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लेफ्ट- लिबरल गिरोह का अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पाखंड

लेफ्ट- लिबरल गिरोह के दबाव में आकर पुस्तक के प्रकाशन को वापस लेने की घोषणा की है

लेफ्ट- लिबरल गिरोह का अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पाखंड
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डा. समन्वय नंद

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करने वाले व स्वयं को इसका चैंपियन बताने वाले लोगों के पाखंड का एक बार फिर से पर्दाफाश हो गया है। दिल्ली में हुए भीषण दंगे को लेकर मोनिका अरोडा, सोनाली चितलकर व प्रेरणा मलहोत्रा की पुस्तक 'दिल्ली रायट्स 2020 : दी अनटोल्ड स्टोरी नामक पुस्तक के प्रकाशक ब्लूम्सबरी इंडिया ने लेफ्ट- लिबरल गिरोह के दबाव में आकर पुस्तक के प्रकाशन को वापस लेने की घोषणा की है । इस पुस्तकों के लेखकों ने दिल्ली में हाल ही में हुए दंगों की जांच की तथा पीडित परिवारों से साक्षातकार कर इस पुस्तक को तैयार करने की योजना बनायी थी । यह वास्तव में जो घटनाएं घटित हुई हैं उसका एक प्रकार से दस्ताबेजीकरण था । लेखकों के अनुसार इस पुस्तक में दिल्ली दंगों में शहरी नक्सलों की भागिदारी के बारे में जो जानकारी मिली थी उसे भी इसमें शामिल किया गया था । यह एक तरह से दिल्ली दंगे के सच को उजागर करने वाली पुस्तक थी ।

इस पुस्तक को लेकर एक वर्चुअल प्री पब्लिकेशन इंवेंट किया गया था । इसमें लेखको के साथ साथ फिल्म निदेशक विवेक अग्निहोत्री, पत्रकार नुपूर शर्मा, भाजपा नेता कपिल मिश्रा व अन्य लोग शामिल होने वाले थे । इसकी सूचना मिलते ही लेफ्ट : लिबरल गिरोह सक्रिय हो गया था तथा सोशल मीडिया में इस प्रस्तावित पुस्तक के खिलाफ जहर उगलना शुरु कर दिया था । लेफ्ट : लिबरल गिरोह के साथ साथ कुछ इसलामिस्ट लेखक व एक्टिविस्ट इस पुस्तक के खिलाफ सोशल मीडिया में लिखना शुरु कर दिया था । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ अपने पूर्वाग्रहों के लेकर प्रसिद्ध आतीश तासिर ने ट्वीट कर कहा कि वामपंथी इतिहासकार विलियम डेरेम्पल ने ब्लूम्सबरी इंडिया द्वारा इस पुस्तक को वापस करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। इस पुस्तक को वापस लेने का जो इतना अच्छा कार्य हुआ है वह उनके बिना संभव नहीं हो पाता । इस कारण वह विलियम के प्रति आभार व्यक्त करते हैं ।

इस पूरे प्रकरण में अनेक बातें स्पष्ट हुई हैं । जो लोग अपने आप को उदारवादी बता कर स्वयं का प्रचार करते हैं तथा दूसरों पर फासीवादी होने और न जाने किन- किन शब्दों का प्रयोग करते हैं वास्तव में वे ही फासीवादी हैं । वे भले ही अपने आप को उदारवादी बताने का ढोंग करते हों लेकिन वास्तव में वे कोई अन्य विचार को सहन ही नहीं करते । अभिव्यक्ति की स्वतत्रता का मतलब उनके लिए सिर्फ अपनी बात कहने तक सीमित है । वे अपने से अलग विचार रखने वालों को सुनने के लिए भी तैयार नहीं हैं बल्कि ऐसे विचारों का गला घोंट कर हत्या करते हैं । दिल्ली रायट्स 2020 : दी अनटोल्ड स्टोरी पुस्तक का प्रकाशन रुकवा कर उन्होंने अपने इस बात को फिर से एक बार प्रमाणित किया है ।

यदि ये लेफ्ट - लिबरल गिरोह वास्तव में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पक्षधर होती तो कायदे से इस पुस्तक का विरोध नहीं करती और पुस्तक के प्रकाशन के बाद इसे पढ कर इस पर बहस का आयोजन करती जोकि लोकतंत्र का प्राण है । लेकिन जैसा कि उपर उल्लेख किया गया है कि इस गिरोह के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब केवल अपने बात करने का अधिकार तक सीमित है तथा विरोध के विचारों को कैसे कुचला जाता है उन्हें भलीभांति आती है । यही कार्य वे वर्षों से करते आ रहे हैं । इस पुस्तक के प्रकाशन को वापस लेने के बाद अब ये लेफ्ट- लिबरल गिरोह के सदस्य सोशल मीडिया में छलांगे लगाते हुए दिख रहे हैं । पब्लिशिंग हाउस ब्लूम्सबरी के निर्णय का अत्यंत प्रसन्नता के साथ स्वागत कर रहे हैं और कह रहे हैं कि ऐसी पुस्तक नहीं प्रकाशित होनी चाहिए। जब पुस्तक प्रकाशित ही नहीं हुई है और गिरोह के लोगों ने उसे पढा ही नहीं है तो फिर उस पुस्तक का विरोध वे किस आधार पर कर रहे हैं ।

यहां पर एक और विषय भी सामने आता है जिस पर विचार किया जाना चाहिए । वामपंथी- लिबरेलों की एक जबरदस्त इको सिस्टम है और वह कितनी प्रभावशाली है इस बात की ओर भी यह घटना संकेत करती है । ये लोग अपने खिलाफ किसी भी प्रकार के सही बहस को खडा करने देते ही नहीं है। इस इको सिस्टम के पास इतनी शक्ति है और इतना दबाव डालने की क्षमता रखते हैं कि वह किसी भी पुस्तक के प्रकाशन पर रोक लगवा सकते हैं । यह भी कहा जा सकता है कि प्रकाशन संस्थाएं भी उनके इस इको सिस्टम के ही हिस्से हैं ।

बडी आश्चर्य की बात यह है कि पब्लिशिंग हाउस ब्लूम्सबरी ने लेफ्ट- लिबरल गिरोह के कहने पर 'दिल्ली रायट्स 2020: दी अनटोल्ड स्टोरी को तो वापस ले लिया लेकिन प्रकाशन ने दिल्ली दंगे के मुख्य आरोपित ताहिर हुसैन को निर्दोष साबित करने वाले लेखकों के पुस्तक को न केवल प्रकाशित किया है बल्कि उसे लगातार प्रोमोट भी कर रही है । ब्लूम्सबरी इंडिया ने जिय़ा उस सलाम और उज़मा औसफ़ द्वारा लिखित पुस्तक 'शाहीन बाग : फ्रॉम ए प्रोटेस्ट टू ए मूवमेंट प्रकाशित की है। उस किताब में शाहीनबाग के पूरे घटनाक्रम का उल्लेख किया गया है। पुस्तक में पिछले साल नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ मुस्लिम महिलाओं के नेतृत्व में किए गए विरोध प्रदर्शन के बारे में बताया गया है। जिसका समापन इस साल फरवरी में दिल्ली के दंगों के रूप में हुआ था। इस घटना ने लेफ्ट - लिबरेलों के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पाखंड को तो उजागर किया है, इसके साथ ही यह भी साफ किया है कि लेफ्ट- लिबरल इको सिस्टम तथा इसलामी व विदेशी गिरोह भारत में ही भारत की बात करने नहीं दे रहा है । इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि भारतीय सभ्यता पर हो रहे लगातार हमलों के खिलाफ ऐसे ही इको सिस्टम तैयार हो । तभी वास्तव में वास्तविक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्राप्त हो सकेगी अन्यथा इसके नाम पर लेफ्ट - लिबरेलों का पाखंड जारी रहेगा ।

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