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दशहरे से हारा कोरोना : राष्ट्र विजय का संकल्प

असत्य पर सत्य की विजय के पर्व विजयादशमी इस वर्ष नये अंदाज में आया

दशहरे से हारा कोरोना : राष्ट्र विजय का संकल्प
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रमेश शर्मा

असत्य पर सत्य की विजय के पर्व विजयादशमी इस वर्ष नये अंदाज में आया। सामान्यत: अब तक विजयादशमी पर बुराइयों से दूर रहने और सत्य-धर्म की राह पर चलने का आव्हान होता रहा है, प्रतिवर्ष राम की तरह आदर्श जीवन जीने का संकल्प होता था। इस बार यह सब तो हुआ, राम का पूजन भी हुआ रावण के पुतले का दहन हुआ, देवी की उपासना पूजन हुई और एक आदर्श जीवन जीने का आव्हान भी हुआ। और इस वर्ष इन सबके साथ एक नया आव्हान भी हुआ, एक नया संकल्प भी लिया गया । यह आव्हान और संकल्प था राष्ट्र की विजय के लिये। एक ऐसी विजय जो समाज जीवन को समृद्ध करे, आत्म निर्भर करे और राष्ट्र की सीमाओं को अति सुरक्षित ।

यह आव्हान सबसे पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने राष्ट्र के नाम संदेश में किया। उन्होंने दो बातों पर जोर दिया एक तो यह कि हम अपनी आवश्यकता की प्रत्येक वस्तु का स्वयं निर्माण करें ताकि आयात की निर्भरता कम हो दूसरा हमारी संकल्प शक्ति, हमारी एकता इतनी सबल हो कि सीमा पर कोई भी आंख दिखाने का साहस न कर सके । लगभग इसी बात को अगले दिन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत जी ने दोहराया। 1925 में विजयदशमी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का स्थापना हुई थी। अपने स्थापना दिवस पर प्रतिवर्ष विजयादशमी को संघ प्रमुख राष्ट्र की समस्याओं और उनके समाधान पर चर्चा करते हैं । संघ के कार्यकर्ता उसी दिशा में काम करते हैं । दिये गये अपने संदेश में किया । उन्होंने देश के एक एक नागरिक को एक जुट होकर राष्ट्र निर्माण और राष्ट्र रक्षा के प्रति सक्रिय रहने का आव्हान किया । इसके बाद सार्वजानिक आयोजनों और दुर्गा उत्सव समितियों में ऐसे संकल्प और शपथ लेने का सिलसिला आरंभ हुआ । यह समय की आवश्यकता है कि समाज अपने त्यौहारों के उस सत्य को समझे जो इसके आयोजन के पीछे रहे हैं । भारत के त्यौहार केवल धार्मिक आयोजन या मनोरंजन उत्सव भर नहीं हैं । इनमें व्यक्तित्व निर्माण, समाज की जाग्रति और राष्ट्र चेतना का संदेश भी होता है । समय के साथ यह संदेश क्षीण हो गये और राष्ट्र पराधीनता के अंधकार में चला गया । 15 अगस्त 1947 को यद्यपि राजनैतिक प्रकाश तो प्रखर हुआ लेकिन मानसिक और सामाजिक सोच में परिवर्तन कम आया । दासत्व का अंधकार कम न हुआ । यही कारण था स्वतंत्रता के बाद भी भारतीय समाज में विदेशी भाषा, भोजन,भूषा और वस्तुओं अधीरता बनी रही, उनके पीछे मानो अंधी दौड़ शुरू हो गयी । अंग्रेजों ने एक षडयंत्र किया था कि भारत में भारत की उत्पादनशीलता समाप्त हो। मालिक अंग्रेज हों और भारतीय केवल नौकर बने, उनके कारखानों में बने सामान पर निर्भर रहें । आजादी के बाद इस मानसिकता में कोई परिवर्तन नहीं आया । पढ़ाई की होड़ तो मची, महंगे महंगे आधुनिक तकनीक के विद्यालय, विश्व विद्यालय भी खुले लेकिन ये युवाओं को स्वावलंबी नहीं बनाते, उन्हे अपने पाँव पर खड़ा होने में सक्षम नहीं बनाते बल्कि नौकर ही बनाते है । यह ठीक है कि कुछ को ऊँचा ऊँचा पैकेज मिल जाता है लेकिन हैं तो नौकर ही । इस जीवन शैली और मानसिकता के विकास का सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ कि भारत की उत्पादकता घट गई। दैनिक जीवन की छोटी छोटी वस्तुएं भी आयात होती हैं या यदि हमारे यहाँ कोई बड़े कारखाने हैं तो वह भी विदेशी निवेश पर आधारित। यह विचारणीय विषय है कि जो चीन छल से और कभी बल से निरंतर भारत की भूमि हथियाने में लगा है भारत के बाजार उसी चीन के सामान से पटे पड़े हैं । घर में रोशनी के बल्व, लिखने की कलम, बच्चों के खिलौने, मोबाइल और घडियां ही नहीं दीवाली के दिये और राखी के धागे भी चीन से बनकर आने लगे । प्रधानमंत्री औल संघ प्रमुख ने प्रकारांतर से इसी ओर राष्ट्र का ध्यान खींचा । इस बार की विजयादशमी सबसे अलग थी यदि सीमा पर चीन और पाकिस्तान के तनाव हैं तो देश के भीतर कोरोना की काली छाया थी । देश के भीतर और बाहर के दबाव के मनाई गई इस विजयादशमी पर समाज और राष्ट्र दोनों की सुरक्षा का प्रश्न उपस्थित था इसीलिए जो संकल्प लिये गये जो आव्हान हुये वो दोनों चुनौतियों के मुकाबले के थे । यदि प्रधानमंत्री ने लोकल पर वोकल होने का नारा दोहराया तो इसका आशय केवल यह है कि हम अपने उत्पादों पर जोर दे । अपने आसपास जो सामान बनता है उसे उपयोग करने की आदत डालें । इसी से आयात घटेगा, और देश आत्म निर्भर होगा । प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने शक्ति पूजा पर दिये अपने संदेश में समाज से आत्मनिर्भरता की अपील बार बार की । विजय केवल सीमा पर सैनिक की नहीं होती। यदि हम के युद्ध कौशल से ही नहीं व्यक्ति के भीतर आत्मविश्वास और समाज की आत्म निर्भरता से होती है । यदि हम छोटी छोटी दैनिक जीवन में उपयोग होने वाली वस्तुओं के लिये भी आयात पर निर्भर होंगे तो कैसे स्वयं को समृद्ध और विजयी मान सकेंगे । इस विजयादशमी पर इसी समग्र विजय का संकल्प व्यक्त किया गया । एक एक झाँकी में और एक एक राम विजय आयोजन में । इस दशहरे और दुर्गा उत्सव में दूसरा बदलाव झाँकियों में रहा । देश के भीतर करोना की काली छाया थी । देश के हर कौने और गाँव में थी । सरकार और कोरोना से लड़ रहे सामाजिक संगठनों ने कयी प्रकार की सावधानी बरतने की अपील की थी । झाँकियों में उन सब का पालन हुआ । इससे गरवा और बड़े आयोजन न हो सके । सादगी के आयोजनों में आस्था पूजन और धार्मिकता की कमी देखी गई । ऐसी कमी आना भी जरूरत थी । दुर्गा पूजन का सार्वजनिक आयोजन के पीछे समाज चेतना रही है लेकिन आयोजनों ने मनोरंजन का मार्ग पकड़ लिया था । मजबूरी में ही सही इसबार झाँकियों में यह मनोरंजन पक्ष नदारत था । पूजन हवन प्रार्थना में भी मां दुर्गा से कोरोना से मुक्ति और राष्ट्र रक्षा की याचना की गई । जो संभवत: उत्सव के सार्वजनिकीकरण करनै का उद्देश्य रहा होगा । लेकिन इसके साथ एक बात जरूर देखी गई । कोरोना के हजार मानसिक दबाब के बीच लोग घरों से निकले झाँकियों में गये लेकिन कहीं इन कारणों से कोरोना का विस्तार नहीं दिखा । बल्कि इन दिनों जो देशभर से आकड़े आये उनमें कोरोना के मरीज कम हुये बीमारी से ठीक होने वालों को प्रतिशत भी बढ़ा । यनि लोगों के संकल्प के आगे झुक गया कोरोना । दशहरे से हार गया कोरोना ।

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