धर्म
रात से सुबह तक दशामाता पूजन का दौर
By Swadesh | Publish Date: 30/3/2019 10:37:04 AM
रात से सुबह तक दशामाता पूजन का दौर

उदयपुर। घर-परिवार में सुख-समृद्धि की कामना को लेकर किए जाने वाले दशामाता व्रत की पूर्णता चैत्र कृष्णा दशमी पर शनिवार को हुई। यह व्रत होली के अगले दिन धुलंडी से शुरू होता है। महिलाएं दशामाता-ड्याढ़ा बावजी की पारम्परिक कथाओं का नियमित श्रवण करती हैं और व्रत रखती हैं। दशमी पर दशामाता पूजन कर माताजी को विविध सामग्री का भोग लगाकर घर-परिवार में सुख समृद्धि की कामना करती हैं। 

दशामाता पूजन का दौर परम्परानुसार नवमी की मध्यरात्रि से शुरू हो जाता है। इसी के तहत शुक्रवार रात को जगह-जगह मोहल्लों में महिलाओं ने रतजगा रखा। माताजी को रिझाने के भजनों का दौर रात भर चला। मध्यरात्रि पश्चात् से ही समीपवर्ती लोक स्थानकों पर लगे पीपल वृक्ष की पूजा का दौर शुरू हो गया। सुहागिन महिलाएं पारम्परिक रूप से लाल चूंदड़-ओढ़नी पहन कर पूजा करने पहुंचीं।शुभ मुहूर्त के अनुसार शनिवार अलसुबह 4.30 से 6 बजे तक और बाद में 7.30 से 9 बजे तक बड़ी संख्या में पूजन करने वाली महिलाओं की भीड़ रही। 
 
पूजा की थाली में आटे के दीपक के साथ दशामाता के शृंगार के लिए विभिन्न आभूषण बना कर सजाए गए। पहली बार दशा माता पूजा कर रही नवविवाहिताओं में काफी उत्साह नजर आया और उन्होंने विधिवत पूजा-अर्चना कर बुजुर्ग महिलाओं से कथा श्रवण किया व उनका आशीर्वाद लिया। घर परिवार और सब तरफ सुख समृद्धि की कामना की गई। व्रतार्थियों के यहां पूजन के बाद विशेष परम्परागत पकवान बनाए गए। पीपल के वृक्ष की परिक्रमा करते हुए महिलाओं ने सूत का धागा पेड़ के चारों तरफ लपेटते हुए सुख समृद्धि एवं गृह दशा सुधारने की माता से कामना की। समूचे उदयपुर अंचल के विभिन्न क्षेत्रों में मुंह अंधेरे से दोपहर तक दशा माता पर्व की धूम रही। 
 
इस पूजन के साथ ही घरों में परम्परागत रूप से नई मटकी भी परिण्डे पर रखी गई। यह गर्मी के मौसम की शुरुआत का संकेत है और शीतल जल की उपलब्धता के लिए नई मटकी रखने की परम्परा के रूप में स्थापित है। मटकी खरीदने के लिए शुक्रवार को उदयपुर के कुम्हारवाड़ा सहित मटकी मिलने वाले सभी स्थानों पर महिलाएं मटकियों को बजा-बजा कर जांच-परखती नजर आईं। सभी की पसंद सर्दी के मौसम में बनाई गई मटकियां थीं। 
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