज अपने आराध्य का भव्य मंदिर देखना चाहता है।
 
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े अनुषांगिक संगठनों ने मंदिर निर्माण को लेकर जनमानस की चाह से सरकार को अवगत करा दिया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा राम मंदिर निर्माण के प्रयास तो उसी दिन से तेज हो गए थे, जिस दिन राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में सरसंघचालक मोहन भागवत ने 'भविष्य का भारत'' व्याख्यानमाला में राम मंदिर को हिन्दू अस्मिता का केंद्र बताते हुए इसके शीघ्र निर्माण पर जोर दिया था। राम मंदिर से जुड़ा मामला भले ही देश के सर्वोच्च न्यायालय में हो किन्तु इस देश की बहुसंख्यक आबादी के मनोभाव को नजरअंदाज करना कहीं से भी न्यायोचित नहीं है। मुस्लिम समुदाय का एक धड़ा भी राम मंदिर के निर्माण हेतु तैयार है किन्तु आम सहमति जैसी बात अभी तक सामने नहीं आई है। 
हालांकि केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी का मानना है कि इस मुद्दे पर वह सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का सम्मान करेगी। चूंकि राम मंदिर मुद्दा भाजपा समेत अन्य हिंदूवादी राजनीतिक दलों के लिए सियासी खाद-पानी का कार्य करता है, अतः इस पर राजनीति होना स्वाभाविक भी है। बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी से लेकर राजद नेता शिवानंद तिवारी के जहर भरे बयानों ने सियासी उबाल ला दिया है। इससे चुनाव के दौरान वोटों का ध्रुवीकरण तो होगा ही, हिन्दू-मुस्लिम हितैषी दिखने-दिखलाने की होड़ भी शुरू हो जायेगी। वैसे यह स्थिति भाजपा के लिए मुफीद होगी किन्तु अब हिन्दू जनमानस को राम मंदिर के नाम पर भरमाकर लम्बे समय तक राजनीति नहीं की जा सकती है। अब अयोध्या के राम मंदिर विवाद में काशी-मथुरा की भी एंट्री हो गई है। धर्मसभा की अध्यक्षता कर रहे स्वामी परमानन्द सरस्वती ने मुस्लिम पक्षकारों को आगाह किया कि राम जन्मभूमि स्वेच्छा से हिंदुओं को दे दें। अगर अध्यादेश लाना पड़ा तो मथुरा-काशी और हजारों अन्य मंदिरों के लिए भी यही प्रक्रिया शुरू होगी। वहीं संतों ने राम मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले में देरी पर नाराजगी जताई। उन्होंने एक स्वर में कहा कि राजनीति से प्रेरित कुछ हिन्दू ही सर्वोच्च न्यायालय में यह दलील दे रहे हैं कि राम मंदिर पर सुनवाई 2019 में हो। वह नहीं चाहते हैं कि अयोध्या में राम का भव्य मंदिर बने।
 
राम मंदिर निर्माण पर चर्चा के दौरान बहुत से लोगों का कहना था कि उन्होंने 1992 के आंदोलन को तो नहीं देखा लेकिन श्रीराम के बारे में बहुत कुछ सुना और पढ़ा है। अयोध्या में मंदिर निर्माण को लेकर उनका मत स्पष्ट है कि वहां मंदिर ही बनना चाहिए। यदि कोई इस बात पर रोता है कि ‘बाबरी मस्जिद’ को गिराया जाना गलत था तो उसे गुलामी की मानसिकता से ग्रसित मूर्ख से अधिक कुछ नहीं कहा जा सकता। एक लुटेरे, आक्रांता और भारतीय सहिष्णुता के विनाशक के नाम पर बनी एक इमारत को बचाये रखने का भाव कहां से उचित कहा जा सकता है। 
 
ज्ञातव्य है कि 24-25 नवम्बर को शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे भी सपरिवार अयोध्या पहुंचे थे। उन्होंने केंद्र सरकार के विरुद्ध मोर्चा खोलते हुए जल्द राम मंदिर निर्माण की मांग रख दी। उन्होंने कहा कि ये सरकार मज़बूत है अगर ये नहीं बनाएगी तो कौन बनाएगा? अगर ये सरकार मंदिर नहीं बनाएगी तो मंदिर तो जरूर बनेगा लेकिन शायद ये सरकार नहीं रहेगी। उन्होंने यह भी कहा कि इस मुद्दे पर भाजपा बिल या अध्यादेश लाए तो शिवसेना इसका समर्थन जरूर करेगी। आखिर महाराष्ट्र की राजनीति में भाजपा की सहयोगी पार्टी के रूप में कार्य करते-करते अचानक शिवसेना को राम मंदिर निर्माण में इतनी दिलचस्पी क्यों हुई?
 
दरअसल, बाल ठाकरे के अवसान और राज ठाकरे के साथ छोड़ जाने से शिवसेना महाराष्ट्र में कमजोर हुई ही है। वहीं राज्य के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में ओवैसी की आमद ने भी शिवसेना की हिंदुत्ववादी छवि को कमजोर किया है। फिर राम मंदिर मुद्दे को भुनाने से शिवसेना को दोहरा फायदा मिलता दिख रहा है। अव्वल तो पार्टी हिंदुत्व पर एकाधिकार के निकट पहुंचेगी, दूसरा उत्तर भारतियों में आतंक का पर्याय बनी अपनी छवि को भी राम मंदिर के नाम से धोने के साथ ही अपनी पकड़ भी मजबूत करेगी। वह उत्तर प्रदेश को केंद्र में रखकर अपने संगठन को नए सिरे से खड़ा करने की भी तैयारी में है। यदि राम मंदिर का मुद्दा भाजपा की झोली से निकलकर शिवसेना की झोली में आया तो महाराष्ट्र ही नहीं, पूरे देश में एक नई राजनीतिक शक्ति का उदय हो सकता है। यह भी तथ्य है कि विवादित ढांचा गिराने में शिवसेना अपनी भूमिका से कभी इंकार नहीं करती, बल्कि पार्टी के तमाम नेतागण विवादित ढांचा गिराने में अपनी भूमिका को बड़े गर्व से बताते हैं। 2019 की शुरुआत में लोकसभा चुनाव और फिर सितंबर माह में महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में शिवसेना हिंदुत्व की आड़ में राम मंदिर निर्माण के मुद्दे को अपने पक्ष में भुनाने का भरसक प्रयास करेगी और यही कारण है कि यह मुद्दा उसके भविष्य के लिए अति-आवश्यक है।
 
देखा जाए तो अयोध्या के साधु-संत राम मंदिर निर्माण को अवश्यम्भावी तो बताते हैं किन्तु वे यह भी कहते हैं कि अयोध्या के अन्य मंदिरों का भी जीर्णोद्धार हो। उनके मुताबिक अयोध्या में तकरीबन 5 हजार से ज्यादा मंदिर हैं। इनमें मुख्य रामजन्मभूमि, हनुमानगढ़ी, कनक भवन, नागेश्वर नाथ, जानकी घाट, लक्ष्मण किला, अशर्फी भवन, त्रिदंडी देव जैसे मंदिर शामिल हैं। सरकारी आंकड़ों में तकरीबन 182 मंदिर जर्जर हालत में हैं जबकि वास्तविकता में जर्जर मंदिरों की संख्या लगभग 500 के ऊपर है। अफसर अपनी कुर्सी बचाने के लिए आंकड़ों में खेल करते हैं। अयोध्या में राम मंदिर के साथ ही विकास की बात पर वहां के निवासी योगी सरकार से खासी उम्मीदें रख रहे हैं। मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी ने गोरखपुर के बाद सबसे अधिक अयोध्या के दौरे ही किये हैं। ऐसे में राम मंदिर के समानांतर विकास को लेकर भी उन्हें उम्मीद की किरण दिखाई देती है। अयोध्या में राम मंदिर बनेगा, यह तो तय है। बस उसकी प्रक्रिया का मार्ग कानूनी होगा
या जनसमर्थन, यह जल्द ही तय हो जाएगा।
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