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मैं मध्य प्रदेश हूँ!

1 नवंबर 1956 को राज्यों के पुनर्गठन के वक्त हुआ जिसमें मध्य भारत, विन्ध्य प्रदेश एवं भोपाल शामिल थे

मैं मध्य प्रदेश हूँ!
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डॉ शिव कुमार राय

मैं मध्य प्रदेश हूँ। मेरे भू भाग का 135191 वर्ग किलोमीटर का एक हिस्सा अलग होकर छत्तीसगढ़ राज्य में तब्दील हो गया। मेरा प्रारंभिक अस्तित्व अवंति राज्य से जुड़ा था, जिसकी राजधानी उज्जैन हुआ करती थी, पश्चिमी भाग में स्थित यह राज्य चौथी से तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व मौर्य साम्राज्य का हिस्सा था जो बाद में मालवा के नाम से जाना गया। अपने मौजूदा स्वरूप की बात करूँ तो मेरा गठन 1 नवंबर 1956 को राज्यों के पुनर्गठन के वक्त हुआ जिसमें मध्य भारत, विन्ध्य प्रदेश एवं भोपाल शामिल थे। मुझे इसके पहले मध्य भारत के नाम से जाना जाता था। अब में भारत की ह्रदय स्थली हूँ। राज्य की धरती से जुड़े हर दल के सभी बड़े नेता सार्वजनिक मंच पर मुझे पूरे गौरव के साथ भारत की ह्रदय स्थली बताते हैं लेकिन यह मेरा दुर्भाग्य है कि इस ह्रदय की आर्थिक, सामाजिक, भौगोलिक और राजनीतिक सेहत का ख्याल किसी भी दल ने ठीक से नहीं रखा। यह बात ठीक है कि भारत के विभिन्न भागों को जोडऩे वाला रेल मार्ग मध्य प्रदेश से होकर गुजरता है। हवाई यातायात की बात की जाए तो दिल्ली और मुंबई के अलावा देर सबेर मुझे बेंगलुरू, हैदराबाद, चेन्नई जैसे कुछ शहरों से जोड़ दिया गया लेकिन अभी भी विमान सेवा की बात की जाए तो बेंगलुरू या हैदराबाद की फ्लाइट के लिए राजधानी भोपाल के लोगों को पहले इंदौर जाना पड़ता है। कहने को तो राजधानी का एयरपोर्ट राजा भोज के नाम से है लेकिन अगर फ्लाइट कनेक्टिविटी और एयरपोर्ट की दुर्दशा देखता हूँ तो मुझे अक्सर पुरानी कहावत 'कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली' की याद आती है। मेरी सरकारी प्रोफाइल पर नजऱ डाले तो मैं भारत का दूसरा सबसे बड़ा राज्य हूँ जो खनिज संसाधनों के मामले में भी दूसरा समृद्ध राज्य है। इसके साथ ही मेरी इस प्रोफाइल में यह भी बताया गया है कि यहाँ कृषि और देहाती अर्थव्यवस्था है लेकिन कड़वी हक़ीक़त यह भी है कि अब तक चाहे किसी भी दल की सरकार रही हो, मेरे प्रदेश के किसानों को वोट बैंक समझकर ही फैसले लिए गए। मेरे अस्तित्व में आने के बाद से लेकर अब तक किसानों की कर्जमाफी का झुनझुना सभी दलों ने बजाया है लेकिन खेती और किसानी में सुधार के लिए किसी भ प्रदेश की कुल जनसंख्या में कार्यशील जनसंख्या पर नजऱ डाली जाए तो 2001 में यह 42.74 फीसदी थी जो 2011 की जनगणना में बढ़कर 43.47 फीसदी हो गई। कुल कार्यशील जनसंख्या में कृषकों का प्रतिशत 2001 की जनगणना में 42.79 फीसदी था जो 2011 की जनगणना में घटकर 31.18 फीसदी हो गया। इसके साथ ही कुल कार्यशील जनसंख्या में खेतिहर मजदूरों का प्रतिशत 2001 में 28.69 फीसदी था जो 2011 में बढ़कर 38.61 फीसदी हो गया है। कुल मिलाकर कुल जनसंख्या में किसानों की संख्या का प्रतिशत भले ही कम हुआ हो लेकिन खेतिहर मजदूरों की संख्या में इज़ाफ़ा हुआ है।

मैं मध्य प्रदेश हूँ। मेरी सरकारी प्रोफाइल यह भी बताती है कि इंदौर, भोपाल, ग्वालियर और जबलपुर जैसे अधिक अग्रिम जि़लों में मुख्य रूप से औद्योगिक विकास केंद्रित हुआ है लेकिन इस सच्चाई से मेरे राज्य की जनता वाकिफ़़ है कि प्रदेश में रोजगार की स्थिति बेहतर नहीं है। भारत की ह्रदय स्थली के साथ ही संसाधनों से समृद्ध होने के बाद भी मेरी विकास की रफ्तार एक ढर्रे पर चलती रही जबकि मेरी तुलना में कम संसाधन वाले राज्य विकास के रास्ते पर तेज़ी से आगे बढ़ते चले गए। मेरे प्रदेश का राजनीतिक नेतृत्व चाहे किसी भी दल से जुड़ा रहा हो लेकिन प्रदेश में नए उद्योग लाने में उसके कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं दिखाई। आँकड़े भी कुछ यही कहानी बयाँ करते हैं। मध्य प्रदेश में कारखानों की संख्या पर नजऱ डाली जाए तो 2016-17 में कारखानों की संख्या 4494 थी और राज्य में प्रति लाख जनसंख्या पर कारखानों की संख्या मात्र 6 थी, वहीं 2017-18 में कारखानों की कुल संख्या 4533 हुई लेकिन प्रति लाख जनसंख्या पर कारखानों की संख्या 6 ही रही। अगर मैं देश के दूसरे राज्यों पर नजऱ डालता हूँ तो कई राज्यों की स्थिति मुझसे बेहतर है। कारखानों की संख्या को लेकर अगर गुजरात की बात की जाए तो 2016-17 में यह संख्या 25,966 थी और प्रति लाख जनसंख्या पर कारखानों की संख्या 43 थी जबकि 2017-18 में यह संख्या बढ़कर 26,586 हो गई और प्रति लाख जनसंख्या पर कारखानों की संख्या बढ़कर 44 हो गई। अकेले गुजरात नहीं, अगर दक्षिण भारत के राज्यों पर नजऱ डाली जाए तो 2017-18 में कर्नाटक में कारखानों की संख्या 13518 है और प्रति लाख जनसंख्या पर कारखानों की संख्या 22 है। महाराष्ट्र में कारखानों की संख्या 26 प्रदेश के कुछ नेता मुझको लेकर यह तो बताते हैं कि मैंने भारत के खनिज उत्पादन में बड़ा योगदान दिया है। बॉक्साइट उत्पादन, लौह अयस्क और कोयले के समृद्ध भंडार को लेकर अक्सर मेरी पीठ भी थपथपाई जाती है लेकिन अवैध उत्खनन को लेकर अक्सर सभी सरकारें चुप्पी साधे रहती हैं। मैं मध्यप्रदेश हूँ। मेरे एक बड़े हिस्से में आदिवासी भाई रहते हैं। जंगलों में पैदा होने वाली वनउपज की बात हो या किसी कलाकृति को गढऩे की बात हो, इनके योगदान की अनदेखी नहीं की जा सकती लेकिन मेरे प्रदेश के जनजातीय इलाकों में विकास की रफ्तार अब भी धीमी है। 2011-12 के आँकड़ों के मुताबिक गरीबी रेखा की बात की जाए तो मध्य प्रदेश की कुल जनसंख्या में 31.6 फीसदी लोग गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं जबकि महाराष्ट्र में 17.4 फीसदी लोग, गुजरात में 16.6 फीसदी, राजस्थान में 14.7 फीसदी, हरियाणा में 11.2 फीसदी, पंजाब में 8.3 फीसदी और केरल में 7.1 फीसदी लोग गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं। इसी तरह मानव विकास के सूचकांक के मुताबिक देश के कई राज्य मुझसे बेहतर स्थिति में हैं। नीति आयोग के आँकड़ों के मुताबिक मध्य प्रदेश की कुल साक्षरता दर की बात की जाए तो यह 2001 में 63.74 फीसदी थी और 2011 में यह बढ़कर 70.63 फीसदी हो गई। शहरी इलाको में पुरूषों की साक्षरता दर की बात की जाए तो 2001 में यह दर 87.39 फीसदी थी जो 2011 में बढ़कर 90.24 पर पहुँच गई जबकि शहरी इलाकों में महिलाओं की साक्षरता दर पर नजऱ डाली जाए तो यह 2001 में 50.29 फीसदी थी जो 2011 में बढ़कर 60.02 फीसदी पर ही पहुँच सकी। मध्य प्रदेश में ग्रामीण महिलाओं की साक्षरता दर की बात करें तो यह 2001 में 42.76 फीसदी थी जो 2011 में बढ़कर 53.20 फीसदी हो गई। अगर ग्रामीण पुरूषों की साक्षरता दर की बात की जाए तो यह आँकड़ा 2001 में 71.70 फीसदी था जो 2011 में बढ़कर 76.64 फीसदी पर पहुँच गया। मैं मध्य प्रदेश हूँ। मेरी सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि मैं शांति से रहता हूँ। मेरे प्रदेश की आबादी किसी भी तरह के उपद्रव या उपद्रवियों को पसंद नहीं करती। अपने गठन के समय से लेकर अब तक मुझे इंतज़ार है, एक ऐसे दूरदृष्टि से जुड़े नेतृत्व का जो मेरी आर्थिक, भौगोलिक, सामाजिक क्षमताओं को समझ सके और जो मेरे नौजवानों की प्रतिभा का उपयोग कर मुझे विकास के पथ पर सबसे आगे पहुँचा दे।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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