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संविधान ताक पर रखकर 'का' का विरोध

भाजपा की बढ़ती ताकत से घबराई ममता तो अब कांग्रेस और कम्युनिस्टों से भी हाथ मिलाने के लिए तैयार है

संविधान ताक पर रखकर का का विरोध
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इस्लामी देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में प्रताडि़त हिन्दू, जैन, सिख, ईसाई, बौद्ध और पारसियों को भारत में शरण देने तथा नागरिकता प्रदान करने के लिए लागू किए गए नागरिकता संशोधन कानून 2019 के विरोध में राजनीतिक दलों और मुस्लिम संगठनों ने संविधान को भी ताक पर रख दिया है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने तो असम में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसीभाजपा की बढ़ती ताकत से घबराई ममता तो अब कांग्रेस और कम्युनिस्टों से भी हाथ मिलाने के लिए तैयार है) लागू करने से पहले ही होहल्ला मचाना शुरु कर दिया था। अपने नेताओं को असम में अशांति फैलाने के लिए भेजा। इतना ही नहीं ममता बनर्जी ने तो नागरिकता संशोधन कानून पर जनमत संग्रह कराने के लिए विदेशी हस्तक्षेप को भी आमंत्रण दे दिया। ममता ने कहा था कि संयुक्त राष्ट्र नागरिकता संशोधन कानून पर जनमत संग्रह कराए। यह अलग बात है कि संयुक्त राष्ट्र के महासचिव ने एंटोनियो गुतेरस ने ममता की मांग को नकारते हुए कहा कि केवल राष्ट्रीय सरकार के अनुरोध पर ही जनमत संग्रह कराया जाता है। अपनी मांग खारिज होने पर ममता बनर्जी ने भी बयान पर पलटी मार ली। अब कह रही है कि उन्होंने तो ओपिनियन पोल कराने की बात कही थी। ममता के पलटी मारने के बाद संसद और बाहर अपने अनाप-शनाप बयानों के लिए पहचान बनाने वाले पश्चिम बंगाल कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने अधीरता दिखाते हुए जनमत संग्रह की बात कही है।

ममता की तरह की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार महाराष्ट्र की खिचड़ी सरकार के मुख्यमंत्री और शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे से नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी लागू न करने की मांग कर रहे हैं। राष्ट्रीय जनता दल ने तो कानून के खिलाफ बिहार में जगह-जगह आग लगाई है। कांग्रेस की राज्य सरकारें भी सीएए और एनआरसी का विरोध कर रही हैं और लागू न करने की धमकी दे रही हैं। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल,पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और केरल के कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री पिनरई विजयन ने नागरिकता संशोधन को विरोध किया है। संसद द्वारा बनाए गए कानून को अंसवैधानिक बताया जा रह है। संविधान के अनुच्छेद 11 के तहत संसद को नागरिकता पर कानून बनाने का अधिकार है। अनुच्छेद 252 के तहत राज्यों को संसद के बनाए गए कानूनों का पालन करना होता है। संसद द्वारा पारित अधिनियम या संशोधन में बदलाव संसद ही कर सकती है। राज्य के बारे में बनाए गए अधिनियम या संशोधन को विधानसभा और विधानमंडल भी नहीं बदल सकते हैं।

ममता बनर्जी तो विरोध में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की भाषा बोलते हुए और आगे निकल गई। उन्हें विदेशी ताकतों से भी परहेज नहीं है। इसके लिए ममता बनर्जी की मानसिकता को समझना होगा। ममता बनर्जी की राजनीति की शुरुआत देश में आपातकाल के दौरान हुई। ममता बनर्जी ने खुद कांग्रेस से राजनीति की शुरुआत की और उनका परिवार भी कांग्रेस से जुड़ा हुआ था। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय के लोगों पर दमन चक्र के दौरान ममता ने राजनीति का पाठ पढ़ा। राय के मुख्यमंत्रित्वकाल में नक्सलियों के सफाये की आड़ में आम लोगों पर अत्याचार किए गए। ममता बनर्जी ने आपातकाल के समर्थन में लोकनायक जयप्रकाश नारायण की कार पर चढकर विरोध जताया था। राजनीति में पलटी मारने में माहिर ममता का किसी दल से दोस्ती करने में कोई परहेज नहीं रहा। ममता ने पहले कांग्रेस तोड़ी और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से दोस्ती गांठी। भारतीय जनता पार्टी के सहारे ममता ने पश्चिम बंगाल में अपनी पार्टी का विस्तार किया। पश्चिम बंगाल में आम नागरिकों के दमन और आपातकाल के दौरान राजनीति की शुरुआत करने वाली ममता अपने विरोधियों को कुचलने के लिए सभी हदें पार कर जाती है।

भाजपा की बढ़ती ताकत से घबराई ममता तो अब कांग्रेस और कम्युनिस्टों से भी हाथ मिलाने के लिए तैयार है। ममता ने भाजपा के विरोध में सांविधानिक व्यवस्था को ही ताक पर रख दिया है। 2014 में केंद्र नरेंद्र मोदी सरकार के गठन के बाद ममता बने भाजपा को पश्चिम बंगाल में मुख्य निशाना बनाना शुरु किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष तथा देश के गृह मंत्री अमित शाह के विरोध करने के लिए ममता ने राजनीतिक शिष्टाचार ही छोड़ दिया। किसी राज्यपाल का ममता ने सम्मान नहीं किया। राज्यपाल को सूचना मांगने पर भी नहीं दी जाती हैं। पश्चिम बंगाल के अधिकारियों को राज्यपाल के बुलाने पर भी गायब रहने की हिदायत दी गई है। मोदी विरोध में ममता ने केंद्र सरकार की कल्याणकारी योजनाओं को लागू न करके पश्चिम बंगाल की जनता के साथ अन्याय किया है।

पश्चिम बंगाल क्या, कोई भी राज्य नागरिकता संशोधन कानून या एनआरसी लागू करने से इंकार नहीं कर सकता है। राज्य सरकारों के असहयोग के बावजूद सभी राज्यों में नागरिता संशोधन कानून लागू किया जाएगा। संसद में पारित संशोधित कानून में प्रावधान किया गया कि है कि केंद्र सरकार नागरिकता संशोधन कानून को लागू करवाने वाली एजेंसी का चयन कर सकती है। नागरिकता कानून के संशोधन में ही स्पष्ट कर दिया गया है कि इसे लागू करने के लिए केंद्र सरकार अपने अनुसार किसी एजेंसी को शक्ति प्रदान कर सकती है। ऐसी व्यवस्था के बाद विरोधी दलों के नेता लोगों को कुछ समय के लिए भ्रम में डालने की कोशिश कर सकते हैं। वैसे भी यह कानून किसी व्यक्ति की नागरिकता समाप्त करने के लिए नहीं बल्कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में सताए गए अल्पसंख्यकों को शऱण देने के लिए ही है। ममता बनर्जी तृणमूल कांग्रेस के नेताओं को उत्तर प्रदेश भेजकर अशांति फैलाने की कोशिश की रही है। ममता बनर्जी पहले पश्चिम बंगाल में आग लगाना बंद करो। जहां करोड़ों की सरकारी संपति फूंकी जा चुकी है।

कैलाश विजयवर्गीय

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