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भाजपा का मिशन पश्चिम बंगाल: सत्ता की दौड़ मुश्किल, पर सही कदम पड़े तो मंजिल संभव

भाजपा का मिशन पश्चिम बंगाल: सत्ता की दौड़ मुश्किल, पर सही कदम पड़े तो मंजिल संभव
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नई दिल्लीमिशन पश्चिम बंगाल को लेकर भाजपा को जितना खुद पर भरोसा है उतना ही मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर भी होता जा रहा है। पिछले वर्षो में कुछ ममता की शासन प्रणाली के कारण, कुछ उनके तेवरों के कारण और कुछ ममता के खिलाफ कांग्रेस और वाम दलों में बन रही दोस्ती के कारण। भाजपा के अंदर यह भरोसा जमने लगा है कि बंगाल में सत्ता की दौड़ मुश्किल तो है पर सही कदम पड़े तो वक्त से पहले भी मंजिल संभव है।

पश्चिम बंगाल में अगले साल मई में होंगे विधानसभा चुनाव

पश्चिम बंगाल में अगले साल मई में विधानसभा चुनाव होना है। बाजियां अभी से सजने लगी है। दुर्गा पूजा के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वहां के भाजपा कार्यकर्ताओं को संबोधित करने वाले हैं। उससे पहले भाजपा अध्यक्ष जे पी नड्डा कोलकाता जाने वाले हैं। पिछले कुछ वर्षो में अपने कई नेताओं को भाजपा के पाले में जाते देख रही तृणमूल कांग्रेस चर्चा के लिए ही सही भाजपा के नेताओं को साधने में जुटी है। पिछले चुनाव में नंबर तीन और चार पर आई कांग्रेस और वामपंथी दल फिर से इकठ्ठा होने की कवायद में जुट गए हैं। और कोई भी इससे इनकार करने की स्थिति में नहीं कि यह चुनाव आकलन से परे भी जा सकता है।

ममता को चित करना मुश्किल है

वर्ष 2019 में लोकसभा चुनाव में बड़ी बाजी मारने से पहले खुद भाजपा में भी यह संशय था कि पश्चिम बंगाल में वाम के लाल दुर्ग को ढहाने वाली ममता को चित करना बहुत मुश्किल है, लेकिन ममता की कमजोरियों को ही ताकत बनाने की रणनीति काम कर गयी। पहले चरण में बार बार यह स्पष्ट किया गया कि ममता सरकार की नीतियां एके समुदाय पर विशेष रूप से केंद्रित है। शुरुआत में उग्र ममता बाद में लीपापोती में तो जुटीं लेकिन भरोसा नहीं जमा पायीं। उसके बाद भी जिस तरह ममता केंद्रीय योजनाओं को भी रोकती रहीं वह आम जनता को रास नहीं आया।

भाजपा की ममता पर टिकी निगाहें

उससे भी बड़ी बात यह है कि ममता के तेवर ने कुछ ऐसा माहौल बनाया कि कभी भाजपा के लिए अनजान मिट्टी रहे बंगाल में अब ममता पर निगाहें टिक गई है। इसमें ममता के समर्थक और ममता के विरोधी दोनों शामिल हैं। इसमे बड़ी तादाद ऐसे लोगों की जुट रही है जो उनकी राजनीति से ऊब रहे हैं। भाजपा की पूरी रणनीति इसे ही और उभारने की है। लोकसभा चुनाव में इसका फायदा दिखा था जब ममता विरोध के नाम पर वाम गढ़ में भी भाजपा को जीत मिली थी। आने वाले समय मे रैलियों, नारो को भी ममता पर ही केंद्रित रखा जाएगा ताकि कांग्रेस और वाम दलों के संभावित गठबंधन के असर को भी कमजोर किया जा सके।

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