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खत्म होता कम्युनिज्म, बौखलाते कामरेड

लोकसभा के पिछले दो चुनावों में कांग्रेस के साथ ही कम्युनिस्टों को बड़ा झटका

खत्म होता कम्युनिज्म, बौखलाते कामरेड
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कैलाश विजयवर्गीय

फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या की जांच की मांग करने वाली अभिनेत्री कंगना रनोट को सुरक्षा दिए जाने का तृणमूल कांग्रेस की सासंद महुआ मोइत्रा ने विरोध जताया है। मोइत्रा को यह तो पता होगा ही कि उनकी नेता और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सैंकड़ों हत्याओं के जिम्मेदार माओवादी नेता छत्रधर महतो को पार्टी में सुशोभित कर सुरक्षा प्रदान की है। बारासात के एक दर्जन से ज्यादा गुंडे सरकारी सुरक्षा में लोगों को धमकाते हैं। इसी तरह दार्जिलिंग में कई कुख्यात सुरक्षा के साये में हैं। पश्चिम बंगाल के एक प्रोफेसर को एनआईए की जांच से बचाने के लिए तथाकथित बुद्धिजीवी इक्ट्ठे होकर पत्र लिख रहे हैं। इससे पहले दिल्ली के एक वकील ने सुप्रीम कोर्ट की सजा से बचने के लिए ऐसी ही मुहिम चलवाई थी। पता नहीं कहां से अचानक ऐसे बुद्धिजीवी इक्ट्ठे होकर देश के संविधान, लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को चुनौती देने लगते हैं।

दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में 2014 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार बनने के बाद विरोधी दलों को जोरदार झटका लगा था। लोकसभा चुनाव में किसी दल को 30 वर्ष बाद पूर्ण बहुमत मिला। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 303 सीटें जीती। लोकसभा के पिछले दो चुनावों में कांग्रेस के साथ ही कम्युनिस्टों को बड़ा झटका। कांग्रेस दोनों बार लोकसभा में विपक्ष का नेता बनने लायक सीटें नहीं जीत पाई तो कम्युनिस्ट लोकसभा में गिनती के पांच रह गए। पश्चिम बंगाल में तो 34 साल राज करने वाले कम्युनिस्ट पूरी तरह साफ हो गए। अपने समाप्त होते अस्तित्व के कारण कम्युनिस्ट देश में संविधान, लोकतंत्र, न्यायपालिका और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को खतरा बताने लगे। कम्युनिस्टों के साथ कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल भी उसी तरह का राग अलापने लगे। अपने निहित स्वार्थों के कारण ही ये दल नई शिक्षा नीति का विरोध कर रहे हैं।

1980 के दशक के बाद कमजोर होती गई कांग्रेस के कारण कम्युनिस्टों ने न्यायपालिका, मीडिया, औद्योगिक संस्थानों के श्रम संगठन, तथाकथित मानवाधिकार संगठन और उच्च शिक्षण संस्थानों में अपनी पैठ बढ़ाई थी। खासतौर पर शिक्षण संस्थानों और मीडिया में धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हावी होते गए। मीडिया में तो कम्युनिस्टों का दबदबा पहले से ही था। देश में आपातकाल थोपने वाली कांग्रेस के सहयोगी रहे कम्युनिस्टों की विचारधारा मानने वाले इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास का विकृत रूप स्कूलों और कॉलेजों में पढ़वाया। ज्यादातर विश्वविद्यालयों में उच्च पदों पर वामपंथी शिक्षक तैनात होते रहे। देश की न्यायपालिका में उनकी घुसपैठ बढ़ती रही। इसी कारण न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम प्रणाली के स्थान पर न्यायिक आयोग के गठन का विरोध किया गया। कला-संस्कृति से जुड़ी सरकारी संस्थाओं पर लंबे समय से कम्युनिस्टों का नियंत्रण रहा। विरोधी दलों ने सरकार पर अदालतों के साथ ही चुनाव आयोग, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक और केंद्रीय जांच एजेंसियों के दुरुपयोग के आरोप लगाए। कांग्रेस के भ्रष्टाचार का उजागर करने पर जांच एजेंसियों पर सवाल उठाए गए। ऐसी राजनीतिक साजिशों में कांग्रेस, कम्युनिस्टों और तृणमूल कांग्रेस की भूमिका पर्दाफाश भी हुआ।

मीडिया के जरिये देश में पिछले छह साल के दौरान लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरे का भ्रामक प्रचार किया जा रहा है। मीडिया पर मोदी सरकार के दबाव बताए जा रहे हैं। न्यायपालिका पर दबाव का प्रचार किया जा रहा है। कुछ लोगों को देश में एक तरफ खतरा लग रहा था और दूसरी तरफ ऐसे लोग लगातार जहरीले बयान दे रहे थे। सच तो यही है कि कम्युनिस्टों ने हमेशा अपने विरोधियों को हिंसा के दम पर दबाने की कोशिश की है। पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और केरल कम्युनिस्टों की राजनीतिक हिंसा के सबसे बड़े उदाहरण हैं। कश्मीर में अनुच्छेद 370 की समाप्ति, नागरिकता संशोधन कानून, असम में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर आदि मुद्दों को लेकर भ्रम फैलाया गया। कश्मीर को लेकर तो विरोधी दलों के साथ तथाकथित मानवाधिकार संगठनों ने भारत की छवि को दुनियाभर में बदनाम करने की कोशिश की। मोदी सरकार के कारण ही कश्मीर में अमन-चैन लौट रहा है। सरकार युवाओं को रोजगार दिलाने के पूरे प्रयास कर रही हैं।

हाल ही में संविधान के रक्षक माने जाने वाले स्वामी केशवानंद सरस्वती के निधन पर सम्पूर्ण राष्ट्र ने उन्हें श्रद्धाजंलि अर्पित करते हुए जाना कि किस तरह तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी संविधान को आघात पहुंचाने की कोशिश कर रही थी। 23 मार्च, 1973 को सुप्रीम कोर्ट ने संसद के पास संविधान को पूरी तरह से बदलने की असीमित शक्तियों पर ऐतिहासिक रोक लगाई थी। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एसएम सीकरी और न्यायमूर्ति एचआर खन्ना की अगुआई में 13 सदस्यीय पीठ ने सात-छह से यह फैसला दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संसद के पास संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत संशोधन का अधिकार तो है, लेकिन संविधान की मूल बातों से छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। संविधान के हर हिस्से को बदला जा सकता है, लेकिन उसकी न्यायिक समीक्षा होगी ताकि यह तय हो सके कि संविधान का आधार और ढांचा बरकरार है। कांग्रेस के शासन के तो सांविधानिक संस्थाओं के साथ खिलवाड़ करने के अनेक उदाहरण हैं। इंदिरा गांधी ने सरकार का पक्ष लेने वाले सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को किस तरह मुख्य न्यायाधीश बनवाया और रिटायर होने पर कई लाभ दिए, इसकी भी लंबी सूची है। 22 मई 2004 से 28 मई 2009 तक देश के कानून मंत्री वरिष्ठ कांग्रेसी नेती हंसराज भारद्वाज ने भी खुलासा किया था कि कैसे मनमोहन सिंह सरकार ने अदालतों में हस्तक्षेप किया। कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी के बारे में कहा जाता है कि किस तरह उन्होंने न्यायाधीशों को अपने प्रभाव में लेने की कोशिश की। देश को लंबे समय बाद एक ऐसी सरकार मिली हैं जब सभी स्तंभ स्वतंत्र होकर कार्य कर रहे हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के पहले साल में ही देश को पुरानी समस्याओं से छुटकारा मिला है। कोरोना काल में भी मोदी सरकार ने तमाम समस्याओं के बावजूद देश का नाम दुनियाभर में रोशन किया है। कम्युनिस्टों की मोदी सरकार से एक बड़ी चिढ़ चीन को जोरदार जवाब देने पर भी हो सकती है।

(लेखक भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव हैं और राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा धार्मिक विषयों पर लगातार लिख रहे हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।)

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