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कोलकाता कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला- दुष्कर्म के दोषी नाबालिग को 20 वर्ष की सजा
By Swadesh | Publish Date: 11/7/2019 10:45:22 AM
कोलकाता कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला- दुष्कर्म के दोषी नाबालिग को 20 वर्ष की सजा

कोलकाता। अमूमन नाबालिग अपराधियों को सुधार गृह में भेजने की रीति को दरकिनार करते हुए कोलकाता की एक अदालत ने दुष्कर्म के दोषी नाबालिग को 20 साल की सजा सुनाई है। खास बात यह है कि इसी साल मार्च के प्रथम सप्ताह में शिकायत दर्ज कराई गई थी और महज चार महीने के भीतर कोर्ट ने कानूनी प्रक्रिया पूरी करते हुए दोषी को सजा सुना दी। कोलकाता पुलिस की ओर से बुधवार को इस बारे में विज्ञप्ति जारी कर जानकारी दी गई है। 

विज्ञप्ति के मुताबिक उल्टाडांगा थाने में 16 साल की पीड़ित नाबालिग ने इसी साल तीन मार्च को दुष्कर्म की शिकायत दर्ज कराई थी। उसने अपने पड़ोसी 17 वर्षीय अक्षय कुमार सिंह के खिलाफ शिकायत दर्ज करायी थी कि लगातार दुष्कर्म की वजह से वह गर्भवती हुई है। शिकायत दर्ज करने के बाद पुलिस ने मेडिकल जांच कराई थी जिसमें आरोपों की पुष्टि होने के तुरंत बाद तेजी से जांच प्रक्रिया पूरी की गई।  
 
सियालदह कोर्ट के अपर सत्र न्यायाधीश जे.बी. बिस्वास ने आरोपित को दोषी ठहराते हुए 20 वर्ष जेल की सजा सुनाई। उस पर दो लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है। जुर्माने का 90 फ़ीसदी हिस्सा पीड़ित को दिया जाएगा। इसके अलावा राज्य सरकार की ओर से भी पीड़ित को पांच लाख की आर्थिक मदद देने का निर्देश कोर्ट ने दिया है। 
 
न्यायाधीश ने मामले की जांच करने वाले अधिकारी को भी फटकार लगाई। उन्होंने कहा कि अगर कोर्ट और विशेष लोक अभियोजक विवेक शर्मा मामले की तह तक नहीं गए होते तो आरोपित के खिलाफ जल्द कार्रवाई नहीं हो पाती। दरअसल कोर्ट ने प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेस एक्ट (पॉक्सो एक्ट) की धारा 2012 के तहत कार्रवाई करते हुए 20 साल की सजायी। पुलिस ने पॉक्सो एक्ट की धारा-4 के तहत केस दर्ज किया था। इसमें सजा कम है और दोषी को सुधार गृह में भेजना पड़ता है। बाद में अभियोजक विवेक शर्मा मामले की तह तक गए।
 
उन्होंने आईपीसी के अलावा पॉक्सो एक्ट की धारा-6 के तहत मामला दर्ज कर कानूनी कार्रवाई आगे बढ़ाने की प्रक्रिया शुरू की। इसकी वजह से दोषी के खिलाफ ठोस कार्रवाई हो सकी है। न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी निर्देश दिया कि फैसले की प्रति कोलकाता पुलिस के संयुक्त आयुक्त (अपराध) को भेजी जाए ताकि वह जांच में लापरवाही बरतने वाले अधिकारी के खिलाफ संज्ञान ले सकें।
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