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जलता स्वीडन पूछता है प्रश्न, जिसको दी शरण उसी ने आग में झोका

मानवता की धरातल पर उठने वाले परोपकारी कदमों पर प्रश्न चिन्ह खडा कर दिया

जलता स्वीडन पूछता है प्रश्न, जिसको दी शरण उसी ने आग में झोका
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विष्णुगुप्त

मुस्लिम हिंसा में जलता स्वीडन सिर्फ नार्डिक देशों ही नहीं बल्कि पूरे यूरोप को डरा दिया है, भयभीत कर दिया है, कानून के शासन पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है, मानवता की धरातल पर उठने वाले परोपकारी कदमों पर प्रश्न चिन्ह खडा कर दिया है, बहुलतावादी समाज की कल्पना को डिगा दिया है, बर्बरता और कबिलाई मानसिकता के प्रचार-प्रसार को रेखांकित कर दिया है। सच तो यह है कि मुस्लिम शरणार्थी सिर्फ स्वीडन जैसे शरण देने वाले देश को ही आग में नही झोका है, शरण देने वाली गोरी आबादी को ही नहीं जलाया है, मुस्लिम शरणार्थी सिर्फ अपनी कबिलाई हिंसा से शरण देने वाली गोरी आबादी को ही भयभीत नहीं किया है, उनकी संपत्तियों को ही नही जलाया है बल्कि मुस्लिम शरणार्थी खुद की संभावनाओं को भी जलाया है, भविष्य में शरणार्थियों को मिलने वाली दया और सदभावना पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है। इसका दुष्परिणाम यह होगा कि नार्डिक देशों ही नहीं बल्कि पूरे यूरोप में मुस्लिम देशों की मुस्लिम शरणार्थी आबादी को शरण देने और उन्हें भयमुक्त भविष्य बनाने का वातावरण उपलब्ध कराने के नीति पर फिर से विचार किया जा सकता है। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि मुस्लिम शरणार्थियों को वापस उनके देशों में भेजने की न केवल मांग उठेगी बल्कि कुंछ देश मुस्लिम शरणार्थियों को वापस भेजने की कार्रवाई भी कर सकते हैं। सबसे खतरनाक बात यह है कि नार्डिक देशों ही नर्ही बल्कि पूरे यूरोप के देशों में मुस्लिम शरणार्थियों के खिलाफ प्रतिक्रियागत हिंसा फैलने की आशंका है, दक्षिण पंथी समुदाय का प्रचार-प्रसार भी बढेगा, हाल के दिनों में उदारवादी यूरोपीय समाज में दखिण पंथी गुटों का दबदबा बढा है, उनका विस्तार हुआ है और दक्षिण पथी गुट सत्ता को भी प्रभावित करने की शक्ति हासिल कर चुके हैं, दखिण पंथी गुटो का साफ कहना है कि ये मुस्लिम शरणार्थी सिर्फ और सिर्फ हिंसक, बर्बर और कबिलाई मानसिकता के हैं जिन्हें शांति और सदभाव से कोई लेना-देना नहीं है, इन पर अगर रोक नहीं लगायी गयी तो फिर एक न एक नार्डिक देश और पूरा यूरोप सीरिया, लेबनान और अफगानिस्तान बन जायेगा। नार्डिक एक भगोलिक शब्द है और नार्डिक क्षेत्र के देशों में स्वीडन, नार्वे, फिनलैंड, आइसलैंड, ग्रीनलैंड और डेनमार्क जैसे देश आते हैं। उल्लेखनीय यह है कि नार्डिक क्षेत्र के देशों ने अपनी उदारता और मानवता की कसौटी पर हिंसाग्रस्त मुस्लिम देशों की मुस्लिम शरणार्थियों को खूब शरण दिया है। लाखों मुस्लिम शरणार्थी नार्डिक देशो में बसाये गये हैं। स्वीडन के प्रधानमंत्री स्टेफान लोफवेन की मुस्लिम शरणार्थियों की हिंसा और बर्बरता पर प्रतिक्रिया देखिये। स्वीडन के प्रधानमंत्री स्टेफान लोफवेन ने प्रतिक्रिया दी है कि सांप को जितना भी दूध पिला दो पर वह जहर ही उगलेगा। बहुत सारे लोगों को स्टेफान लोफवेन की यह प्रतिक्रिया अतिरंजित हो सकती है या फिर खारिज करने लायक हो सकती है पर उनकी प्रतिक्रिया मुस्लिम शरणार्थियो की हिंसा, बर्बरता और हिंसा के बल पर इस्लाम के विस्तार की मानसिकता को देखते हुए गलत नहीं हो सकती है। यहां पर यह भी उल्लेखनीय है कि इस हिंसा के पूर्व स्टेफान लोफवेन मुस्लिम शरणार्थियों के हितो के संरक्षक के तौर पर जाने जाते थे, उन्होंने मुस्लिम शरणार्थियों को शरण देने में कोई कोताही नहीं बरती थी बल्कि बढ-चढ शरण देने का काम किया था। शरणार्थी कोई धन या सपंत्ति लेकर आते तो नहीं हैं। मुस्लिम शरणार्थी भी सिर्फ अपने शरीर और बच्चे लेकर शरण लेने के लिए आये थे। स्फेफान लोफवेन ने मुस्लिम शरणार्थियों को न केवल अपने देश में शरण देने का कार्य किया बल्कि उन्हेें राजकोष से जीवन संचालित करने के लिए राशि भी उपलब्ध करायी , उनके लिए आवास की भी व्यवस्था की थी। उनकी मजहबी मानसिकताओं की संतुष्टि के लिए मस्जिदें भी बनवायी। फिर भी मुस्लिम शरणार्थी स्फेफान लोफवेन की आकांक्षाओं पर खरे नहीं उतरे बल्कि मुस्लिम शरणार्थी भस्मासुर बन गये। स्वीडन को ऐसी हिंसा से दो-चार कराये जो स्वीडन के शांति प्रिय नागरिकों ने कभी भी नहीं देखी थी। जनना यह जरूरी है कि नार्डिक क्षेत्र के देश स्वीडन, डेनमार्क, ग्रीनलैंड, फिनलैड, आइसलैंड और नार्वे को अति शांति प्रिय देश के रूप में जाना जाता है, जहां पर हिंसा और अशांति की उम्मीद ही नहीं होती है, सभ्यतागत स्वतंत्रा अनुकरणीय है, सर्वश्रेष्ठ है, मजहब और धर्म के नाम पर कोई भी भेदभाव नहीं है, सदभाव और परस्पर सहयोग की भावना भी सर्वश्रेष्ठ है। ऐसे अनुकरणीय वातावरण में मजहबी हिंसा फैलाना, नफरत फैलाना एक बर्बर मजहबी मानसिकताओं को ही स्थापित करता है। दुनिया में सिर्फ मुस्लिम शरणार्थी ही इस तरह की हिंसक प्रतिक्रियाएं देती है और इस्लामिक राजनीति का प्रत्यारोपित करती है। अन्य शरणार्थी वर्ग दया और उपकार के बदले सहिष्णुता ही प्रदर्शित करते हैं। दक्षिण पंथ आखिर मुस्लिम शरणार्थियों के खिलाफ क्यों खड़ा हुआ? मुस्लिम हिंसा के पक्षधर लोग यह कहकर इनकी करतूतों पर पानी डालते हैं, पर्दा डालते हैं कि दक्षिण पंथ ने मुस्लिम हिंसा फैलाने के लिए उकसाया या फिर दक्षिण पंथ इस्लाम विरोधी है, मुस्लिम विरोधी है और मुस्लिम शरणार्थियों के अधिकारों के प्रति असहिष्णुता रखता है। स्वीडन के दक्षिण पंथ की मांगों और उनकी सक्रियताओं को खारिज नहीं किया जा सकता है। स्वीडन के दक्षिण पंथ की अंाशाकाओं और चिंताओं की जायत वजहें हैं। मुस्लिम शरणार्थी जब कहीं जाते हैं और शरण पाते हैं तो वे अपने साथ शांति और सदभाव लेकर नहीं आते हैं और न ही इनके अंदर अन्य धर्मो और अन्य संस्कृतियों को आत्मसात करने और स्वीकार करने की भावनाएं होती हैं। मुस्लिम शरणार्थी उस बाढ के समान होते है जो अपने साथ कई प्रकार की अन्य सामग्रियां भी लेकर आती हैं, गाद भी लाती है, सांप-विच्छु भी लाती हैं, कूडा-करकट भी लाती है। इसी प्रकार मुस्लिम शरणार्थी अपने साथ इस्लाम की कूरीतियां भी लाते हैं, इस्लाम का जिहाद भी लाते हैं, इस्लाम का लव जिहाद भी लाते हैं, इस्लाम का तलवार के बल यानी हिंसा के बल पर प्रचार-प्रसार करने की मानसिकता भी लाते हैं, अधिक से अधिक बच्चे पैदा करने की मानसिकताएं भी लाते हैं, आबादी आक्रमण से मूल संस्कृतियों और मूल धर्म को नष्ट कर इस्लामिक शासन व्यवस्था कायम करने की राजनीतिक मानसिकताएं भी स्थापित कर देते हैं। इन सभी के वजूद को कायम करने के लिए हिंसा और आतंकवाद का सहचर बन जाते हैं। स्वीडन में ऐसा ही हुआ है। इसके कारण दखिण पंथ का विस्तार हुआ। दक्षिण पंथ एक राजनीतिक शक्ति बन गया। स्टैम कुर्स नामक एक राष्टवादी पार्टी का जन्म हुआ। इसके नेता रैसमस पालुदान ने मुस्लिम शरणार्थियों की हिंसक और बर्बर मानसिकताओं के खिलाफ राजनीतिक आंदोलन छेड़ दिया। मुस्लिम शरणार्थियों की हिंसक मानसिकताओं और इस्लाम के प्रचार-प्रसार के खिलाफ जागरूकता के अभियान को बडा सपोर्ट मिला। तत्काल में नार्डिक देशों के इस्लामीकरण विषय पर एक सेमिनार आयोजित हुआ था उसी सेमिनार में कथित तौर पर कुरान का अपमान हुआ था। क्रिया के विपरीत प्रतिक्रिया होती है। स्वीडन को जलाने वाले मुस्लिम शरणार्थी अपनी बर्बरता का दुष्परिणाम शायद नहीं जानते होगे। हिंसा के प्रति प्रतिहिंसा ज्यादा बर्बर और अमानवीय होती है। जब प्रतिहिंसा होती है तब मुस्लिम आबादी और मुस्लिम देश अपने आप को पीडित घोषित कर देते हैं। हम यहां पर गुजरात और म्यांमार को उदाहरण के तौर पर रखना चाहते हैं। गोधरा कांड को अंजाम देने वाली मुस्लिम आबादी भी गुजरात देंगे के तौर पर प्रतिक्रिया देखी थी, प्रतिक्रिया के तौर पर सामने आये गुजरात दंगा बहुत ही भयानक था। म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों ने बौद्ध आबादी और म्यांमार की संप्रभुत्ता को ही लहूलुहान करने और नष्ट करने की जिहादी मानसिकताएं स्थापित कर ली थी। प्रतिक्रिया में जब म्यांमार की सेना उतरी और बौद्ध आबादी भी वीरता दिखायी तो फिर पांच लाख से अधिक रोंिहंग्याओ को म्यांमर छोडकर भागने के लिए विवश होना पडा। रोहिंग्या मुसलमान आज दूसरे देशो में दर-दर की ठोंकरे खा रहे हैं।

ऐसे ही कारणों से अमेरिका ने कई देशों की मुस्लिम आबादी को अपने यहां आने पर प्रतिबंधित कर चुका है। चीन जैसे कम्युनिस्ट देश अपने यहां एक करोड से अधिक मुसलमानों को यातना घरों में कैद कर इस्लामिक मानसिकताओं का इलाज कर रहा है। अब तो मुस्लिम देश भी मुस्लिम शरणार्थियों को शरण देने के लिए तैयार नहीं होते है।

स्वीडन की मुस्लिम हिंसा नार्डिक देशों ही नहीं बल्कि पूरे यूरोप और अमेरिका के लिए सबक हैं। मुस्लिम शरणार्थी को शरण देने का अर्थ खुद मुस्लिम हिंसा और जिहाद को आमंत्रित करना और अपनी मूल संस्कृति को नष्ट करने जैसा है। भारत को भी सतर्क रहने की जरूरत है। इसलिए कि भारत में भी रोहिंग्या-बांग्लादेशी घुसपैठिये कानून की समस्याएं उत्पन्न कर रहे हैं। नार्डिक देशों और अन्य यूरोपीय देशों को अब अपनी मुस्लिम शरणार्थी नीति बदलनी ही होगी।

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