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शाकाहार क्रांति का अर्थ है कोरोना से मुक्ति

जिस तरह दुनिया में योग के प्रचलन से एक नवीन जीवनशैली को बल मिला है, उसी तरह शाकाहार क्रांति से दुनिया के लोग स्वस्थ जीवनशैली से रू-ब-रू हो, यही अहिंसा विश्व भारती का संकल्प है और यही कोरोना मुक्ति का मार्ग भी है।

शाकाहार क्रांति का अर्थ है कोरोना से मुक्ति

कोरोना वायरस के महासंकट ने जीवन में व्याप्त विसंगतियों एवं विषमताओं पर गहराई से सोचने एवं जीवनशैली को एक नया एवं स्वस्थ आकार देने का वातावरण निर्मित किया हैं। इस जीवनशैली को विकसित करते हुए जिन महत्वपूर्ण तथ्यों पर हमें ध्यान देना है उसमें प्रमुख है शाकाहार। कोरोना की महामारी के प्रमुख कारणों में मांसाहार भी एक है। मांसाहार के अनेक नुकसान सामने आ रहे हैं, तो कुछ भ्रांत लोग उसके फायदे भी कम नहीं मानते हंै। लेकिन शाकाहारी भोजन के गुणों को जानकर अब पाश्चात्य देशों में शाकाहार आन्दोलन तेज हो रहा है। कोरोना की महामारी ने तो समूची दुनिया में इस बात को स्वीकार करने को विवश कर दिया है कि शाकाहार इंसान के लिए मंासाहार से अधिक सुरक्षित और निरापद है। दुनियाभर में हो रही शोध से भी यह तथ्य सामने आया है कि न केवल भारत में बल्कि पश्चिमी देशों में शाकाहारियों की एक बड़ी तादाद देखने को मिल रही है।

अनेक देशों की यात्रा में मेरे सामने ऐसे तथ्य सामने आये है कि इन देशों के लोग खानपान को लेकर बहुत सर्तक है और वे भारत की शाकाहारी खान-पान पद्धति को अपनाने को उत्सुक है। आज विश्व के हर कौने से वैज्ञानिक व डाक्टर यह चेतावनी दे रहे हैं कि मांसाहार कैंसर आदि असाध्य रोगों को देकर आयु को क्षीण करता है और शाकाहार अधिक पौष्टिकता व रोगों से लडऩे की क्षमता प्रदान करता है, विशेषत: कोरोना संकट ने तो यह स्पष्ट ही कर दिया कि एक स्वस्थ शरीर एवं रोगों से लडऩे के लिये शाकाहार ही सबसे उपयुक्त है। फिर भी मानव यदि अंधी नकल या आधुनिकता की होड में मांसाहार करके अपना सर्वनाश करे तो यह उसका दुर्भाग्य ही कहा जायेगा। मैंने देखा कि अनेक देशों में शाकाहार आन्दोलन उग्र होता जा रहा है, अनेक नये-नये उपक्रम शाकाहार को प्रोत्साहन देने के लिये हो रहे हैं। अमेरिका में सलाद बार अत्यधिक लोकप्रिय हो रहे हैं। पश्चिमी देशों में शाकाहार के लिये वहां लोगों का रुझान अनेक रूपों में देखने को मिल रहा है। अनेक शोध इस बात को लेकर भी सामने आयी है कि मांसाहार को लेकर सबसे बड़ा खतरा ग्लोबल वॉर्मिंग को बढऩे को लेकर है।

यह बात थोड़ी अटपटी लग सकती है पर दोनों में गहरा संबंध है। खाने की थाली में सजा लजीज मांसाहार हमारे स्वास्थ्य पर चाहे जो प्रभाव डाल रहा हो लेकिन पर्यावरण पर तो इसका बहुत बुरा असर हो रहा है। आखिर निरीह जीवों की हत्या और आह से सना भोजन कैसे स्वास्थ्य एवं सौभाग्यवर्द्धक हो सकता है? पूरी दुनिया में नॉन वेज (मांसाहार) की संस्कृति के पनपने के अनेक कारण हंै लेकिन आर्थिक विकास और औद्योगीकरण ने मांसाहार को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। विकासशील देशों ने भ्रामक विकास एवं तथाकथित पाश्चात्य आधुनिक जीवनशैली के नाम पर इसे अपनाया है। इन देशों में जैसे-जैसे आर्थिक विकास हुआ है वैसे-वैसे मांस व पशुपालन उद्योग फला-फूला है। लेकिन इस तथाकथित विकास की पोल जल्दी ही खुल गयी। कोरोना महामारी ने तो इससे जुड़े घातक एवं खतरनाक तथ्यों से दुनिया को अंधेरों मं धकेल दिया है। सचाई है कि स्वास्थ्य एवं मानवीय दृष्टि से मांसाहार के पनपने से अनेक तरह की विसंगतियां एवं विषमताएं जीवन को अंधकारमय बना रही है।

इसके बढ़ते प्रचलन से जहां प्राकृतिक अंसतुलन का खतरा है वहीं इसने मैड काऊ, बर्ड फ्लू व स्वाइन फ्लू जैसी नई महामारियां पहले ही मानवता को अनेक खतरे दे चुकी है और कब कोरोना वायरस ने तो मानव इतिहास की सबसे बड़ी महामारी एवं त्रासदी के रूप में जीवन-अस्तित्व पर प्रश्न खड़े कर दिये हैं। मांस उत्पादन में खाद्य पदार्थों की बड़े पैमाने पर बर्बादी भी होती है। एक किलो मांस पैदा करने में 7 किलो अनाज या सोयाबीन की जरूरत पड़ती है। एक किलो सब्जी पैदा करने में जहां मात्र 500 लीटर पानी की खपत होती है, वहीं इतने ही मांस के लिए 10,000 लीटर पानी की जरूरत पड़ती है। स्पष्ट है कि आधुनिक औद्योगिक पशुपालन के तरीके से भोजन तैयार करने के लिए काफी जमीन और संसाधनों की जरूरत होती है। इस समय दुनिया की दो-तिहाई भूमि चरागाह व पशु आहार तैयार करने में लगा दी गई है। व्यक्ति को वही चीजें खानी चाहिए जो प्राकृतिक हैं।

जो कुछ भी प्राकृतिक है हमेशा तुम्हें संतुष्टि देती है, क्योंकि यह तुम्हारे शरीर को तृप्त करती है। श्रीमद्भगवद्गीता में भोजन की तीन श्रेणियाँ बतायी हैं। तामसिक आहार- जो हमारे भीतर तमस को पैदा करें, आक्रामकता पैदा करें, तामसिक व हिंसक मनोवृत्ति को बढ़ाएं मांसाहार आदि। राजसी आहार- जो हमारी इन्द्रियों को प्रदीप्त करें, उत्तेजित करें चंचलता बढ़ाए। प्रचुर मात्रा में घी तेल मक्खन आदि। सात्विक आहार- जो शरीर निर्वाह के साथ सात्विक प्रवृत्तियों को बढ़ाए, साधना में बाधक न बनें - फल सब्जियों अनाज आदि। मांसाहार दुर्गुणों को जन्म देने वाला है, जिसके द्वारा क्रूर भाव उत्पन्न होते हैं और ऐसी ही क्रूर मानसिकता वाले राष्ट्र कोरोना जैसी महामारियां फैलाकर मानव जीवन को संकट में डालते हैं।

स्वस्थ भोजन ही तन और मन को स्वस्थ रखता है। स्वस्थ भोजन से आशय है, वह भोजन जिसमें खनिज पदार्थ, प्रोटीन, कार्बोहाइट्रेड और विटामिन्स सहित कई पोषक तत्व हों। ये सभी चीजें समान अनुपात में हों तो भोजन शरीर के लिए अमृत बन जाता है। भोजन तभी स्वस्थ है जब तक प्राकृतिक हो। संतुलित शाकाहारी भोजन शरीर को सभी पोषक तत्व प्रदान करता है। यही नहीं, वह हृदय रोग, कैंसर, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, जोड़ों का दर्द व अन्य कई घातक एवं जानलेवा बीमारियों से हमें बचाता भी है। नए शोध के अनुसार, शाकाहारी होना हमारे हमारे शरीर के लिए बहुत फायदेमंद हैं। जो लोग सब्जियों से अधिक प्रोटीन प्राप्त करते हैं उनका रक्तचाप सामान्य रहता है जबकि मांस का अधिक सेवन करने वाले ज्यादातर लोग हाई ब्लड प्रेशर के शिकार होते हैं। लंदन में हुए शोध के अनुसार उन लोगों में हाई ब्लड प्रेशर ज्यादा पाया गया जो मांस से अधिक प्रोटीन प्राप्त करते थे। अनुसंधान के अनुसार, शाकाहारी प्रोटीन में एमीनो एसिड पाया जाता है। यह शरीर में जाकर ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करता है। धार्मिक आधार और सैद्धांतिक तौर पर भोजन ऐसा होना चाहिए जिससे न तो किसी का दोष लगा हो, ना पाप करके या चोरी करके लाया गया हो, न ही हत्या अथवा हिंसा करके बनाया गया हो।

प्रकृति ने मनुष्य को स्वभाव से ही शाकाहारी बनाया है। जबकि मांसाहार उसमें तामसी वृतियां पैदा कर उसे क्रूर और हिंसक बनाता है, उसके शरीर की रोग-निरोधक क्षमता को कम कर उसे रक्तचाप तथा हृदय रोग जैसी दुसाध्य बीमारी लगाता है, उसके श्वास और पसीने को दुर्गुण युक्त बनाता है। उसके मन में काम, क्रोध और प्रमाद जैसे दुर्गुण उत्पन्न करता है। महात्मा गांधी कहते थे कि स्वाद पदार्थ में नहीं, अपितु मनुष्य की अपनी जिव्हा में होता है। नीम की चटनी से जीभ के स्वाद पर नियंत्रण कर लेने वाले गांधी के देश में आज मांसाहार का विरोध तो दूर, उल्टे टी.वी. और रेडियो जैसे संचार माध्यमों द्वारा अंडों के आकर्षक विज्ञापन प्रसारित किये जाना विडम्बनापूर्ण हैं। यह चिन्तनीय है, अहिंसा के उपासक देश के लिए लज्जास्पद भी। न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया में मांसाहार पर नियंत्रण के लिये जन-जागृृति माहौल बनना ही चाहिए। इसका विरोध करना अहिंसा के पक्षधर प्रत्येक प्रबुद्ध नागरिक का नैतिक दायित्व है तथा मुख सुख के लिए निरीह प्राणियों और अजन्मे अंकुरों की निर्मम हत्या के विरुद्ध जनमानस तैयार करना सबका प्रथम कर्तव्य है।

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