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'अटल टनल' बनेगी लेह-लद्दाख की जीवनरेखा

उत्कृष्ट इंजीनियरिंग का बेजोड़ नमूना है अटल टनल

अटल टनल बनेगी लेह-लद्दाख की जीवनरेखा
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योगेश कुमार गोयल

रोहतांग में समुद्र तल से करीब 10 हजार फीट की ऊंचाई पर बनाई गई 'अटल टनलÓ आखिरकार 10 वर्षों के भीतर बनकर तैयार हो गई है। गत वर्ष पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के निधन के पश्चात् उनके सम्मान में केन्द्र सरकार द्वारा दिसम्बर 2019 में सुरंग का नाम 'अटल सुरंगÓ रखे जाने का निर्णय लिया गया था। उत्कृष्ट इंजीनियरिंग का बेजोड़ नमूना मानी जा रही इस सुरंग को 3 अक्तूबर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा देश को समर्पित कर दिया गया है। करीब छह महीने तक भारी हिमपात के कारण बंद रहने वाले रोहतांग दर्रे के नीचे इतनी विशाल सुरंग का निर्माण करना कभी एक सपने जैसा ही लगता है, जो इंजीनियरों के जज्बे ने पूरा कर दिखाया है। सुरंग के अंदर कटिंग एज टैक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गया है। हालांकि शुरूआत में अटल टनल के निर्माण पर करीब 1500 करोड़ रुपये खर्च आने का अनुमान था किन्तु विकट भौगोलिक परिस्थितियों के कारण इसकी लागत बढ़कर 3500 करोड़ रुपये आई है। यह दुनिया की सबसे लंबी राजमार्ग सुरंग है, जो हिमालय की दुर्गम वादियों में पहाड़ों को काटकर बनाई गई है। इस सुरंग की ऐतिहासिक घोषणा 3 जून 2000 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा की गई थी। अटल सरकार द्वारा रोहतांग दर्रे के नीचे सामरिक रूप से महत्वपूर्ण इस सुरंग का निर्माण कराने का निर्णय लिया गया था और सुरंग के दक्षिणी पोर्टल पर सम्पर्क मार्ग की आधारशिला 26 मई 2002 को रखी गई थी। उसके बाद 28 जून 2010 को यूपीए अध्यक्षा सोनिया गांधी द्वारा विधिवत रूप से सुरंग की ड्रिलिंग का शिलान्यास किया गया था।

मनाली को लाहौल स्पीति और लेह-लद्दाख से जोडऩे वाली कुल 9.02 किलोमीटर लंबी इस सुरंग के खुल जाने के बाद अब न केवल मनाली-लेह के बीच की दूरी 46 किलोमीटर तक घट जाएगी और दोनों शहरों के बीच लगने वाला समय 4-5 घंटे कम हो जाएगा बल्कि सर्दियों में बर्फबारी के कारण देश से कट जाने वाले हिमाचल प्रदेश के कई इलाके अब सालभर सम्पर्क में रहेंगे। अटल टनल का साउथ पोर्टल मनाली से 25 किलोमीटर की दूरी पर करीब 3060 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है जबकि इसका उत्तरी छोर लाहौल स्पीति के सीसू के तेलिंग गांव में 3071 मीटर की उंचाई पर स्थित है। रोहतांग पास के रास्ते मनाली से लेह जाने में अभी तक 474 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता था लेकिन इस सुरंग के जरिये अब यह दूरी घटकर 428 किलोमीटर रह गई है और करीब छह महीने तक बर्फ की चपेट में रहने वाले लाहुल स्पीति के लोगों की राह भी अब रोहतांग दर्रा नहीं रोक सकेगा। दरअसल पहले घाटी करीब छह महीने तक भारी बर्फबारी के कारण देश के बाकी हिस्सों से कटी रहती थी। टनल को ऐसी अत्याधुनिक तकनीकों से तैयार किया गया है कि इस पर बर्फ और हिमस्खलन का कोई असर नहीं होगा।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर बनाई गई 'अटल टनलÓ घोड़े की नाल जैसे आकार वाली सिंगल ट्यूब डबल लेन वाली सुरंग है, जो 10.5 मीटर चौड़ी है और मुख्य टनल के भीतर 3.6 गुना 2.25 मीटर की फायरप्रूफ इमरजेंसी एग्जिट टनल बनाई गई है। यह देश की पहली ऐसी सुरंग है, जिसमें आपात स्थिति में एग्जिट टनल साथ में न होकर मुख्य सुरंग के नीचे बनाई गई है ताकि आपातकालीन परिस्थितियों में लोगों को आसानी से इससे बाहर निकाला जा सके। हर 25 मीटर पर एग्जिट तथा इवैकुएशन के साइन हैं और प्रत्येक 500 मीटर पर आपातकालीन निकास की सुविधा है। सुरंग के दोनों तरफ आकर्षक प्रवेश द्वार बनाए गए हैं। मनाली की ओर कुल्लवी शैली में जबकि लाहुल की ओर बौद्ध शैली में आकर्षक द्वार हैं। सुरंग के दोनों ओर बनाए गए ये प्रवेश द्वार सैलानियों के आकर्षण का केन्द्र भी बनेंगे। अटल टनल में दोनों ओर 1-1 मीटर के फुटपाथ हैं और आधा-आधा किलोमीटर की दूरी पर इमरजेंसी एग्जिट भी बनाए गए हैं। सुरंग में आठ किलोमीटर चौड़ी सड़क है और इसकी ऊंचाई 5.525 मीटर है। इसमें वापस मुडऩे के लिए प्रत्येक 2.2 किलोमीटर की दूरी पर मोड़ (टर्निंग प्वाइंट) हैं। हर 150 मीटर पर इमरजेंसी कम्युनिकेशन के लिए टेलीफोन कनेक्शन की सुविधा उपलब्ध कराई गई है। इस सुरंग को अधिकतम 80 किलोमीटर प्रति घंटे की गति के साथ प्रतिदिन 3000 कारों और 1500 ट्रकों के यातायात घनत्व के लिए डिजाइन किया गया है। सुरंग के दोनों सिरों पर एंट्री बैरियर्स लगाए गए हैं और सुरंग में शुरूआत और आखिरी के 400 मीटर के लिए गति सीमा 40 किलोमीटर प्रतिघंटा तय की गई है जबकि बीच के रास्ते में गाड़ी 80 किलोमीटर प्रतिघंटा की गति से चलाई जा सकती है।

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