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अर्थव्यवस्था: मांग बढ़ाए जाने की जरूरत

भारतीय अर्थव्यवस्था में विकास के पीछे मिडिल क्लास और लोअर मिडल क्लास का सबसे बड़ा योगदान

अर्थव्यवस्था: मांग बढ़ाए जाने की जरूरत
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डॉ. राघवेन्द्र शर्मा

भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद भले ही कृषि क्षेत्र हो। लेकिन, वर्तमान समय में भारतीय अर्थव्यवस्था में विकास के पीछे मिडिल क्लास और लोअर मिडल क्लास का सबसे बड़ा योगदान है। यही कारण है कि भारत को एक 'मिडिल इनकम ग्रुप' की अर्थव्यवस्था के रूप में परिभाषित किया जाता है। कोविड-19 के जारी वैश्विक संकट के बीच भारतीय परिदृश्य में आर्थिक दृष्टिकोण से सबसे अधिक चर्चा दो पहलुओं पर हो रही हैं।

पहला, भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे कमजोर आबादी यानी किसान, असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले मजदूर, दैनिक मजदूरी के लिए शहरों में पलायन करने वाले मजदूर और शहरों में सड़क के किनारे छोटा-मोटा व्यापार करके आजीविका चलाने वाले लोग।

दूसरा, भारतीय अर्थव्यवस्था में उत्पादन करने वाले यानी वह क्षेत्र जो इस देश में पूंजी और गैर-पूंजी वस्तुओं का उत्पादन करता है। सामान्य भाषा में कहें तो मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर या बिजनेस सेक्टर।

अब दूसरा प्रमुख विषय आर्थिक संकट की बुनियाद को सुनने का है. प्रश्न यह है कि कोविड-19 की वजह से जारी आर्थिक संकट की बुनियाद और उसके निवारण का केंद्र बिंदु क्या होना चाहिए? क्या कोविड-19 को ही भारतीय अर्थव्यवस्था की सुस्ती का कारण मानकर अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने की तैयारी करनी चाहिए या फिर पिछले 2 साल से चली आ रही आर्थिक सुस्ती को भी बुनियाद के रूप में लेते हुए किसी नए प्लान पर विचार करना चाहिए?

अर्थव्यवस्था के दृष्टिकोण से तो यही सही होगा कि जारी आर्थिक संकट से निपटने के लिए इसकी बुनियाद को ईमानदारी से चुना जाए. वर्तमान जारी आर्थिक संकट से पहले ही भारत में एक बड़ी 'मांग आधारित आर्थिक सुस्ती' आ चुकी थी और अब यह मांग के साथ-साथ आपूर्ति आधारित सुस्ती का रूप धारण कर चुकी है।

यकीनन कोविड-19 की चुनौतियों के बीच अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए मांग (डिमांड) में नई जान फूंकने की जरूरत स्पष्ट दिखाई दे रही है। स्थिति यह है कि देश की अर्थव्यवस्था में भविष्य की अनिश्चितताएं दिखाई देने के कारण लोग खर्च करने से बच रहे हैं। सरकार ने आर्थिक प्रोत्साहन के तहत जिन करोड़ों लाभार्थियों को नकदी हस्तांतरित की है, वे भी खर्च की बजाय बचत सहेज रहे हैं। ऐसे में सरकार द्वारा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वृद्धि तथा अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने के लिए उपभोक्ताओं को खर्च के लिए प्रेरित करना होगा। सरकार द्वारा नई मांग के निर्माण के लिए उन क्षेत्रों पर व्यय बढ़ाना होगा जो निवेश और वृद्धि को तत्काल गतिशील कर सकें। साथ ही, आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए रोजगार बढ़ाने, उद्योग-कारोबार को गतिशील करने और निर्यात वृद्धि के लिए नये प्रोत्साहन पैकेजों का ऐलान भी किया जाना जरूरी दिखाई दे रहा है।

हाल ही में सितम्बर, 2020 में प्रकाशित हुई विभिन्न वैश्विक क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों की रिपोर्ट्स में भारत में वित्त वर्ष 2020-21 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में भारी गिरावट के अनुमान प्रस्तुत किए गए हैं। एशियाई विकास बैंक (एडीबी) ने चालू वित्त वर्ष 2020-21 में भारतीय अर्थव्यवस्था में 9 फीसदी की गिरावट का अनुमान पेश किया है, तीन माह पहले जून माह में एडीबी ने भारतीय अर्थव्यवस्था में 4 फीसदी गिरावट का अनुमान लगाया था। जिस तरह से वैश्विक क्रेडिट रेंटिंग एजेंसियां भारत की जीडीपी में बड़ी गिरावट के अनुमान प्रस्तुत कर रही हैं, उसी तरह भारत में भी राष्ट्रीय और सरकारी एजेंसियों द्वारा प्रस्तुत नई रिपोर्ट्स में कोविड-19 के कारण जीडीपी में भारी गिरावट का परिदृश्य बताया जा रहा है।

केंद्रीय सांख्यिकीय कार्यालय के मुताबिक चालू वित्त वर्ष 2020-21 की पहली तिमाही अप्रैल से जून के महीनों में जीडीपी में 23.9 फीसदी की गिरावट आई है। अब दूसरी तिमाही में भी जीडीपी में गिरावट का परिदृश्य दिखाई दे रहा है। इस समय अर्थव्यवस्था के धीमा होने के पीछे कई कारण हैं। देश में लॉकडाउन के कारण आपूर्ति क्षेत्र को बड़ा झटका लगा है।

यह काफी खराब स्थिति है लेकिन यह और भी खराब तब हो जाएगी जब भारत पर वैश्विक अर्थव्यवस्था का प्रभाव पड़ेगा। जहां तक निर्यात का संबंध है, यह देखते हुए कि अधिकांश देशों में बड़े पैमाने पर राजकोषीय समर्थन के बावजूद वैश्विक अर्थव्यवस्था के संकुचित होने की संभावना है, वैश्विक व्यापार भी काफी संकुचित होगा। भारतीय निर्यात भी शायद ही इससे अछूता रहेगा। निर्यात के लिए उत्पादन को लॉकडाउन से मुक्त रखा गया है और इसलिए इसे उपरोक्त नुकसान की गणना में शामिल नहीं किया गया है। हालाँकि वैश्विक व्यापार में किस हद तक गिरावट आएगी, इसका कोई अनुमान नहीं है, लेकिन यह मानना अनुचित नहीं होगा कि 2020-21 में भारतीय निर्यात में पिछले वर्ष की तुलना में कम से कम 12त्न की कमी हो सकती है। ऐसी स्थिति में, निर्यात आय में रु.3,20,000 करोड़ की गिरावट आएगी और यदि इसमें गुणक प्रभाव धनात्मेक रूप से जुड़ जाएं तो इसके कारण 2020-21 में जीडीपी में लगभग रु. 6,00,000 करोड़ की समग्र हानि होगी।

अब सितम्बर, 2020 में कोरोना के फिर से बढऩे से देश के कई प्रदेशों और कई शहरों में प्रशासन और उद्योग के बीच सामंजस्य से फिर से आंशिक लॉकडाउन हो रहे हैं। लॉकडाउन ने केंद्र और राज्य सरकारों की पहले से खस्ता हालत को और कमजोर बना दिया है।

आयकर विभाग के मुताबिक देश के प्रमुख कर क्षेत्रों में चालू वित्त वर्ष 2020-21 में अप्रैल से जून की पहली तिमाही में करीब 40 प्रतिशत की कमी आई है।

वाणिज्यिक बैंक तथा नॉन-बैंकिंग फायनेंस कंपनियों (एनबीएफसी) सहित विभिन्न वित्तीय संस्थाएं अभी भी मुश्किल में हैं। इससे नया ऋण प्रभावित हो रहा है।फिर भी सरकार की ओर से जून, 2020 के बाद अर्थव्यवस्था को धीरे-धीरे खोलने की रणनीति के साथ राजकोषीय और नीतिगत कदमों का अर्थव्यवस्था पर कुछ अनुकूल असर अवश्य पड़ा है।

दूरसंचार, ई-कॉमर्स, आईटी और फार्मास्यूटिकल्स जैसे क्षेत्रों में मांग बढऩे लगी है। लोगों के घरों में रहने की वजह से सभी तरह के सामानों के ऑनलाइन ऑर्डर भी बढ़े हैं। घर से दफ्तर का काम करने के साथ-साथ, स्टूडेंट्स की स्कूल-कॉलेज की ऑनलाइन पढ़ाई, घरों में ही मनोरंजन कार्यक्रमों के फैलाव से डेटा इस्तेमाल में भारी वृद्धि हुई है।

भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के हाल के कारोबारी विश्वास सूचकांक (बीसीआई) से पता चलता है कि आर्थिक गतिविधियां सामान्य की ओर बढऩे से कुल मिलाकर कारोबारी धारणा में सुधार हुआ है।

ऐसे में कोविड-19 की चुनौतियों के बीच देश की जीडीपी बढ़ाने और अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए नई मांग के निर्माण, उपभोग बढ़ाने, रोजगार बढ़ाने तथा कारोबार और वित्तीय प्रोत्साहन के नये रणनीतिक कदम जरूरी दिखाई दे रहे हैं। आम आदमी की क्रयशक्ति बढ़ाने के साथ-साथ कोविड-19 के कारण खोए हुए रोजगार अवसरों को लौटाया जाना जरूरी है। सरकार द्वारा बड़े स्तर पर रोजगार पैदा कर सकने वाली परियोजनाओं के बारे में नये सिरे से सोचने की जरूरत है। ग्रामीण क्षेत्रों में चलने वाली रोजगार योजना मनरेगा पर और अधिक ध्यान देने की जरूरत दिखाई दे रही है। शहरी भारत में सरकार द्वारा मनरेगा की तर्ज पर अतिरिक्त रोजगार प्रयासों की आवश्यकता अनुभव की जा रही है।

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