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मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम, आरोप और सत्य

रामजन्मभूमि भूमिपूजन - 3

मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम, आरोप और सत्य
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बलबीर पुंज

श्रीराम भारतीय सनातन संस्कृति की आत्मा है और उनका जीवन इस भूखंड में बसे लोगों के लिए आदर्श। राम मर्यादा पुरुषोत्तम है। अर्थात्- उन्होंने मर्यादा की परिधि में रहते है। निजी या पारिवारिक सुख-दुख उनके लिए कर्तव्य के बाद है। जब श्रीराम अयोध्या नरेश बने, तब उनके लिए बाकी सभी संबंध गौण हो गए। एक धोबी के कहने पर वह अपनी प्रिय सीता का त्याग कर देते है। आज के संवाद शैली में धोबी दलित है। परंतु राम के लिए, प्रजा रूप में, उसके शब्द मानो ब्रह्म वाक्य हों। अवश्य ही यह उनके अपने लिए, सीता और उनकी होने वाली संतानों पर घोर अन्याय है। परंतु राजधर्म अपनी कीमत मांगता है।

श्रीराम ने सीता की अग्निपरीक्षा क्यों ली?- क्योंकि एक शासक के रूप में वह अपने आपको और परिवार को जनता के रूप उत्तरदायी मानते है। महर्षि वाल्मिकी प्रणीत रामायण में श्रीराम कहते हैं, प्रत्ययार्थं तु लोकानां त्रयाणां सत्यसंश्रय:। उपेक्षे चापि वैदेहीं प्रविशन्तीं हुताशनम्।। अर्थात्- तथापि तीनों लोकों के प्राणियों के मन में विश्वास दिलाने के लिए एकमात्र सत्य का सहारा लेकर मैंने अग्नि में प्रवेश करती विदेह कुमारी सीता को रोकने की चेष्ट नहीं की।

युद्ध में विजयी होने के पश्चात श्रीराम का कौन सा रूप सामने आया है? व्यक्ति का असली परिचय उसकी घोर पराजय या विजय में होता है। न तो राम ने बालिवध के बाद किष्किन्धा पर कब्जा किया और ना ही लंका पर। किष्किन्धा में सुग्रीव को राम राजा घोषित करते है। रावण वध के पश्चात वे लक्ष्मण को आज्ञा देते है कि वह लंका जाए और विधिवत रूप से विभीषण का राज्याभिषेक करें। श्रीराम द्वारा किया गया युद्ध लालच और राज्यलिप्सा से प्रेरित नहीं, अपितु धर्म की रक्षा हेतु है। इसलिए वह किष्किन्धा या लंका को अपना औपनिवेश नहीं बनाते। मर्यादा और मानवता अक्सर युद्ध की विभिषका में कुचली जाती है। इस संबंध में वर्ष 1899 और 1907 के हेग कंवेन्शन में विभिन्न देशों ने युद्ध-नियमावली और युद्ध-अपराध के संदर्भ में बहुपक्षीय संधि हस्ताक्षर किया था। अर्थात्- शेष विश्व ने युद्ध के समय मानवीय मूल्यों और मर्यादा की रक्षा लगभग 150 वर्ष पहले की थी। किंतु सनातन भारत में यह जीवन मूल्य श्रीराम के जीवनकाल काल से भी पहले चले आ रहे है।

यह बात अलग है कि हेग कन्वेंशन के बाद भी प्रथम-द्वितीय विश्वयुद्ध, हिटलर द्वारा यहूदियों के उत्पीडऩ, स्टालिन-लेनिन द्वारा वैचारिक विरोधियों (कैदियों) के दमन और चीन-जापान के बीच हुए युद्धों आदि में मानवता और मर्यादा की सीमा लांघी गई। मनुष्य का मनुष्य के प्रति वहशीपन पूरी वीभत्सता के साथ सामने आया। भारत ने भी इसका दंश झेला है। इस्लामी आक्रांताओं ने पिछले 800 वर्षों में जब-जब यहां के हिंदू शासकों पर विजय प्राप्त की, तब उन्होंने न केवल पराजितों का नरसंहार किया, साथ ही पराजित महिलाओं की अस्मिता रौंद दी, उनका बलात्कार किया, स्थानीय हिंदुओं को इस्लाम अपनाने या मौत चुनने के लिए बाध्य किया और उनके पूजा-स्थलों व मानबिंदुओं को ध्वस्त कर दिया गया।

इसके विपरीत, श्रीराम का आचरण कैसा है? जब राम लंका पर विजय प्राप्त करते है, तब वह विभीषण से रावण के शव का विधिवत संस्कार करने के लिए कहते है। भगवान वाल्मिकीजी के अनुसार, विभीषण अपने भाई के किए पर लज्जित है। वह अपने मृतक भाई के साथ कोई भी संबंध नहीं रखना चाहते। वह रावण के अंतिम संस्कार करने में संकोच करता है। तब श्रीराम कहते है, 'मरणान्तानि वैराणि निर्वृत्तं न: प्रयोजनम्। क्रियतामस्य संस्कारो ममाप्येष यथा तव।। अर्थात्- विभीषण! बैर जीवन काल तक ही रहता है। मरने के बाद उस बैर का अंत हो जाता है। अब हमारा प्रयोजन सिद्ध हो चुका है, अत: अब तुम इसका संस्कार करो। इस समय यह जैसे तुम्हारे स्नेह का पात्र है, उसी तरह मेरा भी स्नेह भाजन है। यही नहीं, युद्ध पश्चात पराजित रावण के परिवार और उसके सैनिकों की महिलाओं के साथ किसी भी प्रकार का दुव्र्यवहार नहीं हुआ। श्रीराम, विभीषण से उन सभी महिलाओं को सांत्वना देने और अपने निवास स्थान लौटने का अनुरोध करते है।

यह सही है कालांतर में युद्ध नियमों के पालन में ह्रास होता चला गया। महाभारत का दौर इसका ज्वलंत उदाहरण है, जहां लाक्षाग्रह, धूर्त-क्रीड़ा, द्रौपदी चीरहरण, कौरव-पांडव द्वारा युद्ध के दौरान छल-कपट (अभिमन्यु, द्रौणाचार्य और दुर्योधन की हत्या) से श्रीराम द्वारा स्थापित जीवन मूल्यों का क्षीण होना प्रारंभ हुआ। शायद वर्तमान समाज में जीवन-मूल्यों में गिरावट का यह बड़ा कारण है।

भारत में श्रीराम के जीवनदर्शन और परंपराओं का वास्तविक जीवन में अनुरकण करने का प्रयास भी हुआ है। वीर छत्रपति शिवाजी और अदम्य साहसी महाराणा प्रताप इसके उदाहरण है। जब-जब इन वीरपुरुषों ने मुगलों को युद्धों में पराजित किया, तब-तब विजितों (महिलाओं सहित) का मर्यादा पूर्ण सम्मान किया। मुस्लिम स्त्रियों के साथ दुव्र्यवहार की संभावना को रोकने के लिए सिख गुरु श्रीगोविंद सिंहजी द्वारा एक सच्चे सिख का उनसे यौन-संबंध बनाना वर्जित किया। स्पष्ट है कि श्रीराम का पराजितों से व्यवहार केवल रामायण के पन्नों तक सीमित नहीं है।

लगभग 500 वर्ष पहले जहां अयोध्या स्थित राम मंदिर को जिहादी मानसिकता द्वारा ध्वस्त किया गया था, तो अब उसी विषाक्त दर्शन के मानसपुत्र श्रीराम की छवि, उनके जीवनदर्शन और चरित्र को धूमिल करने का कुप्रयास कर रहे है। यह जमात श्रीराम को पिछड़ा, आदिवासी, दलित और स्त्री विरोधी कहकर संबोधित करती आ रही है। इसके लिए वे श्रीमद् गोस्वामी तुलसीदासजी कृत रामायण की चौपाई:- 'ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताडऩा के अधिकारी।। का कपटपूर्ण विवेचना करते हैं।

रामकथा को तुलसीदासजी ने अपने शब्दों में पिरोया है। इसमें विभिन्न पात्रों द्वारा बोले गए संवाद भी है। दुराचारी रावण अक्सर श्रीराम, सीता और हनुमान के लिए अपशब्दों का प्रयोग करता है। क्या इन्हें गोस्वामीजी के शब्द कहना तार्किक होगा? परंतु माक्र्स-मैकॉले और जिहादी मानसपुत्रों ने उपरोक्त चौपाई को अपने एजेंडे अनुरूप व्याख्या की है। यह शब्द ना ही राम के है और ना रामायण के ऐसे चरित्र के, जिसे हिंदू पूजनीय मानते हो। राम लंका जाने के लिए समुद्र से मार्ग मांग रहे है। परंतु वह हठी है। राम की प्रार्थना को अनसुना कर देता है, तब राम को क्रोध आता है और वे कहते हैं, 'बिनय न मानत जलधि जड़, गए तीनि दिन बीति। बोले राम सकोप तब, भय बिनु होइ न प्रीति॥ अर्थात्- तीन दिन बीत गए, किंतु जड़ समुद्र विनय नहीं मानता। तब श्रीरामजी क्रोध सहित बोले- बिना भय के प्रीति नहीं होती। इसके उत्तर में, जो डरा हुआ सागर कहता है, 'प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्हीं। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्हीं॥ ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताडऩा के अधिकारी॥ अर्थात्- प्रभु ने अच्छा किया, जो मुझे शिक्षा (दंड) दी, किंतु मर्यादा (जीवों का स्वभाव) भी आपकी ही बनाई हुई है। ढोल, गँवार, शूद्र, पशु और स्त्री- ये सब शिक्षा के अधिकारी हैं।

अपने सबसे कष्टमयी काल में श्रीराम ने सहयोगी और सलाहकार केवट, निषाद, कोल, भील, किरात, वनवासी और भालू को बनाया। यदि श्रीराम चाहते तो, उस संकट में उन्हे अयोध्या या जनकपुर से एकाएक सहायता उपलब्ध हो जाती। परंतु श्रीराम के साथी वे लोग बने, जिन्हें आज के विमर्श में वनवासी, आदिवासी, पिछड़ा या अति-पिछड़ा कहा जाता है। इन सभी को श्रीराम जहां 'सखा कहकर संबोधित करते है, वही वनवासी हनुमान उनके लिए लक्ष्मण से भी अधिक प्रिय है- 'सुनु कपि जियँ मानसि जनि ऊना। तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना॥ अर्थात्- हे कपि! सुनो, मन में ग्लानि मत रखना। तुम मुझे लक्ष्मण से भी दूने प्रिय हो। जब भरत राम प्रार्थना करते हुए अयोध्या वापस ले जाने का उपक्रम करते है, तो राम के 'सखा केवट को देखकर राजा भरत रथ से उतर जाते है। राम सखा सुनि संदनु त्यागा। चले उचरि उमगत अनुरागा॥ अर्थात्-यह श्रीराम के मित्र है, इतना सुनते ही भरतजी ने रथ त्याग दिया। वे रथ से उतरकर प्रेम में उमंगते हुए उनके पास चले गए। भील समुदाय की शबरी, जिसका पिछड़ापन दोहरा है, उसके झूठे बेर प्रेम से ग्रहण करते है। शबरी राजा राम को देखकर सकते में है और वह कहती हैं, 'अधम ते अधम अधम अति नारी। तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी।। कह रघुपति सुनू भामिनी बाता। मानाउँ एक भागति कर नाता।। अर्थात्- जो अधम से भी अधम हैं, स्त्रियां उनमें भी अत्यंत अधम हैं, और उनमें भी हे पापनाशन! मैं मंदबुद्धि हूं। इसपर श्रीरघुनाथजी ने कहा- हे भामिनि! मेरी बात सुन! मैं तो केवल एक भक्ति ही का संबंध मानता हूं। 'जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धनबल परिजन गुन चतुराई।। भगति हीन नर सोइह कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा।।Ó अर्थात्- जाति, पांति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, बल, कुटुम्ब, गुण और चतुरता- इन सबके होने पर भी भक्ति से रहित मनुष्य कैसा लगता है, जैसे जलहीन बादल (शोभाहीन) दिखाई पड़ता है।

श्रीराम के स्नेह की कोई सीमा नहीं। सीता की रक्षा में अपने प्राणों की बाजी लगाने वाले गिद्धराज जटायु को श्रीराम उसके कर्मों से देखते है और पिता का दर्जा देकर उनका अंतिम-संस्कार करते है। श्रीमद्वाल्मिकीय रामायण के रचिता मुनि वाल्मिकी- जिनके परिचय में अक्सर व्याध, ब्राह्मण और शूद्र का उपयोग होता है- उन्हें किसी जाति विशेष की परिधि में बांधना उचित नहीं। वे श्रीराम की महिमा गाते-गाते स्वयं भगवान हो गए है।

स्त्री के प्रति श्रीराम का आचरण आदर्श है। उन्होंने बालि और रावण से युद्ध केवल स्त्री के सम्मान और शालीनता की रक्षा हेतु लड़ा। बाणों से घायल बालि जब राम से पूछता है- मैं बैरी सुग्रीव पिआरा। अवगुन कवन नाथ मोहि मारा॥ तब राम उत्तर देते हैं- अनुज बधू भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी॥ इन्हहि कुदृष्टि बिलोकइ जोई। ताहि बधें कछु पाप न होई॥ अर्थात्- छोटे भाई की पत्नी, बहन, पुत्रवधु और बेटी- ये चारों एक समान हैं। इन्हें जो कोई बुरी दृृष्टि से देखता है, उसे मारने से कोई पाप नहीं होता॥

राम का जीवन-चरित्र जन्म, जाति और भौतिकता से ऊपर है। पुलस्त्य कुल में उत्पन्न महाज्ञानी ब्राह्मण- रावण का राम वध करते है, क्योंकि वह अपने आचरण से भ्रष्ट है। शबरी, हनुमान और गिद्धराज जटायु उनके स्नेह के पात्र है। श्रीराम कर्म और भाव को महत्व देते है। आचरण धर्म से मर्यादित है। इन्हीं जीवन-मूल्यों के आधार पर वह रामराज्य की स्थापना करते है, और वह कल्पना आज के समय में गांधीजी का सपना बन जाता है। राम समसृष्टि है और समरस समाज के पालक है।

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