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भारतीय मजदूर संघ शून्य से शिखर की ओर

हर काल में मालिक और मजदूरों का रिश्ता रहा है

भारतीय मजदूर संघ शून्य से शिखर की ओर

धर्मदास शुक्ला

भारतीय मजदूर संघ कि स्थपना से पूर्व देश में कई श्रम संगठन कार्यरत थे, जो किसी न किसी राजनैतिक विचार धारा एवं पाश्चात संस्कृति से ओत-प्रोत थे देश में ट्रेड यूनियनों का प्रचलन 1889 से एम.ए. लोंखडे जिन्होने बाम्बे मिल एसोसिएशन की शुरूआत की थी एवं दूसरी 1890 में मद्रास लेबर एसोशिएशन की शुरूआत एन.एस. जोशी ने की और तीसरी एम.एन. राय जिन्होंने जूट मिल एसोसिएशन की 1891 में बंगाल से की थी जिन्होंने पूरा माक्र्सवाद लेनिनवाद का लबादा ओढ़कर रखा था, जिन्होंने चाईना में जाकर पाश्चात संस्कृति का अध्ययन कर भारत लौटे देश में कम्युनिज्म को मजदूरों के माध्यम से ट्रेड यूनियनें बनाने लगे जो हमारे देश कि संस्कृति के विपरित काम करने हेतु राजनीति का सहारा लिया।

देश की आजादी के समय भी 1942 में महात्मा गांधी के द्वारा छेड़े गये असहयोग आंदोलन के समय भी कम्युनिस्टों ने अपने आपको आंदोलन से अलग रखा और 1962 के भारत चीन युद्ध के समय भी डिंफेस और टेली कम्यूनिकेशन में हड़ताल का आह्मान किया और चाईना को मुक्ति वाहिनी घोषित करना यह देश के साथ गद्दारी करने जैसा व्यवहार था जब देश युद्ध के संकट में हो और उस समय चाहे जो मजबूरी हो मांगे हमारी पूरी हो जैसे नारे देना यह देश के साथ विश्वासघात करने जैसा था।

भारत में प्राचीन काल में श्रम संघ था

अगर हम प्राचीन काल की बात करें तो पता चलता है कि उस समय श्री संगठनों की परिकल्पना थी। प्राचीन काल, रामायणकाल या फिर महाभारतकाल हो हर काल में मालिक और मजदूरों का रिश्ता रहा है और तो और वेदों में श्री श्रम की महत्ता रही है उस समय में भी राजारजवाड़े भी अपने यहां काम करने को पारिवार्षिक देते थे।

शुक्रनिति एवं चाणक्त नीति

शुक्राचार्य की अर्थ नीति में बोनस और मंहगाई भत्ता आदि तय था, जिसे हम आजकल शुक्र नीति का उदाहरण देकर बात करते है। विदूर नीति का उदाहरण मिलता है। ओर उस समय में श्रमिकों की अगुवाई और उनके सुख-दुख की चिंता करने वाजा एक टोली प्रमुख होता था जो उनके सुख दु:ख की चिंता करता था।

औद्योगिकीकरण

जहाँ एक ओर इंग्लैंड से औद्योगिकीकरण कि शुरूआत मानी जाती है वही हमारे यहां का मलमल का कपड़ा विश्व प्रसिद्ध था हमारे देश में प्राचीन समय से ही कुटीर उद्योग के रूप में छोटे-छोटे व्यवसाय गांव-गांव तक फैले हुए थे जो जनता की रोजमर्रा की क्रूरतें पूरी करते थे किसी को भी शहर की तरफ दौडऩा नहीं पड़ता था।

प्रथम एवं द्वितीय विश्व युद्ध के समय विश्व के सभी देशों के सामने आर्थिक संकंट डगमगाने लगा था। भारत के ग्रामीण लोग भारत के बड़े-बड़े शहरों बाम्बे, कलकत्ता, मद्रास की तरफ बड़ी संख्या में आने लगे जिनकी कार्यदशाओं एवं आय के स्त्रोतों एवं बुनियादी समस्याओं को लेकर संघर्ष होते रहते थे क्योंकि उस समय तक कोई श्रम कानून श्रमिकों को लेकर नहीं बनाया गया था और इसी कारण से अंगेजों ने 1918 में पहली बार रॉयल कमीशन ऑफ लेबर की स्थापना की। इसके बाद 1919 में (आई.एल.ओ.) अंतराष्ट्रीय स्तर पर अंतराष्ट्रीय श्रम संगठन का निर्माण हुआ जिसमें अंतराष्ट्रीय स्तर पर श्रमिकों की समस्याओं के बारे में जागरूकता एवं उनके बेहतर जीवन स्तर कार्यदशा के सुधार हेतु किया गया था। 1920 में एटक का निर्माण किया गया था। जिसमें विभिन्न विचार धारा के लोग सम्मिलित हुए थे और इसके बाद 1926 में श्रमिकों के लिए टे्रड यूनियन एक्ट का निर्माण किया गया। 1929 से देश की आजादी का आंदोलन तेजी से शुरू हो गया जिससे 1942 के असहयोग के कारण सभी नेता जेलों में बंद होने के कारण कम्युनिस्टों ने एटक पर अपना एकाधिकार जमा लिया ओर 1947 में जेल से छूटने के बाद इंटक का निर्माण किया गया था 1947 में समाजवादियों ने एच.एम.एस. का निर्माण किया तथा 1948 में कुछ लोगों ने एच.एम.पी. एवं यू.टी.सी. का निर्माण किया ये संगठन किसी न किसी राजनैतिक दल के विंग के रूप में काम करते थे।

भारतीय मजदूर संघ

भारतीय मजदूर संघ के उदय से पूर्व चलने वाली सभी यूनियन ब्रेड बटर के आधार पर चलती थी इसके बाद अधिकतर सरसंघचालक माधवराव सदाशिव गोलवकर जी ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री दंत्तोपंत ठेंगड़ी जी को उस समय कठिन परिस्थिति को देखकर श्रम संगठन के काम करने हेतु कहा जिसे स्वीकार कर माननीय ठेंगड़ी जी ने 1952 से 1954 तक इंटक में प्रदेश संगठन मंत्री मध्यप्रदेश तथा जूट इंडस्ट्रीज का अध्ययन किया औन उन्होंने वहां देखा कि एक समय में ट्रेड यूनियन एवं राजनीति में एक साथ काम नहीं किया जा सकता इसके बाद उन्होंने भारतीय संस्कृति के आधारपर 23 जुलाई 1955 को भोपाल में कपड़ा मिल से आजादी के प्रणेता बाल गंगाधर तिलक एवं चंद्रशेखर आजाद की जन्म तिथि के अवसर पर भारतीय मजदूर संघ की सून्य से स्थापना की और स्थापना काल से ही देशहित, उद्योगहित और श्रमिक हित में कार्य करने लगे और उस समय देश में चलने वाले नारे चाहे जो मजबूरी हो, मांगे हमारी पूरी हो और कमाने वाला खायेगा जैसे नारों को अमान्य करते हुए भारत माता की जय और 'देश के हित में करेंगे काम-काम के लेंगे पूरे दामÓ, 'कमाने वाला खिलायेगाÓ जैसे नारे दिये और इसके अलावा विश्वकर्मा जयंती हमारा राष्ट्रीय श्रम दिवस के रूप में मनाना शुरू किया। भारतीय मजदूर संघ शून्य से शुरू होकर आज देश का सबसे बड़ा श्रम संगठन बनकर देश के करोड़ मजदूरों की आस्था का केन्द्र बन गया। जो वर्ष 1989 भारत सरकार द्वारा कांग्रेस सरकार के समय सर्वेक्षण में प्रथम क्रमांक का संगठन बना। बाद में मनमोहन सिंह की सरकार ने भी वर्ष 2002 में भी 01 करोड 71 लाख की सदस्यता के आधार पर देश का प्रथम क्रमांक श्रम संगठन बना रहा जिसके आधार पर भारत की ओर से प्रतिवर्ष (आई.एल.ओ.) अर्न्तराष्ट्रीय श्रम संगठन के सम्मेलन में प्रतिनिधित्व करता है जिसकी आज पूरे देश में 03 करोड से भी अधिक सदस्यता है, जो राष्ट्र की सर्वांग्रीण विकास की उन्नति में अपना योगदान प्रदान कर रहा है।

अजा भा.म.स. का कार्य देश के कोने-कोने तक फैल गया है जो आज 65 साल की यात्रा पूरी कर समाज को विकास की दिशा में ले जाकर अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है एवं स्वदेशी, पर्यावरण, सामाजिक समरसता, नारी सशक्तिकरण, स्वास्थ्य सुरक्षा एवं ग्रामीण विकास की अवधारणा पर निरंतर कार्य कर रहे है एवं राष्ट्र को परम वैभव पर पहुंचाने के लिए करोड़ो कार्यकर्ता समाज में अपृश्सता, छुआछुत, दुव्यर्सन जैसे कार्यो को मिटाने के लिए जन जागरण के कार्य में लगे हुए।

वर्तमान परिपेक्ष्य

भारतीय मजदूर संघ द्वारा समय-समय पर देशकाल परिस्थति अनुसार आई हुई हर विपत्ति में बढ़-चढ़कर कर भाग लेता है उसी प्रकार अभी वर्तमान में कोविड-19 कोरोना की महामारी में भारतीय मजदूर संघ के कार्यकर्ताओं ने देश के साथ ही मध्यप्रदेश में भी 25 मार्च से लेकर मई माह तक लगातार जो मजदूर देश के अन्य प्रान्तों में काम करने के लिये गये थे। वह मध्यप्रदेश में अपने घर की ओर वापस आ रहे थे एवं दूसरे प्रदेशों के भी मजदूर मध्यप्रदेश की सीमा से पार हो रहे थे, उनके लिये भोजन के पैकड, पानी की बोतल तथा बसों अन्य जो भी साधन उपलब्ध होते थे। उससे उन प्रवासी मजदूरों की मदद कर रहे थे साथ ही मध्यप्रदेश के बडे औद्योगिक क्षेत्रों पीथमपुर, खरगोन, परासिया, सिंगरौली आदि क्षेत्रों के कार्यकर्ताओं ने प्रावासी मजदूरों एव अन्य आसपास के जरूरतमंद लोगों के लिये लगातार तीन माह तक भोजन कराने की व्यवस्था संभाली, जो एक बडा सेवा का कार्य था और समय-समय पर प्रकृतिक आपदा के समय भारतीय मजदूर संघ के कार्यकर्ता सेवा कार्य हेतु अपने आपको सिद्ध रखते है।

सरकार जगाओं सप्ताह

केन्द्रीय सरकार द्वारा सार्वजनिक प्रतिष्ठाानों को निजीकरण करने एवं समस्त श्रम कानूनों को शिथिल करने के विरोध में भारतीय मजदूर संघ द्वारा देश के फायदे के सार्वजनिक क्षेत्रों एवं कोल माईनस आदि को कॉमर्शियल के हिसाब से निजी क्षेत्रे में देने का विरोध करता है और इसी तरह श्रम कानूनों को तीन साल तक स्थगित करने का भी विरोध करता है क्योंकि इसके कारण श्रमिकों का शोषण बढ़ेगा, जिसके कारण भारतीय मजदूर संघ ने अपने 65 वें स्थापना दिवस के उपलक्ष्य के साथ निम्न कार्यक्रम अयोजित करेगा, जिसमें भारतीय मजदूर संघ केन्द्रीय योजना के अनुसार 24 जुलाई से लेकर 30 जुलाई तक सरकार जगाओं सप्ताह का आयोजन कर पूरे प्रदेश में जन जागरण अभियान चलायेगा एवं सुविधा अनुसार सरकार का ध्यान आर्कषण करने के लिये धरना आदि कार्यक्रम करेगा।

1) दिनांक 24 जुलाई 2020 को समस्त स्कीम वर्कर आशा, आंगनवाडी, मध्यान भोजन, मनरेगा, 108 एम्बुलेंस, एन.एच.एम., आदि अपने-अपने क्षेत्र में धरना/प्रदर्शन करेंगें।

2) 25 जुलाई को ऊर्जा क्षेत्र समस्त परिवहन निजी एवं सार्वजनिक पूरे देश में सुविधा अनुसार कार्यक्रम करेंगे।

3) 26 जुलाई प्राईवेट सेक्टर सीमेंट इंजीनियरिंग, जूट, टेक्सटाईल्स, सुगर, डिस्टलरी, फार्मास्क्यूटिकल, मेडिकल रिप्रिजेन्टेटीव एवं औद्योगिक क्षेत्र के समस्त मजदूर/श्रमिक।

4) 27 जुलाई को राज्य सरकारों राज्य कर्मचारी एवं स्थानीय नगर निगम एवं निकायों के कर्मचारी केन्द्रीय सरकारों के रेल्वे पोस्टल डिफेंस आदि।

5) 28 जुलाई फाईनांस सेक्टर, बैंकिंग एवं एल.आई.सी. के कर्मचारी कार्यक्रमों में भाग लेंगे।

6) 29 जुलाई असंगठित क्षेत्र के समस्त श्रमिक बीडी कृषि, भवन निर्माण, लोडिंग, अनलोडिंग, स्ट्रीट वेंडर आदि कार्यक्रमों में भाग लेंगे।

7) 30 जुलाई को भारत सरकार के समस्त सार्वजनिक औद्योगों के कर्मचारी भेल, कोल, स्टील, एन.टी.पी.सी. नॉन कोल आदि क्षेत्र के कर्मचारियों द्वारा पूरे देश में सरकार जगाओं सप्ताह बनाया जायेगा।

(लेखक-क्षेत्रीय संगठन मंत्री मध्यक्षेत्र)

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