Top
undefined
Breaking

विशेष सम्पादकीय ..... शिवराज की चौथी पारी, बड़ी चुनौती

विशेष सम्पादकीय ..... शिवराज की चौथी पारी, बड़ी चुनौती

मध्यप्रदेश के इतिहास में कीर्तिमान कायम करते हुए श्री शिवराज सिंह चौहन ने चौथी बार प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने वाले पहले राजनेता का गौरव प्राप्त किया है। भाजपा के भी वे पहले नेता हैं, जिन्हें यह अवसर प्राप्त हुआ है। भाजपा भी अपनी इस उपलब्धि पर गर्व कर सकती है कि अत्यंत सामान्य पृष्ठभूमि से आकर अपने कर्मबल और ध्येय निष्ठा से निरंतर आगे बढऩे वाले उसके एक कार्यकर्ता देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी हैं, तो दूसरी ओर पांव-पांव चलने वाला भैया, सतत चलते-चलते चौथी बार प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर आसीन हुआ है। 2018 के आम चुनाव में भाजपा, उनके नेतृत्व में बहुमत से कुछ पीछे रह गई थी, इसके परिणामस्वरूप वे विपक्ष के नेता भी नहीं बन सके थे, जनता ने कांग्रेस से ज्यादा वोट भाजपा को दिये थे, पर सीटों के गणित में वह पिछड़ गई थी। क्यों पिछड़ी इसका विश्लेषण आज जरूरी नहीं, वह फिर कभी, परन्तु पुन: दल का नेता चुने जाने पर श्री शिवराज सिंह ने अत्यंत स्पष्टता और सहजता से यह संकेत दिया है कि हम उन नीतियों को भी बदलेंगे, जो पिछली बार सफलता के आड़े आ गई थी, यह कथन उनके आत्ममंथन का ही निष्कर्ष प्रतीत होता है।

श्री शिवराज सिंह का भाजपा विधायक दल के नेता पद पर पुन: चयन इस बात का प्रमाण है, पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व एवं प्रदेश के सभी कार्यकर्ताओं को विश्वास है कि प्रदेश और पार्टी के सामने खड़ी चुनौती का सामना करने के लिए श्री शिवराज सिंह चौहान सर्वश्रेष्ठ विकल्प हैं। श्री नरेन्द्र सिंह तोमर और श्री नरोत्तम मिश्र ने भी जिस सहजता के साथ उनको अपना पूरा समर्थन प्रदान किया, यह भाजपा के आंतरिक अनुशासन की शक्ति और समन्वय क्षमता का परिचायक है। विधानसभा में विपक्ष के नेता श्री गोपाल भार्गव, जो अपेक्षाकृत इन सबसे वरिष्ठ हैं, ने भी अपने बड़प्पन का परिचय देते हुए, श्री चौहान के लिए जिस तरह मार्ग प्रशस्त किया, यह भाजपा में ही संभव है। भाजपा में सामूहिक नेतृत्व की जो अंतर्भूत शक्ति है, यह इसका ही उदाहरण है कि उक्त सभी नेताओं मेें परस्पर होड़ न होते हुए श्री शिवराज सिंह को ही आगे बढ़ाने के लिए अद्भुत सहमति थी। इसे पाकर श्री चौहान भी अपने आप पर गर्व महसूस कर सकते हैं, कि उन्हें कैसी समृद्ध राजनैतिक विरासत मिली है?

श्री शिवराज सिंह नि:संदेह एक भाग्यशाली राजनेता हैं, जब उनकी पार्टी को बहुमत नहीं मिला, तब संयोग देखिये कि जिनके विरोध में उन्होंने चुनाव लड़ा था, वही व्यक्ति उन्हें एक और एक ग्यारह की शक्ति प्रदान करते हुए, पुन: सत्तारूढ़ करने का कारण बन जाते हैं। श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया का भाजपा के साथ आ जाना, सौभाग्य और संयोग दोनों का ही परिचायक है। श्री सिंधिया के साथ 22 विधायकों का कांग्रेस से त्याग पत्र कोई सामान्य घटना नहीं है। उन सभी विधायकों ने श्री सिंधिया के सम्मान और स्वाभिमान की रक्षा के लिये अपने पदों और विधायकी से त्यागपत्र देने में कोई हिचकिचाहट प्रकट नहीं की। यह भी अत्यंत साहसिक और अभूतपूर्व प्रदर्शन है। राजमाता सिंधिया के समय भी श्री गोविन्द नारायण सिंह के नेतृत्व में हुए कांग्रेसी विद्रोह और इन विधायकों के फैसले में बड़ा अंतर, यही है कि तब उन विधायकों के पास खोने को कुछ नहीं था, पर इस बार इन्होंने अपने राजनैतिक अस्तित्व को ही दांव पर लगाया है। गो. ना. सिंह तो कुछ ही समय में लौट गये थे, पर ये सभी अपने नेता के साथ चट्टान की खड़े रहे। उन्हें इनके इस दृढ़ संकल्प का प्रतिफल मिलना स्वाभाविक है, पर इनके निर्णय का समुचित मूल्यांकन भी जरूरी है।

श्री सिंधिया और कांग्रेस के 22 विधायकों के विद्रोह के समय की राजनैतिक परिस्थितियों और आज जब श्री शिवराज सिंह चौहान ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली है, तब की स्थितियों में बड़ा अंतर आ चुका है। तब सामने एक राजनैतिक चुनौती थी, जिसका दोनों ने कुशलता से सामना किया, परन्तु आज की चुनौती राजनैतिक कम और शासन, प्रशासन की दृढ़ता और जनसहयोग की उपलब्धता की अधिक है। कोरोना जैसी भयानक महामारी, उनकी सरकार को मुंहबाये खड़ी मिली है, उन्हें इसका संपूर्ण जनता का सहयोग लेकर, युद्धस्तर पर सामना करना है। क्योंकि यह लड़ाई केवल सरकार की नहीं है। पूरे समाज की, पूरी व्यवस्था की बहुपक्षीय समस्या है। इस महामारी को बढऩे से रोकने की, प्रभावितों के समुचित उपचार की है, जरूरतमंदों की सहायता की है, उनके भोजन, निवास और अन्य व्यवस्था की है। हमें बीमारी से बचना है और बचाना भी है। इस तैयारी में साधनहीन लोगों को सहारा देना भी बड़ा काम है, जो सामाजिक सहयोग से ही संभव है।

वैसे यह लड़ाई केवल हमारे प्रदेश की ही नहीं देश और दुनिया की भी है। मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते ही वल्लभ भवन की उस नये प्रखंड में, जिसे उन्होंने ही अपने पिछले कार्यकाल में बनवाया था, रात को दस बजे ही पहुंच जाना, यह सिद्ध करता है कि शिवराज इस बार अधिक गंभीर, संभले हुए, सुलझे हुए, अधिक संयत, साहसिक और सभी को साथ लेकर चलने वाले नेता की भूमिका में सामने आयेंगे और नया इतिहास रचेंगे। मुख्यमंत्री का दायित्व लेते ही उनकी कठिन परीक्षा का काल प्रारंभ हो गया है, इस विपत्ति को भी वरदान में बदल सकने वाले जन नेता और जननायक के रूप में वे सफल हों, पर सभी की इच्छा, आकांक्षा और कामना होगी।

( लेखक स्वदेश भोपाल ग्रुप के प्रधान सम्पादक हैं )

Next Story
Share it
Top