Top
undefined

सामयिक सन्दर्भों में गाँधी दर्शन की उपयोगिता

सम्पूर्ण मानवता के लिए गाँधी एक अनुकरणीय व्यक्तित्व है

सामयिक सन्दर्भों में गाँधी दर्शन की उपयोगिता
X

प्रो. श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी

समकालीन विश्व में गाँधी अद्वितीय विचारक, समाज सुधारक, कर्मयोगी एवं विश्व शांति के पुरोधा के रूप में देखे जाते हैं। वह इस युग के अप्रतिम व्यक्तित्व हैं। आज के भारतीय समाज की कोई भी अग्रगामी दिशा गाँधी से कटकर नहीं निकल सकती। गाँधी का स्वयं का जीवन चाहे जितने तीखे अंतर्विरोध से उद्वेलित दिखता हो लेकिन इन अंतर्विरोधों से छनकर आती गाँधी की दृष्टि मानवीय और मूलत: भारतीय प्रसंगों में आदर्शोन्मुखी यथार्थ के बहुत निकट दिखायी देती है। इस दृष्टि के निर्माण में सांस्कारिक जड़ताओं से मुक्ति की चेष्टा प्रखरतम है। एक कुशल राजनीतिज्ञ की प्रगतिकामी चेष्टा केवल राजनीतिक मान्यताओं और व्यवस्थाओं तक सीमित रहती है। गांधी की दृष्टि आगे बढ़कर स्त्री-पुरुष सम्बन्धों से लेकर रोजमर्रा के दैनिक आचार-व्यवहार को जांचने परखने तक पहुँचती है। बेहतर मानव जीवन के निर्माण की गाँधी की चेष्टा जीवन को समग्रता में देखने से जुड़ी थी। इसीलिए गाँधी अपने समय के बड़े से बड़े राजनीतिज्ञ से बड़े राजनीतिज्ञ और बड़े से बड़े संत से बड़े संत और बड़े से बड़े समाज सुधारक से बड़े समाज सुधारक के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त कर लेते हैं। विचार और अभिव्यक्ति की दूरी गाँधी में किसी भी अन्य मनुष्य की तुलना में बहुत कम है। राजनेताओं और धर्माचार्यों में सत्य के नाम पर ही मूल सत्य को कभी-कभी छिपा जाने का जो यत्न दिखायी देता है वह गाँधी में नहीं है और है तो बहुत कम है। अत: गाँधी की विश्वसनीयता और लोकप्रियता अपेक्षाकृत बहुत अधिक और अपरिमित है। सन् 1926 में महात्मा गाँधी से मिलकर उनसे अत्यधिक प्रभावित होने वाले डॉ. रूफस जोन्स ने संत फ्रांसिस से उनकी तुलना की थी।

सम्पूर्ण मानवता के लिए गाँधी एक अनुकरणीय व्यक्तित्व हैं। भारत में शायद ही कोई अन्य विचारक पैदा हुआ हो, जिसने गाँधी की तरह भारत के यथार्थ को आत्मसात करके अपने दर्शन की सृष्टि की हो। गाँधी के व्यक्तित्व में सम्पूर्णता थी, वह मानव मुक्ति के लिए संकल्पित थे और शांति के परिवेश में स्वतंत्रतापूर्वक सर्वांगीण विकास के पक्षधर थे। फलत: उनकी जीवन यात्रा 'मनुष्य से महात्मा तक के पड़ाव पर पहुँच सकी।

गाँधी का मूल्य-दर्शन जीवन की अनुभूति पर आधारित है। गाँधी ने अध्यात्म तथा अनुभूति में और सत्य तथा जीवन में समन्वय करने का प्रयास किया है। गाँधी स्वयं गतिशील व्यक्ति थे। नई अनुभूतियों के आलोक में अपनी मान्यताओं को सुधारते एवं संवारते रहे हैं। उनके विचारों की विशेषता यह रही है कि उन्होंने चिंतन और कर्म में अद्भुत समन्वय स्थापित किया है। गाँधी ने धार्मिक अवधारणाओं को नैतिक कर्म में परिवर्तित कर आज के औद्योगिक समाज में अनोखा काम किया है। सामयिक विश्व कोगाँधी के दर्शन एवं प्रतिमान की अत्यन्त आवश्यकता है। गरीबी, निरक्षरता, शोषण, अंधविश्वास, धार्मिक और जातिगत युद्ध, अमानवीय व्यवहार और हिंसक टकराव आदि सबका उत्तर गाँधी जीवन-दर्शन में मिलता है।

गाँधी जी एक ऐसे भारत की संकल्पना के लिए प्रतिबद्ध थे, जो स्वावलम्बी हो, जिमसें समरसता हो। इस हेतु गाँधी जी 'स्वदेशी पर जोर देते हैं। यद्यपि भारत में 1906 में 'बंगाल विभाजन के बाद स्वदेशी आन्दोलन की शुरूआत हो चुकी थी किन्तु इसे व्यावहारिक स्वरूप गाँधी जी के प्रयत्नों से ही मिल सका। वस्तुत: गाँधी जी के राष्ट्रवाद की अवधारणा का आधार 'स्वदेशी हीं है।

स्वदेशी का अर्थ है - अपने देश का उत्पाद, अपने देश की उपज, अपने देश का परिधान एवं अपनी विचारधारा एवं पहचान की स्वीकृति। राजनीतिक क्षेत्र में गाँधी जी के राष्ट्रवाद का आधार इसी से बना है। गाँधी जी ने स्वदेश की अवधारणा को अति व्यापक अर्थ प्रदान किया है। 'स्वदेशी वह भावना है जो हमें देश के प्रति अनुरक्ति के साथ-साथ अपने आस-पास के परिवेश के ही उपयोग और सेवा तक सीमित रखती है। वह केवल आर्थिक क्षेत्र में स्वदेश निर्मित वस्तुओं के प्रयोग मात्र तक सीमित नहीं है। गाँधी जी ने 'स्वदेशी को स्वराज की पूर्व अवधारणा बताया है और इसे उन्होंने स्वशासन एवं आत्मनिर्भरता, राष्ट्रीय सरकार तथा राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता को परस्पर जोडऩे वाली कड़ी की संज्ञा दी है। उनके अनुसार 'स्वदेशी हमारे अन्दर निहित वह भावना है जो हमें अधिक दूरस्थ से हटाकर अपने निकट के वातावरण से लाभ एवं उपयोग उठाने तक सीमित रखती है। गाँधी जी का कथन है कि ''मैं स्वदेशी को सभी के द्वारा पालन किये जाने वाला धार्मिक सिद्धान्त मानता हूँ।

इस तरह से स्वदेशी एक उच्चस्थ आध्यात्मिक प्रकार की सर्वतोमुखी देशभक्ति है। स्वदेशी की मांग है कि हम अपने देश के आदर्शों एवं संस्थाओं से दृढ़तापूर्वक जुड़े रहें। विशुद्ध सेवा भावना 'स्वदेशी का सार है। स्वदेशी की वृत्ति कभी भी समूहों की अनैतिकता, संकीर्णता एवं निहित स्वार्थ की वृद्धि में विश्वास नहीं करती। भारत के संदर्भ में गाँधी जी कहा करते थे कि -''एक सच्चा स्वतंत्र भारत अपने संकट ग्रस्त पड़ोसियों की सहायता के लिए दौड़ कर पहुँचने के लिए बाध्य है। स्वदेशी का सिद्धान्त सेवा हेतु मानवीय क्षमता की वैज्ञानिक सीमाओं को स्वीकार करता है। वस्तुत: गाँधी जी इसे गीता की शिक्षाओं पर अवलम्बित मानते हुए बताते हैं कि अपने कर्तव्यों के (स्वधर्म) का पालन करते हुए मर जाना श्रेष्ठ है तथा तथा दूसरों के कर्तव्यों (परधर्म) को करना विपदापूर्ण है। स्वदेशी अर्थात् देशज, समीपस्थ एवं परिवेश जनित उत्पाद का उपयोग तथा सेवा के सिद्धान्त पर आधारित सामाजिक व्यवस्था, स्वदेशी मूलभूत रूप से अहिंसक व्यवस्था है जो सृष्टि के सनातन नियमों का उल्लंघन नहीं होने देती। गाँधी जी ने स्पष्ट कहा था कि स्वदेशी के बिना हिन्दू धर्म मृत शरीर के बराबर है। स्वदेशी सिद्धान्त वस्तुत: घरेलू उद्योगों के इस रूप में संरक्षण पर बल देता है कि उनमें विकास करने की निश्चित शक्ति विद्यमान रहे। स्वदेशी का अर्थ किसी दूसरे देश के प्रति दुर्भाव कदापि नहीं है। गाँधी के शब्दों में, ''यह किसी भी दृष्टि से संकीर्ण नहीं है क्योंकि जो कुछ भी मेरे विकास के लिए आवश्यक है, वह मैं संसार के किसी भी भाग से ले लूँगा। मैं संसार के किसी भाग से ऐसी कोई वस्तु लेने को तैयार नहीं चाहे वह कितनी ही सुन्दर हो जो मेरे विकास में बाधक हो और उन लोगों को हानि पहुँचाये जिनकी भलाई मेरी प्रकृति में पहली चिंता का विषय है।

स्वदेशी की इस व्यापक धारणा को स्वयं गाँधी जी ने प्रतीकात्मक रूप से आम जनता को समझाने के लिए 'खादी का रूप दिया। खादी का संदेश वे स्वयं नियमित रूप से चरखा चलाकर देते थे तथा सभी आश्रमवासियों एवं अनुयायियों को नियमित रूप से चरखा चलाने के लिए कहते थे। गाँधी जी के लिए चरखे का संगीत 'आत्मा की आवाज था। उन्होंने खादी को भारतीय एकता का प्रतीक बना दिया और उसे खद्दर के रूप में पहनाकर सबको राष्ट्रीय वेशभूषा से सुसज्जित कर दिया। गाँधी जी के अनुसार खादी भी स्वदेशी की प्रतीक थी। गाँधी जी का खादी के बारे में कहना था कि स्वदेशी तो शाश्वत धर्म है। उसका व्यवहार हर युग में बदलता ही रहेगा और बदलना भी चाहिए। स्वदेशी आत्मा है और भारत में इस युग के लिए खादी उसका शरीर है। स्वदेशी एक सेवा धर्म है। इस सेवा धर्म को यदि हम पूरी तरह समझ लें, तो हमारा हमारे परिवार का, देश का और सारे संसार का कल्याण होगा। स्वदेशी में स्वार्थ नहीं, शुद्ध परमार्थ है, इसलिए मैं उसे यज्ञ मानता हूँ।

गाँधी जी की स्वदेशी की अवधारणा का प्रमुख अंग स्वभाषा भी रही है। वस्तुत: वह शिक्षा के क्षेत्र में मैकाले की व्यवस्था के उपरांत हो रहे निरन्तर शैक्षिक परिवर्तनों से चिन्तित थे। वह यह जानते थे कि इस शिक्षा के माध्यम से देश मानसिक रूप से गुलाम हो जाएगा। अत: वह भाषा के स्तर पर अंग्रेजी के साथ ही साथ अपनी मातृभाषा पर विशेष जोर देते हैं। वह अंग्रेजी को अन्तर्राष्ट्रीय भाषा मानते थे किन्तु यह भोग-विलासिता की भाषा है, ऐसा उनका कथन है। उन्होंने लिखा है कि स्वभाषा के माध्यम से ही नैतिकता का विकास होता है, क्योंकि वास्तविक ज्ञानार्जन मातृभाषा से ही सम्भव है। वस्तुत: गाँधी जी की स्वराज की अवधारणा 'स्वदेशी, 'स्वावलम्बन और स्वभाषा पर अवलम्बित थी। नई शिक्षा नीति में मातृभाषा, संस्कृत और अन्य सभी भारतीय भाषाओं के प्रति विशेष आग्रह है और शिक्षा के माध्यम से आत्मनिर्भरता के लक्ष्य की प्राप्ति का विधान है। कौशल विकास और नवाचार पर विशेष बल है। आत्मनिर्भर भारत का आशय है-आय, आजीविका के पर्याप्त अवसर, उत्पादन का वितरण के साथ संतुलन और उचित नियमन, मांग और पूर्ति में संतुलन, सतत् और समावेशी विकास, प्रणाली में विश्वास, कुटीर उद्योग से लेकर लघु, सूक्ष्म, मध्यम और आवश्यकतानुसार भारी उद्योगों का संजाल अर्थात् सभी दृष्टियों से समर्थ भारत। आत्मनिर्भर एवं गौरवपूर्ण भारत की रचना में महात्मा गांधी के स्वदेशी, स्वभाषा और स्वावलंबन संबंधी विचार सतत् सामयिक और उपादेय हैं।

(लेखक : कुलपति, इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय जनजातीय

विश्वविद्यालय अमरकंटक, मध्य-प्रदेश)

Next Story
Share it
Top