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पाकिस्तान ने कराया था पुलवामा में आतंकी हमला

पाक के मंत्री फवाद चैधरी ने पाक संसद में उगला सच

पाकिस्तान ने कराया था पुलवामा में आतंकी हमला
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प्रमोद भार्गव

आखिरकार 14 फरवरी 2019 को पुलवामा में हुए आत्मघाती हमले का सच पाकिस्तान के केंद्रीय मंत्री फवाद चैधरी ने पाक की भरी संसद में उगल दिया। घमंड में इतराते चैधरी ने कहा कि 'पुलवामा हमला प्रधानमंत्री इमरान खान के नेतृत्व में किया गया था। यह पाक की बड़ी कामयाबी थी।Ó जबकि तत्काल आर्थिक प्रतिबंधों से बचने के लिए पाकिस्तान की इमरान सरकार इस आतंकी हमले से इंकार करती रही थी। लेकिन अब इस स्वीकारक्ति ने जता दिया है कि पाक आतंकवाद को खुला संरक्षण दे रहा है और भविष्य में भी वह बाज आने वाला नहीं है। इसलिए इस स्वीकारोक्ति के परिप्रेक्ष्य में संयुक्त राष्ट्र और अन्य मानवाधिकारों के संरक्षण देशों का दायित्व बनता है कि वे अब पाकिस्तान के प्रति कठोर रवैया अपनाते हुए आतंक पर लगाम लगाने के लिए आगे आएं।

कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर 14 फरवरी 2019 को यह हमला धोखे से किया गया था, जिसमें 44 जवान शहीद हो गए थे। इसके बाद भारत ने बालाकोट में एयर स्ट्राइक करते हुए पाक सीमा में स्थित कई आतंकी शिवरों पर हमला बोलकर भारतीय सैनिकों की शहादत का बदला लिया। इस हमले में बड़ी संख्या में आतंकी मारे गए थे। इस शिविर का संचालन वही मसूद अजहर का साला मौलाना यूसुफ कर रहा था, जिसने भारतीय संसद पर हमला बोला था। इस हमले से देश की जनता आग-बबूला थी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 56 इंची सीने को ललकार रही थी। इसी के परिणामस्वरूप मोदी ने सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम देकर भारतीयों की छाती को ठंडा किया। भारत में आतंक के लंबे दौर में यह पहला मौका था, जब पाकिस्तान की सीमा में घुसकर आतंकी शिविरों को भारतीय सेना ने ध्वस्त किया था। इस हमले के बाद भारतीय विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान का लड़ाकू विमान पाक सीमा में गिर गया था और उन्हें पाक सेना ने हिरासत में ले लिया था। इस हमले और अभिनंदन के पकड़ में आने के बाद पाक को अहसास हो रहा था कि भारत इस करतूत का बदला लेगा। इसीलिए पाकिस्तान के सांसद अयाज सादिक ने दावा किया है कि अभिनंदन के सिलसिले में आयोजित बैठक में पाक विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी के पैर कांप रहे थे। इस बैठक में इमरान खान भी मौजूद थे। शाह ने कहा था कि 'हमने अभिनंदन को नहीं छोड़ा तो भारत पाकिस्तान पर हमला कर देगा। इस भय के वशीभूत होकर ही एक मार्च 2019 को अभिनंदन को छोड़ दिया गया था।'

बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश विपक्ष के नेताओं ने कुछ इस तरह से की थी, जिससे भारत की वैश्विक स्तर पर किरकिरी हो और नरेंद्र मोदी को नीचा देखना पड़े। इन निंदक नेताओं में राहुल गांधी, बीके हरिप्रसाद, ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल प्रमुख थे। इन नेताओं ने न केवल सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल उठाए, बल्कि हरिप्राद ने तो नैतिकता और राष्ट्रीयता की सभी सीमाओं को लांघते हुए यहां तक कह दिया था कि पुलवामा हमला मोदी और इमरान खान की मिलीभगत का परिणाम है। राहुल ने पाकिस्तान को सबसे भरोसेमंद देश बताया तो केजरीवाल और ममता ने सर्जिकल स्ट्राइक में मारे गए आतंकियों की बतौर प्रमाण संख्या पूंछीं। पुलवामा हमले पर ये लोग पाकिस्तान की भाषा बोल रहे थे। यह समझ से परे है कि संकट की इस घड़ी में आखिरकार ये नेता पाकिस्तान के प्रति नरमी और प्रधानमंत्री मोदी के विरु़द्ध इतनी गरमी क्यों जता रहे थे। अच्छा है अब ये नेता अपने किए पर देश और जनता के प्रति शर्मिंदगी जताएं।

हालांकि नरेंद्र मोदी ने पाक द्वारा सच स्वीकारने के बाद सरदार पटेल की 145वीं जयंती पर गुजरात के केवाडिय़ा में नेताओं को करारा तमाचा जड़ा है। मोदी ने अपनी वेदना व्यक्त करते हुए पुलवामा हमले पर पहली बार कहा कि 'पाकिस्तान ने अपनी संसद में इस हमले का सच मंजूर कर लिया है। इस घटना में राजनीतिक लाभ तलाशने वाले विपक्षी नेताओं के चेहरे बेनकाब हो गए हैं। फवाद चैधरी ने इस हमले में व्याप्त पाक की भूमिका स्वीकार कर ली है। हमले के बाद जब देश शोक में डूबा था, तब कुछ लोग गंदी राजनीति में लिप्त होकर आतंकवाद के समर्थन में आ गए थे।'

जबकि दो दशक के भीतर यह पहला मौका था, जब पाक की सीमा में घुसकर आतंकियों को ठिकाने लगाया गया था। अन्यथा 15 दिसंबर 2001 को जैशे-मोहम्मद के पांच आतंकियों ने संसद पर हमला बोला था। उस दिन एक सफेद एंबेडसर कार में आए इन आतंकवादियों ने 45 मिनट में लोकतंत्र के इस सबसे बड़े और प्रमुख मंदिर को गोलियों से छलनी किया। हमलाबरों से मुकाबले में अपने प्राणों की परवाह किए बिना सीआरपीएफ के पांच जवान शहीद हुए। एक महिला सिपाही और दो सुरक्षा गार्ड भी दायित्व की वेदी पर बलिदान कर गए। अन्य 16 जवान घायल हुए। इस हमले का मास्टर माइंड अफजल गुरू था, जिसे बाद में 20 अक्टूबर 2006 को फांसी दे दी गई थी। इस हमले ने देश को बुरी तरह झकझोरा। गोया इस समय ठीक वैसा ही माहौल था, जैसा उरी और पुलवामा हमलों के बाद देखने में आया था। इस समय अटलबिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे, लेकिन अमेरिकी दबाव में पलटवार का कोई साहस नहीं जुटा पाए ? नतीजतन पाकिस्तान द्वारा निर्यात आतंक की यथास्थिति बनी रही।

26 नवंबर 2008 को मुंबई के ताज होटल समेत 10 आतंकियों ने चार ठिकानों पर हमले किए। इन हमलों में देशी-विदेशी 166 लोग मारे गए। तीन दिन तक महानगर आतंकियों का बंधक बना रहा। बमुश्किल सैन्य व सुरक्षाबलों की कार्रवाई ने नौ आतंकियों को मार गिराया और एक नाबालिग अजमल कसाब को जीवित पकड़ा। बाद में कसाब को 21 नवंबर 2012 को फांसी दे दी गई। इस समय में आवाम की भावना उग्र आक्रोश के रूप में दिखी, किंतु सोनिया गांधी द्वारा शासित प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कोई जवाबी करिश्मा नहीं दिखा पाए ? नतीजतन आतंक का निर्यात बरकरार रहा।

इसी तरह 18 सितंबर 2016 को उरी में स्थित थल सेना के स्थानीय मुख्यालय पर हुए आतंकी हमले में 18 सैनिक शहीद हुए। हालांकि जवाबी कार्यवाही में चार आतंकियों को तत्काल मार गिराया गया था, किंतु जनता बड़ी कार्यवाही के लिए बेचैन होकर 56 इंची सीने के लिए जबरदस्त चुनौती बनकर पेश आई। परिणाम में नरेंद्र मोदी ने साहस दिखाया और अपने कार्यकाल में 29 सितंबर 2016 को पहली सर्जिकल स्ट्राइक की। थल सेना ने पाक अधिकृत कश्मीर में करीब 20 किमी भीतर घुसकर जैशे-मोहम्मद के कई आतंकी ठिकानों को ध्वस्त कर दिया। इस कार्यवाही से जनता को राहत तो मिली, लेकिन आत्म-संतोष नहीं हुआ। इतना भी इसलिए संभव हो पाया, क्योंकि मोदी प्रधानमंत्री थे।

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