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कोरोना जन-जन का संकट बन चुका है, आज आवश्यकता है सिर्फ एकजुटता की

कोरोना जन-जन का संकट बन चुका है, आज आवश्यकता है सिर्फ एकजुटता की

नियति की नीयत को कोई नहीं जानता। आने वाली विपदा के बारे में भी यही कहा जा सकता है। कोरोना वैश्विक महामारी है। सिर्फ भारत नहीं विश्व के लगभग 190 देश इसकी चपेट में है। उन देशों में भारत भी है जो कोरोना की वैश्विक आपदा से जूझ रहा है। यह संकट किसी के द्वारा लाया नहीं गया है, बल्कि स्वत: आया है। इसे ही प्रकृति प्रदत्त प्रकोप कहते हैं। आजादी के बाद भारत ने ऐसी किसी विकट विपदा का कभी सामना नहीं किया। ऐसे वैश्विक संकट में भारत की राष्ट्र के नाते बड़ी भूमिका हो गई है। कोरोना जन-जन का संकट बन चुका है। अच्छी बात यह है कि जन-जन के इस संकट से लडऩे के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश का जन-जन अपने-अपने स्थान पर खड़ा हो गया है।

हम घोषित रूप से भाजपा के कार्यकर्ता हैं। हमारा विरोधियों से वैचारिक विरोध और विरोधियों का हमसे वैचारिक विरोध सदैव है और रहेगा। पर राष्ट्र जीवन में कभी-कभी ऐसा काल आता है जब राष्ट्र के लिए सबको अपने-अपने विचारों को तिलांजलि देकर राष्ट्रध्वज तिरंगे के सम्मान में और जनार्दन रूपी जनता के साथ होकर एक साथ खड़ा होना पड़ता है। यह समय ऐसा ही है। मुझे यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि भारत में जो लोग नित्य दो-जून की रोटी के लिए कमाते हैं उनकी समझ में तो वर्तमान में आयी राष्ट्रीय विपदा समझ में आ रही है, पर अंग्रेजों से लडऩे वाली कांग्रेस पार्टी को और उनके नेताओं को पता नहीं यह बात समझ में क्यों नहीं आ रही?

जिंदगी गरीब और अमीर हो सकती है। पर हर किसी की जिंदगी, जिंदगी होती है। एक अमीर की सांस का महत्व परिवार में जो होता है, उससे कहीं अधिक एक गरीब की सांस का महत्व उसके परिवार के लिए होता है। हम मनुष्य हैं। मनुष्य हैं तो विचार करेंगे। विचार करेंगे तो तुलना भी होगी। आकलन भी होगा और समीक्षा भी करेंगे। सिर्फ मैं नहीं, पूरे देश की 130 करोड़ जनता अपनी सूक्ष्म दृष्टि से राष्ट्र जीवन के संकट के दौरान सभी राजनीतिक दलों को पैनी निगाह की नजरों से देख रही है। आज मैं जब तुलना करता हूं, मन में सहसा विचार आता है कि संगठन क्यों होता है? उसमें भी कार्यकर्ता आधारित संगठन का महत्व क्यों हो जाता है? एक कदम आगे जायें, उस संगठन का महत्व और बढ़ जाता है जिसकी नीचे तक संगठनात्मक संरचना होती है। कहने को कांग्रेस सवा सौ साल से अधिक पुरानी पार्टी है। वर्षों तक भारत में उनका शासन रहा। पर दिक्कत यह रही कि जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी ने कांग्रेस को कभी भी परिवार से बाहर नहीं आने दिया। अत: धीरे-धीरे देश में उनकी संगठनात्मक संरचना समाप्त हो गई।

कांग्रेस आज विरोध के लिए विरोध करने वाली राजनीतिक पार्टी बनकर रह गई है। किसी भी दल में पार्टी से बड़ा नेता नहीं हो सकता। इसका ताजा उदारण हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो अपने हर संगठनात्मक भाषण में एक ही बात कहते हैं, 'नरेंद्र मोदी की क्या हैसियत है, यह तो भारतीय जनता पार्टी है जिसने देश के प्रधानमंत्री पद पर लाकर खड़ा कर दिया। क्या आज कांग्रेस की सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी यह कहने की हिम्मत रखते हैं ? अगर वे कहेंगे भी तो यह कहेंगे आज कांग्रेस जहां भी है नेहरू जी, इंदिरा जी, राजीव जी, सोनिया जी ,राहुल जी और प्रियंका जी के कारण है । यह मूल अंतर है भाजपा और कांग्रेस में। कांग्रेस परिवार आधारित पार्टी है और भाजपा कार्यकर्ता आधारित। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना से निपटने के लिए जनता कफ्र्यू लगाया और कोरोना के संकट को देखते हुए 24 मार्च रात्रि 12 बजे से 14 अप्रैल तक लॉकडाउन की घोषणा की। यह घोषणा देशहित में थी, दलहित में नहीं। जब देश की बात आती है तो उसमें सभी दल , संस्थाएं व एक-एक नागरिक समर्पित हो जाता है। अटल जी कहा करते थे कि जब देश संकट में हो तो विचारधारा को चादर से ढ़ककर राष्ट्रधारा के साथ एक साथ खड़े हो जाना चाहिए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जहां राष्ट्रहित में अपने मंत्रिमंडल के सहयोगियों और राज्यों के मुख्यमंत्री के साथ संपर्क कर जनहित में फैसले ले रहे हैं, वहीं भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा जी देश के बूथ कार्यकर्ताओं से संपर्क कर एवं उन्हें जन सेवा में लगाकर राष्ट्रीय संकट से निपटने में अपनी भूमिका अदा कर रहे हैं। भाजपा के लाखों कार्यकर्ता चरणबद्ध और समयबद्ध कार्यक्रम के तहत अनुशासन और सामाजिक दूरी के साथ समाज के बीच जो काम कर रहे हैं, वह सदैव स्मरणीय रखा जाएगा। प्रधानमंत्री जी ने आह्वान किया कि घड़ा-घंटी, शंख बजाकर, ताली पिटकर अपने-अपने घरों में उन सभी को सम्मान दें जो अपनी जान जोखिम में डालकर राष्ट्र में लोगों की जिंदगी बचाने में लगे हैं। भाजपा ने इस कार्यक्रम को अपनी संगठनात्मक व्यवस्थाओं के तहत शहर से लेकर गांव तक सफल बनाया, वहीं कांग्रेस ने अपने कार्यकर्ताओं को तो छोडिय़े, जनता से अपील तक नहीं की।

लोकतंत्र में दो पहिए होते हैं, एक सत्ता और दूसरा विपक्ष। सत्ता अपने सत्कार्यों से जन-जन में अपना स्थान बनाए रखना चाहता है और विपक्ष की भूमिका राष्ट्रप्रहरी के रूप में सत्ता निर्णय पर पैनी निगाह रखती है। हम सब जानते हैं, स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी ने विपक्ष के नेता के नाते न केवल भारत में बल्कि जन-जन के मन में स्थान बनाया। अटल जी ने कभी प्रधानमंत्री बनने की बात नहीं सोची पर देश की जनता ने उनके बारे में अपना मन बनाया कि उन्हें आज नहीं तो कल प्रधानमंत्री बनना चाहिए। आज देश में अटल जी और आडवाणी जी की तरह प्रतिपक्ष की जरूरत है जो राष्ट्रीय संकट में यह नहीं देखते थे कि केंद्र और राज्य में किसकी सरकार है। वे सिर्फ यह देखते थे कि मां भारती का हित किसमें है। आज भाजपा में भी यह भावना आनी चाहिए थी कि कांग्रेस समाप्त हो जाए,लेकिन हम लोकतंत्र को जीवंत रखना चाहते हैं। लोकतंत्र को कायम रखने के लिए विपक्ष भी कायम रहना चाहिए। काश! कांग्रेस सहित जो भी विपक्षी दल है; उन्हें भी यह समझ में आ जाए।

- प्रभात झा, सांसद एवं राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भाजपा

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