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कारगिल युद्ध : सैनिकों की बहादुरी और बलिदान की गौरवगाथा

भारतीय सेना ने कारगिल में करीब 18 हजार फीट की ऊंचाई पर पाकिस्तानी सेना को कड़ी शिकस्त देकर अपना तिरंगा लहराया था

कारगिल युद्ध : सैनिकों की बहादुरी और बलिदान की गौरवगाथा

युद्धवीर सिंह लांबा

भारत 1999 की कारगिल की लड़ाई में पाकिस्तान पर अपनी जीत की 21वीं वर्षगांठ मना रहा है। 21 साल पहले यानी 1999 में 26 जुलाई के दिन भारतीय सेना ने पाकिस्तान के खिलाफ कारगिल युद्ध में विजयी हासिल कर ली थी। करीब दो महीने तक चले कारगिल युद्ध में भारतीय सेना ने साहस और जांबाजी का एक ऐसा उदाहरण पेश किया जिस पर हर देशवासी को गर्व होता है । कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय सेना के वीर सपूतों ने अदम्य साहस दिखाते हुए पाकिस्तान को युद्ध में हराकर कारगिल में तिरंगा फहराया था। देश की रक्षा के लिए प्राणों का बलिदान देने वाले वीर जवानों को श्रद्धांजलि देने के लिए हर साल 26 जुलाई को 'कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है।

भारतीय सेना ने कारगिल में करीब 18 हजार फीट की ऊंचाई पर पाकिस्तानी सेना को कड़ी शिकस्त देकर अपना तिरंगा लहराया था। कारगिल युद्ध में भारतीय सुरक्षा बलों के करीब 2 लाख जवानों ने हिस्सा लिया था, जिसमें से भारत ने अपने 527 जांबाज सैनिकों को खोया और 1300 से ज्यादा सैनिक घायल हुए। चार भारतीय जवानों को इस युद्ध में अदम्य साहस के लिए सेना का सर्वोच्च पदक परमवीर चक्र प्रदान किया गया था। ग्यारह गोरखा राइफल्स की प्रथम बटालियन के लेफ्टीनेंट मनोज कुमार पांडे और जम्मू कश्मीर राइफल्स की तेरहवीं बटालियन के कैप्टन विक्रम बत्रा को सेना का सर्वोच्च पदक परमवीर चक्र मरणोपरांत प्रदान किया गया था जबकि द ग्रेनेडियर्स की अठारहवीं बटालियन के ग्रेनेडियर योगेन्द्र सिंह यादव और जम्मू कश्मीर राइफल्स की तेरहवीं बटालियन के राइफलमैन संजय कुमार को परमवीर चक्र प्रदान किया गया था।

पाकिस्तानी सेना कारगिल घुसपैठ के जरिए ना केवल कारगिल पर कब्जा करना चाहती थी, बल्कि लेह और सियाचिन ग्लेशियर तक भारतीय सेना की सप्लाई लाइन को भी काटना चाहती थी ताकि वहां पर भी कब्जा किया जा सके। अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करते हुए 3 मई 1999 को पाकिस्तानी सेना के करीब 5000 सैनिकों ने कारगिल की ऊंची पहाडिय़ों पर कब्जा कर लिया था । 3 मई, 1999 को एक ताशी नामक कश्मीरी चरवाहे ने भारतीय सेना को बताया कि पाकिस्तानी सेना ने कारगिल पर कब्जा कर लिया है। 5 मई, 1999 को भारतीय सेना जब पेट्रोलिंग करने गई तो उन्हें पाकिस्तानी सेना ने पकड़ लिया गया व 5 जवानों की हत्या कर दी गई। 9 मई, 1999 को पाकिस्तानियों की गोलाबारी से भारतीय सेना का कारगिल स्थित गोला बारूद का स्टोर नष्ट हो गया। 10 मई, 1999 को पहली बार लद्दाख का प्रवेश द्वार यानी द्रास, काकसार और मुश्कोह सेक्टर में पाकिस्तानी घुसपैठियों को देखा गया।

कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय सेना की कमान जनरल वीपी मलिक के हाथों में थी। उनका कहना था कि सेनाओं और सैनिकों की अंतिम परीक्षा युद्ध में ही होती है। 26 मई, 1999 को भारतीय वायुसेना को कार्रवाई के लिए आदेश दिया गया। कारगिल युद्ध में पाकिस्तान को परास्त करने के लिए भारतीय सेना ने 'ऑपरेशन विजय' नाम का अभियान चलाया था। मई में शुरू हुई जंग में 26 जुलाई,1999 को भारतीय सेना ने जीत हासिल की। भारतीय सेना को कारगिल के युद्ध में बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था । पाकिस्तानी सैनिक ऊंची पहाडिय़ों पर बैठे थे और हमारे सैनिकों को गहरी खाई में रहकर उनसे मुकाबला करना था । भारतीय जवानों को आड़ लेकर या रात में चढ़ाई कर ऊपर पहुंचना पड़ रहा था जोकि बहुत जोखिमपूर्ण था ।

कारगिल युद्ध के दौरान भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थे। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और रक्षामंत्री जार्ज फर्नांडीज भी जवानों का हौसला बढ़ाने के लिए 13 जून 1999 को खुद युद्ध के दौरान ही कारगिल पहुंच गए और तीन दिन वहां रहे। वहां उन्होंने सेना के जवानों और अफसरों से युद्ध की स्थिति का जायजा लेते हुए वहीं रहकर उनकी हौसला आफजाई की। कारगिल युद्ध के दौरान प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और रक्षामंत्री जार्ज फर्नांडीज को निशाना बनाने के लिए पाकिस्तान की ओर से जमकर फायरिंग हुई।

कारगिल युद्ध ने भारतीय सेना के शौर्य और बलिदान का अद्भुत प्रदर्शन के दुनिया में पहचान दी। कारगिल युद्ध भारत के वीर जवानों की गौरवगाथा का भी प्रत्यक्ष परिणाम है। कारगिल युद्ध में सैनिकों ने जिस जोश, जज्बा और जुनून से पाकिस्तानी सैनिकों के छक्के छुड़ाये, उसकी चर्चा आज भी भारतीय सेना में गौरव के साथ की जाती है। यह दिन है उन शहीदों को याद कर अपने श्रद्धा-सुमन अर्पण करने का, जिन्होंने हंसते-हंसते मातृभूमि की रक्षा के लिए मौत को गले लगा लिया। आज अगर हम देश की सरहद के बीच सकून और सुरक्षित होने का एहसास कर पा रहे हैं तो वह हमारे वीर सैनिकों की वजह से है। किसी ने दिलों को छू लेने वाला बहुत ही अच्छा शेर लिखा है कि

काश मेरी जिंदगी में सरहद की शाम आए, काश मेरा लहू वतन के काम आए,

न खौफ है मौत का, ना आरजू है जन्नत की, मगर जब जिक्र हो शहीदों का, तो शहीदों में मेरा भी नाम आए।

लेखक युद्धवीर सिंह लांबा, दिल्ली टेक्निकल कैंपस, बहादुरगढ़ जिला झज्जर, हरियाणा में रजिस्ट्रार के पद पर कार्यरत है ।

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