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'वोकल डायरिया' से ग्रस्त होता चुनाव प्रचार

कहां गये राजनैतिक शुचिता के वो प्रतिमान

वोकल डायरिया से ग्रस्त होता चुनाव प्रचार
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जयराम शुक्ल

इन दिनों नवदुर्गा पर्व चल रहा है। घर-घर के वातावरण में मातृशक्ति की पूजा आराधना का भक्ति भाव व्यापा है। वहीं अपने मध्यप्रदेश में 28 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव है और बिहार में आम चुनाव। नेताओं की जुबानी चपरबाजी में बिहार का कोई शानी नहीं था..लेकिन अब मध्यप्रदेश उसकी बराबरी या यों कहें एक कदम आगे चल रहा है। मातृशक्ति के पर्व पर कहीं उसे आयटम कहा जा रहा है तो कहीं टंच माल। एक प्रत्याशी तो रखैल तक उतर आया। कोई किसी की वंशावली निकालकर उसे जयचंद का वंशज बता रहा है तो कोई अपने प्रतिद्वंद्वी के चरित्र में गद्दारी के डीएनए ढूंढ रहा है।

ऐसे दुराआचरण वाले साधारण कार्यकर्ता नहीं है। इनमें से कोई मुख्यमंत्री रहा है तो कोई मुख्यमंत्री का ख्वाब पालने वाला। कोई कैबिनेट का सदस्य मंत्री है तो किसी के पास संगठन की बागडोर। कमर के नीचे प्रहार पर प्रहार हो रहे है..और जब कोई इसकी कैफियत पूछता है तो जवाब में मसखरी निकलकर सामने आती है। हम लोग बचपन से एक शब्द सुनते आ रहे हैं..असंसदीय..। गाली-गुफ्तार और अपमानजनक बातों को असंसदीय कहा जाता है। असंसदीय इसलिए कि स्पीकर जिन्हें अमर्यादित व समाजहित के विरुद्ध मानता है तो उन शब्दों को सदन की कार्रवाई से विलोपित कर देता है..संबंधित प्रतिनिधि को कड़ी चेतावनी देते फटकार लगाते हुए। लेकिन इस चुनावी दौर में असंसदीय शब्द सबसे ज्यादा उन्हीं के श्रीमुख से झड़ रहे हैं जो संसद व विधानसभा सभा के सदस्य हैं या रहे हैं। ऐसे लोगों से सम्यक आचरण की अपेक्षा की जाती है क्योंकि ये सब लोकतंत्र के शुभंकर हैं..लाखों लाख लोग अपने वोटों से इन्हें चुनते हैं। यह खाए-पिए-अघाए लोगों की भाषा है इस पर न किसी का अंकुश और लोकलाज, लोकमर्यादा की बात ही भूल जाइए..। परसाई जी ऐसे लोगों को 'वोकल डायरिया' का मरीज कहा करते थे। समय के साथ यह संक्रमण और बड़ा है। आगे कहाँ तक पहुँचेगा कहा नहीं जा सकता। कोरोना की वैक्सीन संभव है कल तैय्यार हो जाए पर 'वोकल डायरिया' का रोग एड्स की भाँति लाइलाज है। आखिर यह भी तो शाब्दिक व्यभिचार से पनपता है। सो हम यह मानकर चलते हैं निकट भविष्य में राजनीति की जो चुनावी भाषा व भंगिमाएं होंगी वह फूहड़ नीली फिल्मों और दादा कोड़के की द्विअर्थी कामेडी को भी मात देंगी..।

हम अपने विंध्य की कुछेक घटनाओं की चर्चा करेंगे जो आज के इस दौर में सुनने में निहायत अविश्वसनीय लगेंगी। आप अपने इलाके में भी ऐसी कई घटनाओं का स्मरण कर सकते हैं..या पुरानी पीड़ी के लोगों से पूछ सकते हैं। ये बात तब की है जब विपक्ष दुश्मन नहीं प्रतिस्पर्धी हुआ करता था। राजमणि पटेल जी राज्यसभा के माननीय सदस्य हैं। उन्हें बहुत कम उमर में चुनाव लडऩे व जीतने का सुअवसर मिला..। यह किस्सा 1972 के विधानसभा चुनाव का है। कांग्रेस पार्टी ने पटेल जी को रीवा जिले के सिरमौर से टिकट दी समाजवादी दिग्गज यमुना प्रसाद शास्त्री के मुकाबले। छात्रजीवन में राजमणि जी शास्त्री जी के ही शिष्य थे। जब उन्हें टिकट मिली तो सबसे पहले शास्त्री जी को ही इसकी सूचना दी कि अब आपसे ही चुनाव लडऩा पड़ेगा। शास्त्री जी ने राजमणि को चुनाव लडऩे का हौसला दिया।

यह किस्सा राजमणि जी ने मुझे खुद सुनाते हुए बताया कि वे किस तरह अपनी चुनावी सभाओं में शास्त्री जी की विद्वता व महानता का बखान करते थे। और यह भी कहने से परहेज नहीं करते थे कि वे शास्त्री जी के ही शिष्य हैं और उन्हीं की अनुमति से यह चुनाव लड़ रहे हैं। चुनाव परिणाम आया..युवा राजमणि पटेल ने शास्त्रीजी को सिरमौर विधानसभा क्षेत्र से अच्छे-खासे मतों से पराजित कर दिया। चुनावी राजनीति में इससे सर्वोच्च आदर्श और क्या हो सकता है कि प्रतिद्वंद्वी प्रत्याशी एक दूसरे को अपने संसाधनों से मदद करें..। यह किस्सा भी विंध्यक्षेत्र की मनगवां सीट का है जहाँ से श्रीनिवास तिवारी चुनाव लड़ते थे। श्री तिवारी बाद में एक धाकड़ व विद्वान स्पीकर के रूप में देश में विख्यात हुए। यह किस्सा एक बार उनके इंटरव्यू की शक्ल में अखबार में छापा था। सन् 52 के पहले आम चुनाव में 25वर्षीय युवा तिवारी जी सोशलिस्ट पार्टी से कांग्रेस के दिग्गज यादवेंद्र सिंह के खिलाफ उतरे। सिंह साहब बघेलखण्ड कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष और नामी वकील थे। उन्हें भैय्या साहब कहकर सभी सम्मान देते। तिवारी जी ने बताया कि यह मुकाबला चीटी और हाथी जैसे था। मेरे पास मँगनी की सायकिल भैय्या साहब मोटरवाले..। चुनाव में भी यही विषमता रही। एक दिन चुनाव प्रचार करते यादवेन्द्र सिंह से मुलाकात हो गई। उन्होंने पूछा कि इस सायकिल के मत्थे कैसे प्रचार करोगे..? मेरे साथ मोटर में चला करो पहले मैं बोल लूँगा फिर उसी मंच माइक से तुम भाषण दे लेना। यह चुनाव कुछ इसी तर्ज पर लड़ा गया। कांग्रेस के दिग्गज यादवेंद्र सिंह तिवारी जी से चुनाव हार गए। सत्ताधारी दल पर तीखे प्रहार करने वाले डा. राममनोहर लोहिया के राजनीतिक समरसता की मिसाल कायम करने के अनगिनत किस्से हैं। ऐसे ही किस्से देश के कोने-कोने से सुनने को मिल सकते हैं। ये सच्चे किस्से राजनीतिक शुचिता के प्रतिमान हैं..। हमने चुनावी लोकतंत्र की यात्रा किस तरह पवित्र उद्गम से शुरू की थी..तिहत्तर वर्ष बीतने को हैं आज हम नदी को छोड़कर किस तरह गटर में गिरे पड़े हमारे जनप्रतिनिधियों के चुनावी आचरण से यह साबित होता है। और यह भी स्थापित होता है कि राजनीति किस तरह समय के साथ 'लोकतांत्रिक व्यभिचार' में परिवर्तित हो चुकी है..।

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