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मंजीत के सर्वस्व त्याग से अभिभूत विश्व

केलिफोर्निया में स्थित किंग्स नदी में डूब रहे तीन बच्चों को बचाते-बचाते अपना बलिदान कर देने वाले मंजीत सिंह

विकेश कुमार बडोला

जब हम एक सुंदर दिवस के सूर्योदय में चमकती प्रकृति और इसके समस्त प्राकृतिक उपक्रमों को ध्यानपूर्वक देखते हैं तो हमें जीवन से एक विशिष्ट लगाव हो जाता है। हमें प्रकृति, इसके समस्त उपक्रम, परिवारीजन, समाज, लोग, नगर, प्रांत, गांव, राज्य, राष्ट्र और यहां तक कि विश्व भी अच्छा लगने लगता है। एक राष्ट्र के नागरिक के रूप में हमें विश्व के अन्य राष्ट्रों से भी स्नेह होने लगता है। अन्य राष्ट्रों की विशेषताओं और दिनचर्याओं में हम रुचि लेने लगते हैं। परराष्ट्रीय संस्कृति और संस्कारों को आत्मसात करने लगते हैं। जब ऐसा होता है तो समझना चाहिए कि हम में एक विलक्षण मानवता आकार लेने लगी है। ऐसे में हमारा हृदय उदार हो उठता है। इस उदारता में यह भावना घनीभूत होने लगती है कि हमारे राष्ट्र के चारों ओर फैले अन्य राष्ट्र हमारे लिए उपयोगी और सहायक हैं। यदि यह भावना प्रत्येक राष्ट्र के अधिसंख्य लोगों में उभरती है तो निश्चित रूप में पृथ्वी का मानव-जीवन ही नहीं, बल्कि वन्य जीव-जंतुओं का जीवन भी आनंद और प्राकृतिक संस्कारों से भर जाएगा।

ऐसी उदारभूत गहन मानवीय भावना अनेक लोगों में हिलोरें ले रही होती है। वे इस के वशीभूत होकर प्रतिक्षण कोई न कोई मानवोपयोगी कार्य करते रहना चाहते हैं। ऐसे लोग चाहे अपने देश में रहें या विदेश में उनकी मनुष्यता किसी न किसी परोपकारी कार्य के रूप में प्रदर्शित होती ही रहती है। नकारात्मकता, विध्वंश, मृत्यु, महामारी एवं एक-दूसरे को कुचल कर आगे बढऩे की होड़ से ग्रस्त विश्व के अनेक देशों और उनके लोगों के लिए मनुष्यता और परोपकार का ऐसा ही अनुपम उदाहरण बने हैं अ_ाईस स्वर्गीय मंजीत सिंह।

अमेरिका के कैलिफोर्निया नगर में घटी घटना के अनुसार तीन बच्चे खेलते-खेलते नगर की किंग्स नदी में गिर गए। दो आठ वर्षीय लड़कियों और एक दस वर्षीय लड़के को तेज बहाव पानी में डूबता देख मंजीत ने तुरंत नदी में छलांग लगा दी। वे तीन बच्चों को बचाने में तो सफल हो गए परन्तु स्वयं नदी की तेज धारा में बह गए। स्थानीय पुलिस ने जब मंजीत को नदी से बाहर निकाला तो उनका देहांत हो चुका था।

यह घटना लोगों की शुष्क पड़ी चेतना को खोलने के लिए एक अविस्मरणीय घटना है। एक व्यक्ति नदी में डूबते बच्चों को बचाने एक क्षण के लिए भी कुछ नहीं सोचता। वह बच्चों के प्राण बचाने अपना सर्वस्व झोंक देता है। एक आदर्श मनुष्य समाज के लिए इससे अधिक प्रेरणादायी शिक्षा और क्या हो सकती है! पूरे अमेरिका में इस घटना की चर्चा चल रही है। आज मंजीत सिंह अमेरिका के लिए वंदनीय व्यक्ति हो चुका है। मंजीत सिंह ने अन्य व्यक्तियों के प्राण बचाने के लिए जो बलिदान किया है, उससे भारतवासी भी गर्वानुभूतियों से संचित हैं।

हालांकि सदी के विगत सात महीनों में मनुष्य की मृत्यु सर्वाधिक उपेक्षित हुयी है और इस कारण दुनिया में कहीं भी किसी भी मनुष्य की मृत्यु होना अब अति साधारण बात है, परन्तु मंजीत सिंह जैसे व्यक्तियों की मृत्यु भुला दी जानेवाली मृत्यु नहीं, बल्कि चिरस्मरणीय महान बलिदान है। मंजीत सिंह ने तीन बच्चों के प्राण ही नहीं बचाए, बल्कि उसने दो मित्र राष्ट्रों (भारत-अमेरिका) की मित्रता के आधार बिंदुओं को भी घनीभूत किया है। मंजीत जैसे मनुष्यों के परोपकारी और बलिदानी कार्यों से राष्ट्रों को यह शिक्षा प्राप्त होती है कि स्वतंत्र भूखण्ड के आधार पर निर्धारित राष्ट्रों की महत्ता तब ही सिद्ध हो सकती है, जब वे सार्वभौमिक और सार्वदैशिक कल्याण उद्देश्यों से जुड़े रहें। मंजीत ने राष्ट्रों के लिए महत्वपूर्ण एक ऐसे ही श्रेष्ठ उद्देश्य हेतु अपना योगदान दिया है।

जिस समय कोरोना महामारी से दुनिया के दो करोड़ लोगों के संक्रमित होने एवं लगभग साढ़े सात लाख लोगों की संक्रमण से मृत्यु होने का भयाक्रांत सत्य हमारे सम्मुख प्रकट हो और अधिसंख्य देशों द्वारा चीन जैसे देश को कोरोना उत्सर्जन व प्रसारण का सिद्धदोषी माना जा रहा हो, उस कठिन समय में एक क्षण गंवाए बिना ही दूसरे मानवों के प्राण बचाने के लिए अपना जीवन मिटा देनेवाले मंजीत सिंह विश्व के लिए नोबल व्यक्ति बन जाते हैं। यदि विश्व के कर्ताधर्ताओं में मनुष्यता का समुचित मूल्यांकन करने की योग्यता शेष है तो उन्हें मंजीत को शांति का नोबल पुरस्कार दे देना चाहिए। जो व्यक्ति अपने जीवन के कुछ क्षणों के प्रदान से तीन बच्चों को जीवनदान दे सकता है, जीवित रहते हुए वह प्रतिक्षण मानवता के कितने विशाल दायित्व से संचित रहा होगा अथवा यदि वह जीवित रहता तो समाज के लिए कितना उपयोगी होता!

विश्व में कोरोना ने लोगों को कायिक रूप में ही नहीं मारा, बल्कि उन्हें भावनात्मक मृत्यु भी दी है। मनुष्य जीवन की बुराइयों, दुर्गुणों, स्वार्थ और पतन ने कोरोनाग्रस्त जगत में अति उत्पात मचाया है। इस समयावधि में मानवीय संबंधों को अकल्पनीय तरीके से टूटते देखा गया है। परिवार तक में मनुष्यों ने एक-दूसरे के प्रति मनुष्यता का दायित्व नहीं निभाया। ऐसे में विश्व के राष्ट्रों और उनके शासकों के सम्मुख प्रमुख कार्य दायित्व यही है कि वे सर्वप्रथम अपने-अपने नागरिकों को मानवता का पाठ पढ़ाएं और उन्हें अच्छे व सकारात्मक कार्यों के लिए पारस्परिक सहयोग व सहायता की शिक्षा दें। यदि वे इस हेतु किए जा रहे अपने प्रयासों में सफल नहीं हो रहे तो उनके सम्मुख मंजीत सिंह की घटना भी है, जिसकी शिक्षा उन्हें अपने नागरिकों को अवश्य देनी चाहिए। हो सकता है जगत में अनेक मंजीत सिंह हों, जो किसी कारणवश अपने-अपने परोपकारी बलिदानों के लिए प्रसिद्ध न हो सके हों। अत: विश्व के कर्ताधर्ताओं को ऐसे लोगों की खोज एवं पहचान करके उनके परोपकारी कार्यों को विश्व विरासत के रूप में नामांकित करना चाहिए, ताकि अधिसंख्य लोगों को उनके जीवन की शिक्षा से अभिसिंचित किया जा सके।

जो समय दुनिया के साधारण और विशिष्ट दोनों प्रकार के अधिसख्ंय लोगों को जीवन के संबंध में आत्मसाक्षात्कार नहीं करने दे रहा और निरंतर अमानवीयता के अंधेरों की ओर बढ़ रहा है, उसमें एक व्यक्ति द्वारा अन्य व्यक्तियों की जीवन रक्षा के लिए स्वयं को होम कर देने की घटना एक स्वप्निल घटना ही प्रतीत होती है। यह अद्भुत पराक्रम है। इससे बलिदान गति को प्राप्त व्यक्ति की आंतरिक भावना का शिक्षाप्रद प्रकटीकरण होता है। आज के बच्चों को जीवन के सद्गुणों से अभिसिंचित करने के लिए यह शिक्षा मौलिक शिक्षा बननी चाहिए।

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