स्वास्थ्य
सफेद दाग की हर्बल दवा ल्यूकोस्किन मरीजों के लिए बन रही वरदान
By Swadesh | Publish Date: 25/6/2019 12:47:23 PM
सफेद दाग की हर्बल दवा ल्यूकोस्किन मरीजों के लिए बन रही वरदान

नई दिल्ली। देश के प्रमुख रक्षा शोध संगठन ‘डीआरडीओ’ की ओर से विकसित सफेद दाग या श्वित्र की हर्बल दवा ल्यूकोस्किन मरीजों को खूब रास आ रही है। यह इसलिए महत्वपूर्ण है कि भारत में इस बीमारी की वजह से मरीजों को काफी शर्मिंदगी और सामाजिक परेशानी झेलनी पड़ती है।

सफेद दाग की इस दवा ल्यूकोस्किन के लाभ को देखते हुए मोदी सरकार ने इसे विकसित करने वाले डीआरडीओ के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. हेमंत पांडे को पिछले महीने राष्ट्रीय तकनीक दिवस के मौके पर प्रतिष्ठित ‘विज्ञान पुरस्कार’ से सम्मानित किया है।
 
25 जून को दुनिया भर में अंतरराष्ट्रीय वटिलिगो दिवस मनाया जाता है। इस मौके पर डॉ. पांडे ने वैज्ञानिक तरीके से विकसित इस दवा के बारे में विस्तार से बताया। इस दवा को इन दिनों दिल्ली स्थित कंपनी एमिल फार्मा लिमिटेड बना और बेच रही है। डॉ. पांडे इस समय डीआरडीओ की पिथौड़ागढ़ स्थित डिफेंस इंस्टीट्यूट ऑफ बायो एनर्जी रिसर्च (डिबियर) के हर्बल औषधि विभाग के प्रमुख हैं।
 
वे कहते हैं, “इस समय विटिलिगो के कई तरह के इलाज हैं, जिनमें एलोपैथिक दवाएं, ऑपरेशन और मूल उपचार के साथ दी जाने वाली अजंग्टिव थेरेपी शामिल है। लेकिन इस बीमारी के निदान में इनमें से किसी भी उपाय के संतोषजनक नतीजे नहीं आ रहे हैं।”
 
हर्बल औषधि के क्षेत्र में अपने योगदान के लिए विभिन्न प्रतिष्ठित पुरस्कार हासिल कर चुके ये वैज्ञानिक कहते हैं, “साथ ही ये इलाज या तो बहुत महंगे हैं या एकल अणुकणिका (सिंगल मोलिक्यूल) आधारित हैं, जिनका लाभ बहुत कम होता है और साथ ही जिसके साइड इफेक्ट भी होते हैं। इनकी वजह से मरीजों को फुंसी, फोड़े, सूजन, त्वचा में जलन आदि होने लगती है। इस वजह से अधिकांश मामलों में मरीज इनका सेवन रोक देते हैं।” डॉ. पांडे को ल्यूकोस्किन विकसित करने के लिए वर्ष 2015 में एग्री-इनोवेशन पुरस्कार भी मिल चुका है।
 
डॉ. पांडे कहते हैं, “इसलिए हमने इस बीमारी के कारणों पर ध्यान केंद्रित किया और सफेद दाग, या विटिलिगो या ल्यूकोडर्मा के प्रबंधन का एक व्यापक फार्मूला विकसित किया। इस सघन वैज्ञानिक अध्ययन के लिए हमने हिमालय में पाई जाने वाली जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल किया।” ल्यूकोस्किन मलहम और मुंह से ली जाने वाली ओरल लिक्विड दोनों ही स्वरूप में उपलब्ध है।
 
इसी तरह आयुर्वेद की विशेषज्ञ डॉ. नीतिका कोहली कहती हैं, “मलहम में सात जड़ी-बूटियों का उपयोग किया गया है। इनमें स्किन फोटो सेंसिटाइजर, फोड़े-फूंसी रोधक, जलन और खुजली रोधक, रोगाणु रोधक, जख्म भरने वाले और कॉपर सप्लिमेंटिंग तत्व शामिल है। इसी तरह ओरल दवा को इस तरह विकसित किया गया है कि नए चकते (स्पॉट) ना बनें।”
 
सफेद दाग ना तो संक्रामक है और ना ही इससे जान को कोई खतरा होता है। डॉ. पांडे इसके बारे में बताते हैं, “दुनिया भर में 1 से 2 फीसदी लोगों को ही सफेद दाग होता है। लेकिन भारत में यह 4 से 5 फीसदी लोगों को हो रहा है। राजस्थान और गुजरात के कुछ हिस्सों में तो 5 से 8 फीसदी लोग इससे प्रभावित हो रहे हैं। भारत में इस त्वचा रोग को ले कर लोगों को समाज में बहुत परेशानी झेलनी होती है, क्योंकि अक्सर लोग इसे कुष्ठ रोग समझ लेते हैं जो जीवाणु संक्रमण (बैक्टेरियल इंफैक्शन) है।”
 
यह ऑटो इम्यून बीमारी है जिसमें शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता गलती से खुद के शरीर पर ही हमला कर देती है। इससे पूरे जीवन पर गंभीर असर पड़ सकता है। कुछ लोगों में इससे आत्मविश्वास में गंभीर कमी आ जाती है और वे गंभीर अवसाद में चले जाते हैं। इन्हीं वजहों को देखते हुए डॉ. पांडे ने ल्यूकोस्किन दवा विकसित करने के बाद भी इसे और बेहतर करने में जुटे रहे। वे बताते हैं कि अब जल्दी ही इसका विकसित संस्करण भी बाजार में उपलब्ध हो जाएगा।
COPYRIGHT @ 2018 SWADESH. ALL RIGHT RESERVED.DESIGN & DEVELOPED BY: 4C PLUS