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राममंदिर निर्माण और सांस्कृतिक पुनर्जागरण

अयोध्या में भारत की आत्मा 'सनातन सँस्कृति का ध्वज लहराने जा रहा है

राममंदिर निर्माण और सांस्कृतिक पुनर्जागरण
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मुकेश शर्मा, योगेश पण्डित

5 अगस्त 2020 की तारीख भारतीय तथा विश्व इतिहास में महत्वपूर्ण तारीख बनने जा रही है। 500 साल के संघर्ष तथा लाखों लोगों के बलिदानों के उपरांत एक बार फिर सप्तपुरियों में से एक अयोध्या में भारत की आत्मा 'सनातन सँस्कृति का ध्वज लहराने जा रहा है। अन्य मन्दिरों के निर्माण की तरह यह एक सामान्य घटनाक्रम की गवाह नही, अपितु इतिहास, संस्कृति, राष्ट्र, धर्म तथा विशेष रूप से वैचारिक क्रांति के धरातल पर यह एक युग परिवर्तनकारी तारीख बनने जा रही है। जिसका महत्व भविष्य में अनेक वर्षों तक समय के चक्र की विशेष घटनाओं के महत्वपूर्ण कालखंड में गिना जाता रहेगा। सन् 1674 ई0 में जब छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा रायगढ़ के किले में वैदिक परम्परा से अपना राज्याभिषेक कराया गया था। तब भौगोलिक परिदृश्य में कुछ भी नही बदला था। शिवाजी महाराज राज्याभिषेक से पूर्व भी उस राज्य, उन अनेक किलों तथा उस भू-भाग के अधिपति थे। किन्तु अगर कुछ बदला था तो मानसिक तथा वैचारिक धरातल पर बदला था।। शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक के साथ ही हिंदू शक्ति के पुन: प्रकटीकरण की उद्घोषणा भी हो गयी थी। चीन, ब्रिटेन, फ्राँस, तुर्की, ईरान जैसें देशों से बधाई संदेशों के साथ ही हिन्दू शक्ति के स्वीकार्यता के सन्देश भी थे। उस दिन भारतीय समाज़ में एक विश्वास ने जन्म लिया था। और वह विश्वास था कि 'अरब, तुर्क, मुगल अजेय नही हैं, उन्हें हराया जा सकता है, खत्म किया किया जा सकता है; नामोनिशान मिटाया जा सकता है। यही वो विश्वास का बीज था, जिसकी परिणति 'बाजीराव ने मुगल साम्राज्य को ध्वस्त कर दिया था तथा बालाजी बाजीराव (नाना साहब पेशवा प्रथम) द्वारा एक बार पुन: हिंदवी ध्वज अटक से लेकर कटक तक लहराया जा रहा था। आज राममंदिर स्थापना के साथ वही विश्वास भारतीय समाज में पैदा होने जा रहा है। वास्तव में राममंदिर भारत के सांस्कृतिक उत्कर्ष तथा सनातन समाज के वैचारिक पुनर्जागरण का आधार बनने जा रहा है। यह मंदिर आत्मविश्वास खो चुके सनातनियों को विश्वास से भर देगा। जिससे उनके हृदय में अपनी सँस्कृति के उत्कर्ष तथा अखण्ड भारत की पुर्नस्थापना के स्वप्न का पुर्नसृजन होगा। भारतीय समाज़ वैचारिक आत्मसमर्पण और साँस्कृतिक पराधीनता की बेडिय़ों से मुक्त होकर अखण्ड भारत निर्माण तथा राष्ट्र के सांस्कृतिक उत्कर्ष से पुन: राष्ट्र को विश्वगुरु बनाने के लिए समर्थ भाव से उन्मुख हो पुन: विक्रमादित्य कालीन गौरव को प्राप्त करने की और अग्रसर होगा।

हजारों वर्षों तक अपनी पवित्र भूमि, अपने मन्दिर कभी रोमनों तो कभी बेबिलोनिया द्वारा गवां देने वाले यहूदियों ने सैकड़ों साल अलग-अलग देशों में प्रवासी का जीवन बिताकर कई पीढियां गुजार दी। उनकी मुख्य भूमी 'जेरूशलम कभी ईसाइयों के अधीन रही तो कभी मुस्लिमों का कब्जा रहा, उनके मन्दिर तोड़ दिए गए थे। वो उस गुलामी और जिल्लत के समय भी अपने राष्ट्र अपनी मुख्य भूमि पुन: प्राप्त करने का सपना हमेशा अपने मन मे जिंदा रखे। जब साम्राज्यवादी ताकतों का सिमटना शुरू हुआ तो अपनी योग्यता और क्षमता से अपने देश के एक हिस्से को पाने में सफल रहे । वहां पुन: अपनी सँस्कृति, और लगभग समाप्त हो चुकी अपनी भाषा को पुनर्जीवित किया। फिर भी कई वर्षों तक अपनी मुख्यभूमि को अपनी अधिकृत राजधानी बनाने में सफल नही हुए पर निरन्तर प्रयत्नशील थे।और अंतत: महाशक्ति अमेरिका द्वारा जेरूशलम को राजधानी स्वीकार कर अपना दूतावास जेरुशलम में स्थानांतरित करते ही इस्रायल को यहूदी राष्ट्र घोषित कर अपने हजारों वर्षों पूर्व खो चुके मूल्यों, अपनी संस्कृति, अपनी भाषा को स्थापित करने के सफल हुए।

भारत सरकार द्वारा भी नई शिक्षा नीति में 8 वर्षों तक मातृभाषा/ स्थानीय भाषा/राष्ट्रभाषा में शिक्षा की अनिवार्यता, गुलाम बनाने वालों की भाषा से भाषाई स्वतंत्रता की और राष्ट्र को ले जाने का शुरुआत है। असफ़लता निश्चित ही कुछ न कुछ सीख देकर जाती है किंतु सफलता का गुण है कि वह आपको आत्मविश्वास से भर देती है। यही आत्मविश्वास इतिहास, तंत्र और सीमाएं बदल देता है। 73 वर्षों से प्रतिवर्ष आजादी का जश्न मना रहे भारत में राममंदिर का निर्माण इतने वर्षों बाद होना सांस्कृतिक आजादी और यहूदियों की पवित्र भूमी जेरुशलम के यहूदियों द्वारा पुन: प्राप्त कर लेने की घटना के समान ही महत्त्वपूर्ण है। यूनेस्को द्वारा घोषित 46 प्राचीनतम सभ्यताओं में से एकमात्र शेष बची सनातन हिन्दू सभ्यता, जो हजारों वर्षों से आक्रांताओं द्वारा नष्ट कर देने के लिए शिकार होते रही, इन हज़ार बर्षों में संसार मे निरन्तर बलिदान देकर अपने चिंन्ह बनाए रखने में आजतक सफल रही । वो सभ्यता पिछले लगभग 250 वर्ष पूर्व शुरु किए गए कूटनीतिक षड्यंत्रकारी युद्धों में बहुत कम भू-भाग पर सिमटकर रह गयी है। ऐसें समय मे राममंदिर निर्माण किसी शनै-शनि मृत्यु की और अग्रसर हो रहे जीवन को संजीवनी मिल जाने का प्रतीक है। इससे सनातन सँस्कृति द्वारा एक बार पुन: उन मिशनरी, जेहादी, तथाकथित लिब्लर्स सहित समस्त कारकों के समक्ष पूरी प्रबलता से प्रतिकार कर स्थापित हो जाने की उद्घोषणा का पर्याय होगा, जो निरन्तर विभिन्न प्रकार से इसे सांस्कृतिक रूप से नष्ट कर देने के लिए कार्य कर रहे हैं। आक्रांता मुगल, तुर्कों द्वारा कालांतर में विभिन्न नगरों के नाम बदलकर गुलामी के चिंन्ह भारत के माथे पर छोड़ रखे हैं। इनमें सबसे बड़ा नाम तीर्थों के राजा माने जाने वाले तीर्थराज प्रयाग का पुन: प्राचीन नामकरण इसी सांस्कृतिक पुनर्जागरण की कड़ी का एक हिस्सा है। अन्यथा विश्व में अन्य संस्कृति तो अभी भी विध्वंसकारी, नकारात्मक काम कर रही हैं,और बहुत पुरानी बात नहीं है कि अफगानिस्तान के बामियान में पहाड़ों में बनाई गई बड़ी-बड़ी बौद्ध प्रतिमाओं को तालिबानी आतंकवादियों ने तोपों से उड़ा दिया और कुछ माह पूर्व ही पाकिस्तान में मिली प्राचीन बौद्ध मूर्तियों को ध्वस्त कर दिया गया। और भारत में तो ऐसे आतंकी-आक्रांता कारनामों के उदाहरण यहां-वहां बिखरे पड़े हैं। चाहे वह ज्ञानवापी मस्जिद हो, कृष्ण जन्मभूमि हो या उत्तर भारत के हजारों हजार हिंदू- जैन-बौद्ध मंदिरों को ध्वंस करने के मामले हो। भोपाल के पास लगभग 20 किलोमीटर दूर प्राचीन ऐतिहासिक समसगढ़ का जैन मंदिर है। जिसकी पहाड़ी पर और आसपास के क्षेत्र में पत्थर-पत्थर की खंडित कलाकृतियां और मूर्तियां भी इस बात की गवाह है कि कट्टर- जेहादी सोच वाली संस्कृति का कला और रचनात्मकता से कितना विरोध हो सकता है,और किसी धर्म का ऐसा आधार कितना नुकसानदायक और विकृत मनोवृति या संकीर्ण सोच का द्योतक हो सकती है। जो व्यक्ति के ज्यादा शिक्षित हो जाने पर उतना ही बड़ा आतंकी बनाने को प्रेरित करती है। ओसामा बिन लादेन, अल जवाहरी, अबु बकर बगदादी, और कश्मीरी आतंकी प्रो. अफजल, हिजबुल आतंकी बुरहान वाणी, आदि लोग इनके शिक्षित होकर भी आतंकी बनने के बड़े उदाहरण हैं।

ऐसे में लगभग 500 साल के हर प्रकार के संघर्ष के बाद राम मंदिर के गौरव के पुनर्स्थापित होने से पैदा हुआ आत्मविश्वास भारतीय जनमानस में एक काट दिए गए पेड़ के जड़ से पुन: विशाल वृक्ष में बदल जाने के लिए उगने की और अग्रसर होने की सूचना देता है। हालांकि बेहतर होता कि है यह आपसी सौहार्द और प्रेम के साथ बनता, लेकिन इसमें ना तो मुस्लिम नेतृत्व और समाजसेवी लोग आगे आए,ना ही इनकी राजनीति करने वाले अन्य राजनीतिक दलों ने इस काम में कोई सकारात्मक भूमिका निभाई,बल्कि लगातार मंदिर निर्माण के हर चरण में इन लोगों ने रोड़े अटकाने के प्रयास किए। और तो और सभी जगह असफल होने के बाद न्याय की जीत होने पर भी एक कुलषित मानसिकता के तहत साधु संतों के माध्यम से राम मंदिर निर्माण के मुहूर्त को ही विवाद का मुद्दा बनाने लगे। और तथाकथित गौ भक्त मोहम्मद फैज को मुस्लिम प्रतिनिधि बनाते हुए ,सौहार्द की पुंगी बजाते हुए पदयात्रा कर कौशल्या मंदिर की मिट्टी डालने जैसे बेवजह के रिकॉर्ड बनाने वाले भावनात्मक कामों का सहारा भी लिया जा रहा है।

भारतीय समाज कल तक पाश्चात्य भाषा और पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण कर रहा था। उसी समाज़ में सृजित हो रही नई कोपलें अपनी मूल पहचान, मूल संस्कृति के लिए गौरवान्वित महसूस कर लिबरल, सिकुलर, वामपंथी, ऐक्टिविस्ट्स, फेमिनिस्ट्स आदि हमलों का अपने स्तरों पर प्रतिकार कर रही है। यही विश्वास जो शनै-शनै भारतीय नवांकुरों के हृदय में स्थापित हो रहा है, मंदिर निर्माण उसे स्थापन से श्रेष्ठता की और अग्रसर होने के लिए प्रेरित करेगा। इसी के साथ पुरानी गलतियों को दुरुस्त करते हुए,सभी संस्कृतियों में प्रेम सद्भावना की शुभकामनाओं के साथ, सभी को बधाई।

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