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खाद्य प्रसंस्करण उद्योग की दृष्टि के माध्यम से कृषि क्षेत्र की पुनर्कल्पना

राष्ट्रीय और ग्रामीण स्तर पर भारत की कृषि व्यवसाय प्रणालियों में सही तालमेल बैठाना होगा

खाद्य प्रसंस्करण उद्योग की दृष्टि के माध्यम से कृषि क्षेत्र की पुनर्कल्पना
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संजना काद्यान

कोविड-19 महामारी ने खाद्य सुरक्षा और खाद्य अधिशेष प्रबंधन की वर्तमान नीति के महत्व पर बल दिया है। इसके लिए, हाल के वर्षों में कृषि क्षेत्र की नीति में बदलाव आया है और यह निर्वाह से विपणन की ओर स्थानांतरित हो गई है। हालाँकि, अब भी कटाई के बाद फसल प्रबंधन (पीएचएम), फसल की कम कीमत और किसानों के लिए बाजार तक पहुंच में कठिनाई की चुनौतियाँ इस क्षेत्र में मौजूद हैं। कटाई के बाद फसल प्रबंधन में कमी, विशेष रूप से, फल और सब्जियों में 4.6 से 15.8त्न की, समुद्री मछलियों में 10.5त्न और मुर्गी पालन क्षेत्र में (आईसीएआर-सीआईपीएचईटी, 2015) 6.7' का नुकसान हुआ है। व्यक्तिगत शीत गृह सुविधाओं के निर्माण में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है, लेकिन भौगोलिक प्रसार की कमी बनी हुई है। साथ ही साथ एकीकृत बहु-सामग्री केंद्रों के उन्नयन की भी आवश्यकता है।

खाद्य प्रसंस्करण उद्योग (एफपीआई) इन आपूर्ति श्रृंखला अंतरालों की समस्या से निपटने के लिए तैयार है। विकास की ओर अग्रसर एफपीआई क्षेत्र अमूल, मदर डेयरी और बिग बास्केट के मॉडल के अनुसार किसानों के लिए अच्छा पारिश्रमिक सुनिश्चित करने के साथ-साथ, एक उचित और समान कृषि बाजार बनाने में मदद करेगा। हालांकि, भारत में एफपीआई इस समय एक नई अवस्था में है और यह हमारे कुल खाद्य उत्पादन का केवल 10 प्रतिशत है। संगठित निर्माण कार्यबल के 11.4' क्षेत्र को रोजगार देने के बावजूद, भारत का सकल मूल्य वर्धित-जीवीए विनिर्माण क्षेत्र में एफपीआई का हिस्सा 9.7' है, जो कि इंडोनेशिया में 35.5' और न्यूजीलैंड में 34.3' की तुलना में काफी कम है।

इस क्षेत्र में आपूर्ति श्रृंखला के लिए एक कुशल कृषि की स्थापना में योगदान करने के लिए, सरकार को पांच प्रमुख क्षेत्रों में हस्तक्षेप करने की आवश्यकता होगी:

पहला, एक जिला, एक उत्पाद की पहल के हिस्से के रूप में, सरकार सभी रणनीतिक रूप से स्थित हितधारकों की पहचान कर आपूर्ति श्रृंखला में मौजूदा अड़चनों का एक जिला स्तरीय फसलवार मूल्यांकन कर सकती है। इन हितधारकों में किसान, कृषक सहकारी /निर्माता कंपनियां और निजी उद्यम जैसे एकल निवेशक, व्यापारी, खाद्य उद्यम, ऑनलाइन और ऑफलाइन सुपरमार्केट, निर्यातक और खुदरा श्रृंखला शामिल होंगे।

दूसरा, जिला स्तर पर किसान के लिए इनपुट्स, क्रेडिट और मार्केटिंग से संबंधित जानकारी और सेवाओं को एकत्र करके फसल कटाई के बाद प्रबंधन की प्रौद्योगिकियों को अपनाना और व्यवहारिक तथा आर्थिक रूप से सक्षम बनाना, जो वर्तमान में स्थानीय व्यापारी द्वारा किया जाता है। किसानों और सामाजिक मानदंडों के अंतरंग ज्ञान के साथ ये स्थानीय दलाल जोखिम मूल्यांकनकर्ता, सूचना एकत्र करने और विश्वास निर्माण के लिए प्रभावशाली उत्प्रेरक होने के लिए आदर्श उम्मीदवार हैं। इसलिए, एफपीआई के व्यापार मॉडल में ऐसे प्रमुख स्थानीय दलालों की भूमिका को बनाए रखना महत्वपूर्ण है, जैसा कि आईटीसी के ई-चौपाल और नाबार्ड के मा-थोटा कार्यक्रम द्वारा किया गया है। इसके अलावा, अब किसान अपनी उपज को मंडियों से हटकर भी बेचने के लिए स्वतंत्र हैं, सेवा और सूचना एकत्रीकरण के वैकल्पिक स्थानों का निर्माण ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरह के महत्वपूर्ण हैं। पीएचएम के निर्माण के लिये यह ग्रामीण हाट में, मूल्य खोज के लिए ई-नाम केंद्र, भंडारण के लिए डब्ल्यूडीआरए पंजीकृत गोदामों और प्रौद्योगिकी प्रसार के लिए कृषि प्रसार केंद्रों और प्राथमिक कृषि सहकारी समितियों में उभर सकते हैं।

तीसरा, स्थानीय रूप से उपलब्ध सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों को पास के उत्पादन समूहों के साथ एकीकृत करने के लिए प्रोत्साहित करना ताकि वे बड़े निजी व्यवसाइयो से मुकाबला कर सकें। इसे निवेश बंधु पोर्टल और इंडिया इनवेस्टमेंट ग्रिड जैसे निवेशक मंच के माध्यम से सुगम बनाया जा सकता है, जो किसानों/एफपीओ के लिए पिछड़े संपर्कों के साथ आगे बढ़ सकते हैं।

चौथा, एफपीआई प्रशिक्षण चैनलों के माध्यम से स्थानीय क्षमता की ज़रूरतों से निपटने की आवश्यकता है। विशेष रूप से, किसानों / एफपीओ और खाद्य उद्यमों के लिए डिजिटल माध्यम के रूप में काम करने के लिए कॉमन सर्विस सेंटर के माध्यम से ग्रामीण युवाओं को बुनियादी आईटी प्रशिक्षण प्रदान करें। इसके अलावा, प्रमुख पीएचएम कौशल के साथ मंडी मजदूरों की लोडिंग, अनलोडिंग, सफाई और पैकेजिंग के कौशल विकास से भी एफपीआई आपूर्ति श्रृंखला की दक्षता में सुधार होगा।

पांचवां, ताजा उत्पादन और पर्यावरण के अनुकूल उत्पादों के प्रति उपभोक्ता वरीयताओं में बदलाव कोविड के बाद के उभरते संकेतों का अध्ययन करने के लिए उपभोक्ता व्यवहार विश्लेषिकी फर्मों को शामिल करें। एफपीआई की मांग-आपूर्ति डेटा द्विभाजन को पाटने के लिए और एफपीआई निवेश के लिए संभावित क्षेत्रों की पहचान करने के लिए ई-ताल (ई-टीएएएल) पर एम-किसान और किसान कॉल सेंटरों के माध्यम से एकत्र किए गए बड़े पैमाने पर डेटा का विश्लेषण भी फर्म कर सकते हैं। भारत के खाद्य क्षेत्र को वैश्विक भागीदारी के लिए खोल दिया गया है और खाद्य मूल्य श्रृंखला को मजबूत करने के लिए इसे पारिस्थितिकी तंत्र में शामिल करने से, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग भारत की कृषि में तीसरी हरित क्रांति का नेतृत्व करने की ओर अग्रसर है। इसके लिए राष्ट्रीय और ग्रामीण स्तर पर भारत की कृषि व्यवसाय प्रणालियों में सही तालमेल बैठाना होगा।

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