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असंगठित श्रमिक एवं आत्मनिर्भर भारत

भारत की आत्मा गांवों में और ग्रामीण के बीच बसती है

असंगठित श्रमिक एवं आत्मनिर्भर भारत
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धर्मदास शुक्ला

भारत प्राचीन काल से ही कृषि प्रधान देश था, जहाँ पर खेती को प्रधानता दी जाती थी । जो कुछ कृषि कार्य नहीं करते थे, वह व्यवसाय एवं व्यापार करते थे कुछ खेतिहर मजदूर के रूप में किसानों के यहां काम करते थे गांव के अंदर सभी को काम मिलता था सभी एक दूसरे के पूरक रहते थे । कोई भी व्यरक्ति बेरोजगार नहीं रहता था । गांवो में पशु पालन, कपड़ा बुनकर व्यवस्था , किसानों के औजारों की व्यवस्था नाई, धोबी, कुम्हार, सुनार, लुहार, मोची, चमड़े का काम करने वाले सभी गांवों में ही रहते थे, और उनकी जरूरत भी गांवों से ही पूरी होती थी । इसी कारण कहते है कि भारत की आत्मा गांवों में और ग्रामीण के बीच बसती है । और भारत समृद्ध था एवं समर्थ एवं आत्मनिर्भर भारत था ।

वैश्विक युद्ध के बाद की स्थिति

जैसा कि हम सभी जानते है कि 28 जुलाई 1914 से 1918 तक जो जर्मनी, हंगरी, और इटली आदि 37 देशों के द्वारा संयुक्त रूप से युद्ध लड़ा गया था। जिसमें काफी जन धन की हानि हुई थी । उस समय उसका प्रभाव स्वरूप प्लेग नामक महामारी ने विश्व के सभी देशों को आगोश में ले लिया था, इसी तरह द्वितीय विश्व युद्ध जो 1939 से 1945 तक मित्र पक्ष एवं अक्ष पक्ष का युद्ध हुआ। उस समय हीरोशिमा नागाशाकी में हुए परमाणु विस्फोट के कारण पूरे विश्व के देशों को बीमारियो एवं आर्थिक मंदी का सामना करना पड़ा । भारत भी इससे अछूता नहीं रहा । भारत में उस समय चार बड़े महानगर थे बंबई, दिल्ली, मद्रास, कलकत्ता । इन शहरों में 1950 से 1960 के बीच में गांव से लोग निकल कर काम धंधे की तलाश में आने लग गये थे । और इसी समय 1950 से 1960 के बीच में कुछ सार्वजनिक प्रतिष्ठान भी खुलने शुरू हुए जैसे बिहार का सिंदरी फर्टिलाइजर उद्योग जो वर्तमान में झारखण्ड में है । जो देश की आजादी के साथ ही भारत का पहला सार्वजनिक प्रतिष्ठान है। जिसका उद्घाटन जनसंघ के तात्कालीन अध्यक्ष एवं नेहरू मंत्रीमण्डल में उद्योग मंत्री रहे डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने उक्त उद्योग की नींव रखी थी जिसके बाद धीरे-धीरे 1949 में बोकारो स्टील प्लांट, भिलाई स्टील प्लांट तथा 1956 में सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग खुलना प्रारम्भम हो गये जिसमें बैंको का राष्ट्रीयकरण एनटीपीसी, एवं कोल का राष्ट्रीयकरण हुआ इस तरह 350 से अधिक सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम खुले जो देश की आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाने तथा जिनका देश के विकास में अहम् रोल था । इसके साथ ही कुछ बड़े औद्योगिक घराने टाटा, बिड़ला, डालमिया, जेके सिंघानिया, मफतलाल ग्रुप आदि जो देश के आर्थिक प्रगति में अपना योगदान दे रहे थे लेकिन यह विडम्बना ही है कि 1990 आते आते देश में यूपीए की सरकार ने विश्व बैंक अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष एवं बहुराष्ट्रीय कंपनियों एवं गलत औद्योगिक नीति के कारण मुनाफे के सार्वजनिक सेक्टर से उद्योगों को जानबूझकर बीमार उद्योग की श्रेणी में ला खड़ा किया । इसी दृष्टि से भारतीय मजदूर संघ ने 2001 से ही असंगठित क्षेत्र में अपने कार्य का विस्तार करना शुरू कर दिया। और वर्ष 2001 से 05 तक आते-आते समस्त असंठित क्षेत्रों में वनवासी कृषि, ईट भ_ो, रेत खदानों स्वसहायता समूह मिड डे मील समस्त स्कीन वर्कर, घरेलू कामगार, सफाई मजदूर , हाथ ठेला, फुटकर विक्रेता दुकानों में काम करने वाले, फेरी लगाने वाले, सभी क्षेत्रों में काम करना शुरू कर दिया । 2008 में भारतीय मजदूर संघ के अखिल भारतीय अधिवेशन जो कटक में आयोजित था । नारा दिया कि असंगठित को संगठित करो एवं 2011 के जनगांव अधिवेशन में चलो गांव की ओर तथा 1914 में जयपुर के राष्ट्रीय अधिवेशन में सबको सामाजिक सुरक्षा का लाभ दिया जाये । ह्यशष्द्बड्डद्य ह्यद्गष्ह्वह्म्द्बह्ल4 द्घशह्म् ड्डद्यद्य तब से निरंतर भारतीय मजदूर संघ द्वारा शोषित, पीडि़त, वंचित जनों के बीच में लगातार काम कर रहा है।

प्रवासी मजदूर

अभी गत एक वर्ष से कोविड 2019 कोरोना महामारी में जहां सारे संगठन सुस्त हो कर बैठ गये थे वहीं भारतीय मजदूर संघ के कार्यकर्ता इस संकट की घड़ी में प्रदेश के विभिन्न भागों से अपने घरों की ओर लौट रहे लाखों प्रवासी मजदूरों को सहारा दिया साथ ही उनके आने-जाने, खाने-पीने की व्यरवस्था की जिम्मेदारी भी संभाली तथा साथ ही सिंगरौली, ताथाखेड़ा, परासिया, खरगौन एवं प्रीथमपुर क्षेत्र आदि में लगभग चार महीने रसोई चलाकर आस-पास के ग्रामीणों को भोजन भी कराया तथा कच्ची भोजन सामग्री आटा, दाल चावल, सब्जी शक्कर आदि की व्यवस्था करायी और लौटे हुये प्रवासी श्रमिकों के लिए सहायता केन्द्र बनाकर उनको मनरेगा एवं संबल योजना के अंतर्गत जोडऩे का प्रयास किया तथा राहत कार्य के माध्याम में लौटे हुये श्रमिकों को उनके ग्रेट के अनुसार अधिकारियों से संपर्क कर जीविकोपार्जन की व्यवस्था हेतु काम दिलाना हेतु हेल्प डेस्क के माध्यम से लगभग 52 जिलों में सेवा कार्य करना ।

भारत सरकार ने 2008 में असंगठित श्रमिकों के लिए एक कल्याण बोर्ड असंगठित कामगार प्रहरी एवं ग्रामीण का गठन किया था जिसके संचालन के लिए केन्द्र सरकार ने भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी श्री अनिल स्वरूप जी को इसकी जिम्मेदारी दिया। जिन्होंने पूरे देश में असंगठित श्रमिकों कि लिए इस कानून का प्रावधान किया। और उसके लिए भारत सरकार ने 1000 करोड़ रुपये बजट का प्रावधान किया लेकिन यह बजट ऊँट के मुंह में जीरा वाली कहावत चरितार्थ हुयी । लेकिन इसी बीच मध्यप्रदेश में भी शिवराज सिंह की सरकार ने शहरी एवं ग्रामीण असंगठित बोर्ड बनाकर संबल योजना के माध्यम से धन उपलब्ध बनाकर इसे प्रभावी बनाया । जिसमें 2018 से 2020 के अंतराल में लगभग 2 करोड़ मजदूरों का पंजीयन किया गया । जिसमें 31991 हितग्राहियों को 349 करोड़ 69 लाख की राशि वितरित की। अभी फिर से प्रदेश सरकार ने 23 सितम्बर 2020 से प्रदेश के 22 जिलों में मृत्यु दुर्घटना में 4 लाख रुपये प्रति व्यक्ति, सामान्य मृत्यु में 2 लाख रुपये तथा सामान्य दुर्घटना अंग भंग पर 50 हजार से लेकर 1 लाख रुपये का सिंगल क्लिक के माध्यम से 3700 प्रकरणों पर 80 करोड़ रुपये मुख्यमंत्री श्री चौहान द्वारा वितरित की जायेगी। जो जनपदों एवं नगर निकायों के अंतर्गत आने वाले संको को प्रदाय की जाएगी । इस तरह मजदूरों के कल्याण के लिए प्रदेश द्वारा किया जाने वाला भुगतान निश्चित रूप से सराहनीय कदम है और इसी तरह प्रदेश के अन्य जिलों को भी जोडऩे की आवश्यकता पर सरकार को ध्यान देना चाहिये । एक ओर विडंबना ही है कि प्रदेश सरकार द्वारा मध्यप्रदेश में शिथिल किये गये श्रम कानूनों के कारण उद्योगपति अपने कारखानों में श्रमिकों को वीआरएस देने लग गये है और कही कहीं 60 से 70 प्रतिशत लोगों को ही काम दे रहे और 30 प्रतिशत लोगों को काम नहीं मिल पा रहा।

आत्मनिर्भर भारत

ग्रामीणों की समस्याओं के संबंध में मुझे लगता है कि अधिक से अधिक गांवों को पानी, बिजली, सड़क, स्वास्थ्य, चिकित्सा, शिक्षा, बेटियों की शिक्षा के माध्यिम से आत्मनिर्भर, स्वालम्बित बनाना। गरीब परिवारों के लिए मकान, शौचालय और घरेलू गैस उपलब्धी कराने आदि से निश्चित रूप से प्रधानमंत्री जी को बड़ा श्रेय जाता है । औद्योगिक और विकास की अवधारणा को ध्यान में रखकर उन्होंने पहले ही उद्योगपतियों को महत्व दिया, 50 वर्षों तक उनका बचपन आखिरकार गरीब बस्तियों गांवों, जंगलों में घूमने में ही बीती है फिर गरीबों की चिंता किसी राजनीतिक दल तथा विचारधारा तक सीमित क्यों रहे आतंक से निपटने के लिए आतंकवादियों के रास्ते को साफ करना तथा चाइना के घुसपैठ आदि को रोकना यह सभी सामाजिक, आर्थिक विकास का ही रास्ता है । कोरोना महामारी में भी जब पूरी दुनिया पस्ता हो रही थी उस समय भी श्री मोदी जी विकास के पथ को अपने आंखों से ओझल नहीं होने दिया । तभी तो मोदी जी के प्रयासों से दुनिया भारत के सामने खड़ी है इसी कारण राजनीतिक विवाद चुनौतियों से डटकर जननेता के रूप में नरेन्द्र मोदी के दृढ़ संकल्पोंत के लिए उन्हेें दुनिया याद कर रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ग्रामों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में हमेशा से प्रयत्नशील रहे है। यह बात भी सच है कि समय, काल, और परिस्थितियों के अनुरूप इन प्रयासों का फलीभूत करने के लिए अलग-अलग योजनाओं को गांव और ग्रामीणों की जरूरत के अनुरूप कार्यान्वित करने के अथक प्रयास किए जाते रहे हैं । ग्रामीण भारत अर्थात् आत्मरनिर्भर भारत का निर्माण और उसे मजबूत करने का प्रयास आरंभ से प्रधानमंत्री द्वारा किया जाता रहा है। उनकी कोशिशों का सुपरिणाम देखने को मिलता कि इसके पहले वैश्विक महामारी कोविड-19 ने पूरी दुनिया के साथ भारत को भी चपेट में ले लिया। इतना ही नहीं भारत के द्वारा 20 लाख करोड़ का पैकेज देना एक राहत भरा कार्य है, जिस समय देश के सामने संकट खड़ा हो उस मुश्किल क्षण उनका आत्मविश्वास पत्थर की तरह चट्टान बनकर अडिग रूप से खड़ा रहा। लेकिन इस बात से भी इंकार करना मुश्किल है कि प्रधानमंत्री के विजन और ठोस योजना से ना केवल मुसीबत से लड़ा जा सकता है । बल्कि उसे पराजित कर नए आत्मनिर्भर भारत का निर्माण भी किया जा सकता है ।

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