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अर्नब नहीं पत्रकारिता के मूल पर प्रहार हुआ ?

वामपंथी, कांग्रेसी और जिहादी पत्रकारिता ने एंकाकी और प्रत्यारोपित खेल-खेला है

अर्नब नहीं पत्रकारिता के मूल पर प्रहार हुआ ?
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विष्णु गुप्त

सरेआम भ्रष्ट कह सकते हैं, आप प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जहरीला कह सकते हैं, आप प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सरेआम मुस्लिम विरोधी कह सकते हैं, आप प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सरेआम देश तोड़क कह सकते हैं, आप प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सरेआम देशद्रोही कह सकते हैं, यह सब अभिव्यक्ति की आजादी हैं, आपको इसके लिए जेल नहीं जाना होगा, इसके लिए आपको कोई प्रताडऩा नहीं झेलनी होगी, इसके लिए आपको कोई आपमानजनक परिस्थियों का सहचर नहीं बनना होगा, इसके लिए आपको कोई तिरस्कार नहीं झेलनी होगी, बल्कि आपको ऐसी अमान्य और जहरीली टिप्पणियों के लिए कांग्रेस, कम्युनिस्ट और जिहादी मानसिकता के सहचरों की ओर से प्रशंसा मिलेगी, इसके लिए आपको फैलोशिप मिलेगी, इसके लिए आपको बडे अखबारों और बडे चैनलों में नौकरी मिल सकती हैं, कांग्रेस की रखैल एनजीओ राजीव गांधी फाउंडेशन जैसे हजारों एनजीओ से कोई न कोई स्टाइपन मिल जायेगा। पर आप जैसे ही इटली की बूढी बाला एंटोनियों माइनों के खिलाफ एक शब्द भी बोल दिये, उसकी हैसियत पर प्रश्न खड़ा कर दिये, उसकी जेहादी और एनजीओ तथा विदेशी परस्त राजनीति की पोल खोल दी, या फिर उसकी भ्रष्टचार की कहानियां कह दी, भ्रष्ट सोनिया सास के भ्रष्ट दामाद राबेट बढेरा पर कोई भ्रष्टचार-कदाचार पर कोई प्रश्न खड़ा कर दिया, कांग्रेस की मुस्लिम परस्त राजनीति पर प्रश्न खड़ा कर दिया तो फिर आपकी खैर नहीं, आपके दुर्दिन शुरू हो जायेंगे, आपके खिलाफ मनगढंत, तथ्यहीन और भ्रामक आरोप लग जायेंगे, आपकी प्रताडऩा के दौर शुरू हो जायेगी , आपकी जेल की सजा सुनिश्चित कराने के लिए खेल शुरू हो जायेंगे। अगर आपका वर्तमान ठीक है, अगर आपका दामन भी पूरी तरह से ठीक है, आपके पास संपत्ति नाम की कोई चीज नहीं है तो फिर आपको सांप्रदयिक कह कर सार्वजनिक प्रताडऩा की प्रक्रिया चलेगी, कहा जायेगा कि आप पत्रकार नहीं है, आप लेखक नहीं है, आप साहित्यकार नहीं है, आप बुद्धिजीवी नहीं है, आप किसी विषय के विशेषज्ञ नहीं है, आप तो सिर्फ और सिर्फ आरएसएस के मोहरे हैं, आरएसएस के सांप्रदायिक मोहरे और दंगाई हैं, आपको लेखन कार्य करने का अधिकार नहीं है, आपको पत्रकारिता करने का अधिकार नहीं है, आप अछूत ही नहीं बल्कि उपहास और प्रताडऩा तथा अपमान के पात्र बना दिये जायेंगे। कांग्रेस, कम्युनिस्ट और जिहादी मानसिकता के पत्रकार, राजनीतिज्ञ और जिहादी गठजोड़ ऐसा ही खेल खेलता रहता है, यह कौन नहीं जानता है? अर्नव गोस्वामी का कसूर क्या था? अर्नब गोस्वामी ने ऐसी कौन सी गुस्ताखी कर दी थी? जिससे बाल ठाकरे का पुत्र उद्धव ठाकरे और एंटोनियों माइनों उसके खिलाफ ऐसे पड़े कि कोई एक नहीं बल्कि उस पर दर्जनों मुकदमे डाल-लाद दिये? उद्धव ठाकरे और एंटोनियों माइनों ने अर्नब की कसौटी पर जो जहरीली प्रताडऩा की शुरूआत की है वह जहरीली प्रताडऩा अन्य राज्यों की सरकारों में शुरू हो गयी और वैसा ही खेल शुरू हो गया तो फिर क्या होग?, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों के लिए कितनी विकट और खतरनाक परिस्थितियां होगी, पत्रकारिता की अर्थी निकल जायेगी, एंटोनियों माइनों और उद्धव ठाकरे की इस करतूत का दुष्परिणाम ईमानदार और कर्तव्यशील पत्रकारों और बुद्धिजीवियों को झेलना होगा, खासकर एनजीओ चलाने वाले पत्रकार और तथाकथित सक्रियतावादी सिर्फ प्रताडऩा के ही शिकार नहीं होगे बल्कि उनकी जगह जेल होगीे। क्या यह सही नहीं है कि पत्रकार, लेखक और बुद्धिजीवी के भेष में अधिकतर कांग्रेसी, कम्युनिस्ट और जिहादी लोग एनजीओ चलाते हैं, देश को बेचकर विदेशों से पैसा लेते हैं और अपना जीवन ऐशोआराम से व्यतित करते हैं, उनकी पहली प्राथमिकता पंच सितारा और अपसंस्कृति होती है। कहना गलत नहीं होगा कि फिर ऐस पुनरावृति बढऩे पर ऐसी संस्कृति के लोग जेल में ही होंगे? सुनिश्चित तौर पर अर्नब गोस्वामी को एंटोनियों माइनों से उलझने का दुष्परिणाम मिला है। सोनिया गांधी को सरेआम एंटोनियों माइनों कहने और प्रश्न पूछने की गुस्ताखी की थी अर्नब गोस्वामी ने। आज तक सोनिया गांधी को इस भाषा में कौन पुकारने और ललकारने का साहस किया था? क्या सोनिया गांधी का असली नाम एंटोनियों माइनों नहीं है? एंटोनियों माइनों का नाम परिवर्तन कर सोनिया गांधी बन जाना और उनकी नागरिकता को लेकर आज भी प्रश्न खड़े किये जाते हैं। एंटोनियों माइनों की नागरिकता को लेकर ही कभी राष्ट्रपति ने सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया था जबकि उस समय सोनिया गांधी के पास बहुमत भी नहीं था, उन्ही की पार्टी के वरिष्ठ सदस्य और आज कांग्रेस के गठबंधन दल के नेता शरद पवार की टोली ने एंटोनिया माइनों को प्रधानमंत्री बनने से रोका। वामपंथी, कांग्रेसी और जिहादी कीड़े टाइप के पत्रकारों ने बहुत ही खुशी मनायी हैं और इन्होंने ऐसा प्रदर्शन किया मानों ये पत्रकारिता के निष्पक्ष प्रहरी है। वामपंथी, कांग्रेसी और जिहादी पत्रकारिता ने किस तरह से एंकाकी और प्रत्यारोपित खेल-खेला है, यह भी जगजाहिर है। वांमपंथी, कांग्रेसी और जिहादी मानसिकता के पत्रकारों को ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं है। उद्धव ठाकरे ने जो एक रास्ता दिया है वही रास्ता वामपंथी, कांग्रेसी और जिहादी मानसिकता के पत्रकारों पर खतरनाक और हिंसक रूप से भारी पडने वाला है। अब देश भर में भाजपा की सरकारें भी वामपंथी, कांग्रेसी और जिहादी पत्रकारों के पुराने और नये कुकर्मों, भ्रष्टाचारों और अन्य अमान्य गतिविधियों को खोल कर जेल में डालेंगी। इसलिए वामपंथी, कांग्रेसी और जिहादी पत्रकारों, लेखकों और बुद्धिजीवियों की यह खुशी ज्यादा दिनों तक टिकने वाली नहीं है।

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