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नागोर्नो-करबख संघर्ष और भारत

आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच युद्ध को और खतरनाक बना रहा है

नागोर्नो-करबख संघर्ष और भारत
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कुलिन्दर सिंह यादव

वर्तमान समय में दो पूर्व सोवियत देशों आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच वर्षों से विवादित रहे नागोर्नो-करबख क्षेत्र में संघर्ष चल रहा है। हालांकि इसकी पृष्ठभूमि पिछले तीन दशकों में बन चुकी थी । पूर्व के वर्षों में भी क्षेत्रीय और जातीय विवाद कई बार हिंसक हो चुका था परंतु वर्तमान परिदृश्य में इस संघर्ष में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कई अन्य क्षेत्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय शक्तियों के शामिल होने की आशंका के कारण इसे क्षेत्र की राजनीतिक एवं आर्थिक स्थिरता के लिए एक बड़े खतरे के रूप में देखा जा रहा है । नागोर्नो-करबख क्षेत्र एक समय में आर्मीनियाई साम्राज्य का एक हिस्सा था वर्तमान में यह क्षेत्र अजरबैजान की सीमा के अंतर्गत आता है। परंतु इसकी अधिकांश आबादी आर्मीनियाई मूल के लोगों की है जो इस क्षेत्र में वर्षों से चले आ रहे संघर्ष का सबसे बड़ा कारण माना जाता रहा है। इस युद्ध में सम्मिलित होने के लिए पिछले एक सप्ताह से लगातार सीरिया से आतंकी अजरबैजान के समर्थन में अजरबैजान पहुंच रहे हैं। जिससे आर्मेनिया की चिंताएं बढ़ गई हैं इन आतंकियों को रोकने के लिए हाल ही में रूस ने सीरिया के कई हिस्सों पर भीषण बमबारी भी किया था । लेकिन फिर भी हजारों की संख्या में आतंकी अजरबैजान के समर्थन में युद्ध क्षेत्र में संघर्षरत हैं।

इस संघर्ष की पृष्ठभूमि की बात करें तो इसका जुड़ाव 19वीं सदी की शुरुआत से है । जब रूस ने फारसी साम्राज्य से इस हिस्से को अपने कब्जे में ले लिया था। हालिया घटनाक्रम की बात करें तो 27 सितंबर को आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच पुन: संघर्ष शुरू हुआ था इस दौरान तुर्की के समर्थन से अजरबैजान ने आर्मीनिया पर हमला किया। जिसके कारण दोनों देशों के सैकड़ों लोगों की मृत्यु हो गई थी। 10 अक्टूबर को रूस की मध्यस्थता के बाद दोनों देशों के बीच एक बार पुन: युद्ध विराम की घोषणा की गई। लेकिन यह युद्ध विराम सिर्फ कुछ घंटों तक ही रहा। विशेषज्ञों के अनुसार इस युद्ध विराम के ज्यादा समय तक बने ना रहने का कारण तुर्की है। अजरबैजान एक ऊर्जा संपन्न देश है जिसके कारण पूरे काकेशस क्षेत्र में तुर्की से लेकर यूरोप तक गैस और तेल पाइप लाइनों की स्थापना अजरबैजान द्वारा की गई है। इनमें से कुछ पाइप लाइनें ऐसी हैं जो संघर्ष क्षेत्र के बहुत ही नजदीक से गुजरती हैं। दोनों देशों के बीच युद्ध की स्थिति में इन पाइप लाइनों को लक्षित किया जा सकता है। जिससे एक बड़ी दुर्घटना के साथ क्षेत्र में होने वाली ऊर्जा आपूर्ति पर भी प्रभाव पड़ सकता है। मौजूदा समय में बाहरी हस्तक्षेप का डर आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच युद्ध को और खतरनाक बना रहा है। तुर्की और अजरबैजान में जातीय व भाषाई समानता देखने को मिलती है। इसके अतिरिक्त अजरबैजान प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की का सहयोगी रहा है ऐसे में तुर्की का अजरबैजान का पक्ष लेना लाजमी है। अजरबैजान और तुर्की की मित्रता का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि वर्ष 1991 में जब अजरबैजान एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में उभरा तो सर्वप्रथम मान्यता देने वाला देश तुर्की ही था। वर्तमान समय में तुर्की ऑटोमन साम्राज्य के पूर्ववर्ती हिस्सों और मुस्लिम देशों के बीच अपनी राजनैतिक पकड़ का विस्तार करने का प्रयास कर रहा है । ऐसे में अजरबैजान आर्मीनिया विवाद तुर्की को एक प्लेटफार्म उपलब्ध कराता है। दूसरी तरफ रूस सीरिया विवाद के बाद से ही तुर्की से खफा है। इसके अतिरिक्त काकेशस और मध्य एशिया का क्षेत्र उसके लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। जिसके कारण वर्तमान संघर्ष में रूस अपनी भूमिका को लेकर चुनौतीपूर्ण स्थिति में है। आर्मेनिया और अजरबैजान दोनों के साथ रूस के अच्छे संबंध हैं तथा दोनों देशों को हथियारों की आपूर्ति भी रूस ही करता आया है। हालांकि अजरबैजान की अपेक्षा आर्मेनिया रूस पर ज्यादा निर्भर है। आर्मेनिया के साथ रूस के सैन्य संबंध भी हैं इसके अतिरिक्त आर्मेनिया रूस के नेतृत्व वाले सामूहिक सुरक्षा संधि संगठन का सदस्य भी है। जिसके कारण संघर्ष बढऩे की स्थिति में आर्मेनिया सामूहिक सुरक्षा संधि संगठन के नियमों के अंतर्गत रूस से सहायता की मांग कर सकता है। यदि ऐसा हुआ तो निश्चित तौर पर विश्वयुद्ध जैसी परिस्थितियां जन्म ले लेंगी क्योंकि जहां आर्मेनिया रूस के नेतृत्व वाले संगठन का सदस्य है वहीं दूसरी तरफ अजरबैजान का मित्र तुर्की नाटो का सदस्य है। ऐसे में यह स्थिति अत्यंत जटिल हो सकती है। तुर्की और रूस के अतिरिक्त अमेरिका, यूरोप और ईरान भी इस क्षेत्र में अपने सामरिक सुरक्षा और आर्थिक हितों की रक्षा में लगे हुए हैं। यूरोप की ऊर्जा सुरक्षा के लिए इस क्षेत्र की स्थिरता बहुत ही महत्वपूर्ण है । यूरोप और अमेरिका के साथ विश्व के अधिकांश देशों ने इस संघर्ष को समाप्त करने और क्षेत्र में शांति तथा स्थिरता के प्रयासों को बढ़ावा देने पर जोर दिया है। मौजूदा संघर्ष भारत के लिए भी समस्याएं बढ़ाता है क्योंकि जहां एक तरफ भारत अजरबैजान में ओएनजीसी और गेल के माध्यम से लगातार निवेश कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ आर्मीनिया लगातार कश्मीर के मुद्दे पर खुलकर भारत का समर्थन करता रहा है। ऐसे में किसी एक का समर्थन करना भारत के लिए संभव नहीं होगा। भारत लगातार राजनयिकों वार्ताओं के माध्यम से इस संघर्ष के शांतिपूर्ण समाधान की मांग कर रहा है। मौजूदा कोविड-19 महामारी के बीच इस क्षेत्र की अस्थिरता एक बड़ी मानवीय त्रासदी का कारण बन सकती है। ऐसे में विश्व के जिम्मेदार देशों को आगे आकर इस विवाद के शांतिपूर्ण समाधान के लिए कार्य करना चाहिए।

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