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यह कमलनाथ और उनकी सरकार की पराजय !

यह कमलनाथ और उनकी सरकार की पराजय !

मध्यप्रदेश में 15 वर्ष के अंतराल के बाद बनी कांग्रेस सरकार बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने वाली घटना थी। अल्पमत में होने के बाद भी बहुमत का जुगाड़ कर श्री कमलनाथ के नेतृत्व में तकनीकी रूप से कांग्रेस सरकार तो बन गई किन्तु इसे न तो जनता का समर्थन प्राप्त था और न ही यह वास्तव में कांगे्रस की सरकार थी, यह श्री दिग्विजय सिंह गुट के रणनीतिक समर्थन से बनी मुख्यमंत्री कमलनाथ की सरकार थी। यद्यपि चुनाव से पहले वे प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष थे, अत: चुनाव में मिली जीत को उनके नेतृत्व में मिली जीत जताया और प्रचारित किया गया, किन्तु वास्तविकता यह थी कि यह जीत श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की ही जीत थी, ग्वालियर संभाग में कांग्रेस को इस बार जैसी सफलता मिली थी, वैसी तो कभी उनके स्वर्गीय पिता श्री माधवराव सिंधिया के होते हुए भी नहीं मिली थी, और उनकी इस सफलता ने ही प्रदेश में कांग्रेस की सरकार का मार्ग प्रशस्त किया। परन्तु एक बार सरकार बन जाने के पश्चात औपचारिकता पूरी करने के लिए, या केवल दिखावे के लिए उन्हें भले ही महत्व दिया गया हो, किन्तु वास्तव में तो उन्हें उनको औकात दिखाने की कोशिश ही अधिक हुई। लोकसभा चुनाव में आश्चर्यजनक रूप से असफल होने के बाद तो इस प्रवृत्ति का चरम ही दिखाई दिया। ठोकर मारने पर तो पैरों की निर्जीव धूल भी उड़ कर, सिर पर जा पहुंचती है, यहां तो मध्यप्रदेश की राजनीति के सर्वाधिक प्रभावशाली सिंधिया परिवार का प्रमुख था, वह इसे कैसे और कब तक बर्दाश्त करता?

श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया द्वारा भाजपा में सम्मिलित होने का निर्णय करने के बाद श्री राहुल गांधी ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा था कि ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस के एक मात्र ऐसे नेता थे जो किसी भी समय उनके घर में प्रवेश कर सकते थे, परन्तु क्या यह हास्यास्पद नहीं है कि प्रदेश की कमलनाथ सरकार अपने 15 महीने के शासन में उन्हें भोपाल में एक घर भी नहीं दे सकी? उन्हें प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष भी इसीलिए नहीं बनने दिया गया, क्योंकि उसके बाद वे नियमानुसार भोपाल में एक शासकीय आवास के अधिकारी बन जाते। परन्तु न तो कमलनाथ चाहते थे कि भोपाल श्री सिंधिया की गतिविधियों का केन्द्र बने, और न ही कांगे्रस का वह 'हाथ' ही चाहता था, जिनकी अंगुलियों पर कमलनाथ सरकार कठपुतली की तरह नाचती थी।

कमलनाथ को वास्तव में प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष श्री सिंधिया को रोकने के लिए ही बनाया गया था, अन्यथा भाजपा तो पहले दिन से ही मान कर चली थी, कि उसे श्री सिंधिया का ही सामना करना है, क्योंकि एक वे ही थे जो अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण भाजपा को नुकसान पहुंचा सकते थे, वह उन्होंने पहुंचायी भी, अन्यथा चाहे श्री कमलनाथ हो या श्री दिग्विजय सिंह इनके जनाधार को लेकर भाजपा में कोई भ्रम नहीं था। इसलिए अपनी सरकार बनने के बाद श्री कमलनाथ की प्रमुख चिन्ता श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को रोकने की ही अधिक रही। उन्होंने सरकार कैसी चलायी इस पर अब किसी प्रकार की टिप्पणी कोई अर्थ नहीं रखती, क्योंकि यदि वह ठीक तरह से चलाई होती तो यह नौबत ही नहीं आती। गत 15 दिनों से अपनी सरकार की मजबूती को लेकर मुख्यमंत्री और अन्य नेता बिना पानी के बादल की तरह गरज रहे थे। यह अच्छी तरह जानते हुए भी कि उनकी सरकार बहुमत खो चुकी है वे इस तरह फैसले ले रहे थे, जैसे उन्हें दो-तिहाई बहुमत हासिल होने वाला है। किन्तु सर्वोच्च न्यायालय के दो टूक फैसले ने, बुुझने से पहले भभकते उनकी सरकार के दीये को ठंडा कर दिया और वे न जाने किस नैतिकता की दुहाई देते हुए, विधानसभा में बहुमत सिद्ध करने के स्थान पर, राज्यपाल को अपनी सरकार का इस्तीफा सौंपने चले गये।

कमलनाथ सरकार के पतन से उनका तो क्या बिगड़ेगा, क्योंकि वे अपने राजनैतिक जीवन की संभवत: अंतिम पारी ही खेल रहे हैं, परन्तु उन्होंने प्रदेश के उन असंख्य कांगे्रस कार्यकर्ताओं के परिश्रम और उम्मीदों पर पानी जरूर फेर दिया है, जिन्होंने विगत 15 वर्षों तक, हर हाल में कांगे्रस के ध्वज को अपने कंधे पर उठाकर मैदानी लड़ाई लड़ी थी और अपनी सरकार बनायी थी। परन्तु कांग्रेस कार्यकर्ता भी अपनी यह गलत फहमी मिटा लें कि यह कांगे्रस की सरकार थी। यह कमलनाथ जी की निजी सरकार थी, कांगे्रस के उन नामी गिरामी गुटों की सरकार थी, जिनका आम कार्यकर्ताओं और आम जनता दोनों से कोई वास्ता नहीं था। ऐसी सरकार को इसी तरह जाना था। पूर्व मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह की यह टिप्पणी वास्तविकता है कि भाजपा ने चुनावों के बाद अपनी सरकार बनाने की कोई कोशिश नहीं की, अन्यथा यह सरकार तो तब भी नहीं बन पाती।

सरकार बन जाने के बाद भी यह टिकी नहीं, तो इसके लिए दोषी भाजपा तो बिल्कुल नहीं है। मालवांचल की एक रोचक कहावत श्री कमलनाथ सरकार के पतन पर बड़ी ही सटीक है: 'फूटे भाग फकीर के, भरी चिलम ढुल जाये पर उनका भाग्य,भाग्य विधाता ने नहीं फोड़ा, उसके लिए वे स्वयं जिम्मेदवार है। कमलनाथ सरकार के पतन ने मध्यप्रदेश में कांगे्रस के हाथों से विधानसभा के वर्तमान कार्यकाल की सरकार ही नहीं छिनी है अपितु श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में प्रवेश के उपरांत प्रदेश की राजनीति का जो संतुलन भाजपा के पक्ष में गया है, वह अगले चुनाव में भी कांग्रेस की संभावनाओं पर पानी फेरता दिखाई दे रहा है, क्योंकि प्रदेश में कांग्रेस अब लगभग नेतृत्व विहीनता की स्थिति में है, युवा नेतृत्व तो उसके पास दूर-दूर तक नहीं है।

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