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गोवंश संरक्षण, गो संवद्र्धन तथा गोपालन हेतु मध्यप्रदेश ही सर्वाधिक अनुकूल राज्य है

7 नवम्बर 1966 को गोभक्त समुदाय संतों तथा हजारों की संख्या में संसद भवन की ओर अग्रसर भक्तजनों पर पुलिस द्वारा अश्रुगैस छोड़ा गया एवं गोलियाँ चलाई गई

गोवंश संरक्षण, गो संवद्र्धन तथा गोपालन हेतु मध्यप्रदेश ही सर्वाधिक अनुकूल राज्य है
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महामण्डलेश्वर स्वामी अखिलेश्वरानंद गिरि

गाय और गोवंश के महत्व को वर्तमान समय में रेखाँकित करना समय की अनिवार्य आवश्यकता है, यद्यपि गाय और सम्पूर्ण गोवंश की विशेषताओं के सम्बन्ध में लिखना सूर्य को दीपक दिखाने जैसा ही जान पड़ता है। जैसे सूर्य को उद्घाटित या प्रकाशित करने के लिये किसी भी अन्य प्रकाश की आवश्यकता नहीं उसी प्रकार गाय (भारतीय गोवंश) के महत्व को प्रतिपादित करने के लिये अन्य किसी भी उदाहरण की अपेक्षा नहीं क्योंकि जैसे सूर्य का अन्य कोई विकल्प न होकर सूर्य स्वयं ही अपना विकल्प है,जैसे अमृत स्वयं ही अमृत का विकल्प है उसी प्रकार गाय का कोई दूसरा विकल्प जगतीतल पर नहीं, वह तो स्वयं ही स्वयं का विकल्प है। भारतीय गोवंश तो सर्वथा अनुपमेय है। सृष्टि की विभिन्न संरचनाओं में पशु आकृति में वस्तुत: 'गाय' देवता है। स्वर्ग में इसे कामधेनु,सुरभि,नंदिनी जैसे अनेक नामों से पुकारा जाता है। स्वर्गस्थ 'कामधेनु' के नाम, रूप, गुण और धर्म का प्रतिनिधित्व करने वाली गाय (गोवंश)को पृथ्वी लोक में भी समस्त ऐश्वर्यों को देने वाली 'देवी' गो लक्ष्मी कहा गया है।भारतीय धर्मग्रन्थों और सभी शास्त्रों एवं वेदोपनिषदों में गोवंश (गाय) का अद्भुत और विशद् महत्व प्रतिपादित हुआ है।

मूक सृष्टि का प्रतीक गाय

विधाता की इस चित्र-विचित्रात्मक सृष्टि में अनेक जीवों की रचनायें मानव को विस्मय में डाल देने वाली हैं किन्तु विस्मयकारी रचनाओं में तो 'गाय' वास्तव में गहन चिन्तन और विश्लेषण पूर्वक अनुसंधान का आधार है। विधाता की सृष्ूिट दो प्रकार से सृजित है,पहली मुखर सृष्टि और दूसरी मूक सृष्ूिट। मुखर सृष्टि का प्रतीक मानव है तो मूक सृष्टि का प्रतीक गाय। सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार सर्वशक्तिमान् परमात्मा दोनों ही प्रकार की सृष्टि का परमपिता है,उसे अपनी बनाई सृष्टि और उसका प्रत्येक सृजन अत्यंत प्रिय है।जब-जब उसकी सृष्टि के सृजन पर संकट आता है वह धरती पर अवतरित होता है इसी अवतरण को हिन्दू धर्म में अवतारवाद कहा गया है। सृष्टि के सृजनकर्ता,पालनकर्ता परमात्मा के अवतार का प्रयोजन महत्त्वपूर्ण माना गया है जिसके लिये श्रीमद्गवद्गीता और रामायण जैसे लोकप्रिय ग्रन्थों में स्पष्ट रूप से वर्णन है:-

'विप्र धेनु, सुर, संत हित-लीन्ह मनुज अवतार'

सृष्टि सञ्चालन और उसके दीर्घकाल तक संरक्षण के चार महत्त्वपूर्ण उपकरण हैं जिनमें विप्र, गाय,देवता और श्रेष्ठ जीवन जीने वाले महापुरुष अर्थात् 'सन्त' का उल्लेख है। जैसा कि मैं ऊपर की पंक्तियों में उल्लेख कर चुका हूँ, सृष्टि दो प्रकार की है एक मुखर और दूसरी मूक। 'विप्र' शब्द मुखर सृष्टि का उपलक्षण है तथा 'धेनु' (गाय) शब्द मूक सृष्टि का उपलक्षण है। सुर अर्थात् देवता और सन्त माने श्रेष्ठ जीवन जीने वाला समूह। देव और संत ये दोनों ही मानव आकृति में विशिष्ट गुणों का प्रतिनिधित्व अपने आचरणों के माध्यम से करते हैं। देवों में देने का गुण है (देवता सरल और उदार वृत्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं) तथा सन्त श्रेष्ठ जीवन मूल्यों के संरक्षण एवं उन जीवन मूल्यों के पोषण हेतु सतत् सक्रिय रहकर उनके प्रचार-प्रसार में महनीय योगदान करते हैं। सन्तों की मूलवृत्ति शोधपरक 'अन्वेषणात्मक' होती है जो प्रत्येक काल, प्रत्येक युग में प्रासंगिक होती है अत: भगवान् भी इन्हीं तत्वों और वृत्तियों के रक्षण एवं उनके पुनस्र्थापन का कार्य अपने अवतरण या अवतार काल में करते हैं।हमारे धर्मग्रन्थों में पृथ्वी के धारक तत्वों का उल्लेख है वह इस प्रकार है:-

गोभिर्विप्रैश्च वेदैश्च सतीभि: सत्यवादिभि:।

अलुब्धैर्दानशीलैश्च सप्तभिर्धारयते मही।।

'सुखी गायें, विप्र, वेदज्ञ, पतिब्रता स्त्री, सत्यवादी, निर्लोभी और दानशीलजन। इनके कारण ही पृथ्वी सुरक्षित और संरक्षित रहती है।'

*स्वतंत्र भारत में गोवंश रक्षण की दृष्टि से किये गये प्रयासों पर भी एक दृष्टि डालना आवश्यक इसलिए भी आवश्यक है कि आजादी प्राप्ति के बाद भी विगत 72 वर्षों से अनेक अभियान, अनुष्ठान एवं आन्दोलनों के सक्रिय रहते स्वतंत्र भारत के नागरिक 'गोवंश संरक्षण' एवं गोसंवद्र्धन हेतु आज भी असफलता का अनुभव कर रहे हैं क्यों?आयें! थोड़ा चिंतन इस पर भी करते हैं-*

भारत की समृद्धि का आधार गोवंश

15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हो जाने के बाद देश में बेहद प्रसन्नता का माहौल था, स्वाभाविक है देशवासियों का प्रसन्न होना;एक हजार वर्ष की गुलामियत की जंजीर से जकड़ा प्रत्येक देशभक्त प्रसन्नता से प्रफुल्लित था। अब स्वतंत्र भारत में भारतीय संस्कृति के 'मानक' जो पराधीनता के कालखण्ड में प्राय: ध्वस्त कर दिये गये थे-जीरण-शीर्ण अवस्था में पड़े उन मानकों को पुनर्जीवन की सम्भावना एवं उनके पुनरुद्धार का विचार स्वतंत्र भारत के तत्कालीन नागरिकों, यहाँ के अध्यात्म साधकों,धर्म-समुदाय एवं साँस्कृतिक जीवन मूल्यों के पक्षधरों, साधु-संत, महात्मा एवं सज्जन प्रकृति के संस्कृति उपासकों के मन में आकार ले रही थी तथा स्वतंत्र भारत के तत्कालीन शासकों के समक्ष उन्होंने अपनी आवाज उठाई और तर्क दिया कि जब इस्लामिक उसूलों के संरक्षण एवं उन उसूलों के विकास हेतु देश का एक बड़ा भू-भाग जब उन्हें दे दिया गया और भारत का दुर्भाग्यपूर्ण विभाजन हम सबने स्वीकार कर लिया तब शेष भारत को धर्मसापेक्ष्य घोषित कर देना चाहिए ताकि परम्परा से प्राप्त सनातन जीवनमूल्य और हिन्दू जीवन पद्धति पूर्णत: सुरक्षित हो एवं उन्नयन-विकास और उसके प्रचार-प्रसार का समुचित मार्ग स्वतंत्र भारत में प्रशस्त हो, इस प्रकार के चिंतन में पूज्य महात्मा गाँधी का वह विचार भी समाहित था जो स्वाधीनता संग्राम के दिनों में वे अपनी दैनिक प्रार्थना सभा में या अपने सार्वजनिक उद्बोधनों में कहा करते थे कि-*स्वराज प्राप्त करने से भी मेरे लिये अहम् और बड़ा प्रश्न भारतीय गोवंश की रक्षा करना है, उनकी स्पष्ट रूप से स्वीकारोक्ति थी कि-हमारे सनातन जीवन मूल्यों में गाय और गोवंश का रक्षण और उसका संवद्र्धन सर्वोपरि है तथा हम हिन्दू गाय को माँ का दर्जा देते हैं; उसका सम्मान करते हैं, महात्मा गाँधी का स्पष्ट मानना था कि-'भारत की आर्थिक समृद्धि का मुख्य आधार हमारा भारतीय गोवंश है, भारतीय कृषि की समुन्नति का द्वार गोवंश के सहयोग से ही खुलता है' अत: स्वतंत्र भारत में उसकी उपेक्षा नहीं की जायेगी। गोवंश संरक्षण हेतु वे कठोर कानून के प्रबल पक्षधर थे,वे चाहते थे 'सम्पूर्ण गोवंश की हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध वाला कानून स्वतंत्र भारत में बनाया जायेÓ इसके लिये वे सार्वजनिक मंचों के अतिरिक्त काँग्रेस पार्टी की बैठकों में तथा अपनी प्रार्थनासभाओं में निरंतर विचार प्रस्तुति के साथ-साथ आम नागरिकों से आह्वान भी करते थे।

*अपने आध्यात्मिक उत्तराधिकारी श्री आचार्य विनोवा भावे जी को उन्होंने इस अभियान के लिये अधिकृत रूप से घोषित भी किया था जो अंतिम समय तक 'गो हत्या बंदी' के लिये सक्रिय रहे। सर्वोदय जैसी संस्था के निर्माण और भू-दान यज्ञ जैसी सामाजिक-धार्मिक विधा के माध्यम से वे बापू के संकल्प को मूर्त स्वरूप देने का प्रयास भी करते रहे।*

'विश्व हिन्दू परिषद्' का गठन

सन् 1964 में स्वतंत्र भारत में हिन्दू एकात्मता और राष्ट्रीय एकता जागरण के लिये तत्कालीन भारतीय आध्यात्मिक जगत् के शीर्षस्थ सन्तों के नेतृत्व और मार्गदर्शन में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के तत्कालीन द्वितीय सरसंघ चालक परमपूजनीय गुरूजी श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवरकर जिन्हें पूरा देश 'परमपूजनीय गुरूजी' के सम्बोधन से पुकारता था, की सार्थक पहल पर 'विश्व हिन्दू परिषद्' का गठन हुआ और हिन्दू जागरण के निमित्त कुछ करणीय कार्य तीन-चार महत्वपूर्ण सूत्रों (बिन्दुओं)पर सुनिश्चित किये गये। जिनमें गोवंश की रक्षा हेतु देश व्यापी संकल्प अभियान तथा दिल्ली में एक बड़े आन्दोलन की रूपरेखा तैयार की गई तथा सर्वप्रथम आचार्यश्री विनोबा भावे जी एवं तत्कालीन भारत शासन के केंद्रीय गृहमंत्री श्री गुलजारीलाल नंदा जी के साथ बैठकर सन्तों, पूज्य धर्माचार्यों एवं समाज के अग्रणी नेतृत्वकर्ताओं के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधीजी से भेंटकर 'गोवंश हत्या बन्दी' के पक्ष में अपना अभिमत व्यक्त करते हुये भारतीय संविधान में गोरक्षा हेतु कठोर कानून बनाने की माँग की जिस पर प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी जी तैयार हो गईं, उनके आश्वासन पर ही संत समाज, साधु-महात्मागण देश के वरिष्ठ धर्माचार्य, सनातन धर्म के सभी मत-पंथ, सम्प्रदाय, जैन, बौद्ध, सिक्ख, आर्य समाज जैसे संगठनों के सन्त, मुनिगण आदि दिल्ली पहुँचे।

7 नवम्बर 1966 गो भक्तों गोलियां चलीं

वह दिन भारतीय पञ्चाङ्ग के अनुसार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी 'गोपाष्टमी' का दिन था। कहाँ तो द्वापर युग में आज ही के दिन गोपालक गोभक्त श्रीकृष्ण ने इस दिन गोचारण-गोसेवा,गोरक्षण का संकल्प लिया था किन्तु स्वतंत्र भारत में इसी तिथि को अनपेक्षित और अप्रत्याशित घटित घटना ने हिन्दू जन मानस को उद्वेलित कर दिया उस दिन इंग्लिश कलेण्डर के अनुसार दिनांक 7 नवम्बर 1966 था सभी सन्त, महात्मा एवं गोभक्त समुदाय की लगभग 25 लाख की उपस्थिति थी। गोभक्तों का नेतृत्व कर रहे तत्कालीन सुप्रसिद्ध संत शिरोमणि, धर्म सम्राट कहे जाने वाले स्वामी श्री हरिहरानंद सरस्वती जी उपाख्य स्वामी करपात्रीजी महाराज,गोवद्र्धन पुरी पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री निरञ्जनदेव तीर्थ जी महाराज,सुप्रसिद्ध गोभक्त महर्षि वेदव्यास प्रणीत 18 पुराणों को हिन्दी भाषा में अनुदित करने वाले महान् संत श्री प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी महाराज, आचार्यश्री रामचंद्रवीर जी महाराज,आर्य समाज के स्वामी रामेश्वरानंद जी प्रभृति सन्तों की अगुवाई में अपना 'गोरक्षा सम्बंधी' माँग पत्र प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी जी को सौंपने जा रहे प्रमुख संतों तथा हजारों की संख्या में संसद भवन की ओर अग्रसर भक्तजनों पर पुलिस द्वारा अश्रुगैस छोड़ा गया, गोलियां चलाई गई एवं लाठियां भांजी जाने लगी अनेक घायल हुये, अनेक गोलोकवासी हो गये। यह सब विभत्स्य और विकराल रूप से घटित हुआ जिसकी पूरे देश में निन्दा हुई। इस घटना से दु:खी और क्षुब्ध होकर केंद्रीय गृह मंत्री श्री गुलजारीलाल नंदा जी ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया।

गोवंश की रक्षा हेतु कानून तो बनाये किन्तु लचर-पचर

स्वतंत्र भारत में अँग्रेजी हुकूमत के समय के प्रचलित कानूनों और संविधान की समीक्षा हुई, कुछ नियम-कानून पराधीन भारत के अँग्रेजों के बनाये ज्यों के त्यों स्वीकार कर लिये गये कुछ में संशोधन किया गया; इसी तर्ज पर अधिकांश देशवासी नागरिकों का अभिमत था कि गोवंश की रक्षा हेतु केंद्रीय कानून बन जाये, अँग्रेजों के जमाने के कत्लखानों के लाईसेंस रद्द हो जायें, और कत्लखाने बंद हो जायें जिससे सम्पूर्ण देश में, भारत के सभी राज्यों में कानून, पारम्परिक श्रद्धा और विश्वासों के बल पर गोवंश का जीवन सुरक्षित हो जाये किन्तु संविधान की एक धारा के अनुसार गोवंश रक्षा का विषय केंद्र की सूची में न रखकर, राज्यों का विषय माना गया और भारतीय संविधान की मंशा के अनुसार-'संविधान के नीति निदेशक सिद्धांतों' के अन्तर्गत राज्यों को निर्देशित किया गया कि वे विकास के संसाधनों को अपने राज्य की भू-सीमा में उनकी सुरक्षा हेतु कानून बनाने में स्वतंत्र हैं। कुछ राज्यों ने गोवंश की रक्षा हेतु कानून तो बनाये किन्तु लचर-पचर कानून बने, ईमानदारी से कानून न बनाना, फिर बने कानून का ईमानदारी से पालन न करना। कानून के क्रियान्वयन के अभाव में गोवंश कटता गया।इतना ही नहीं कत्लखानों की बाढ़ आ गई और उसका दुष्परिणाम यह हुआ कि राज्यों में कृषि का आधार गोवंश घटता ही चला गया।वर्तमान में भारत में गोवंश के आंकड़े चौंकाने वाले (किसानों और गोभक्तों की आँख खोलने वाले) हैं।

आजादी प्राप्ति के बाद से लम्बा कालखण्ड बीत गया। मानव के स्वास्थ्य का रक्षण न होकर रोगाणुवद्र्धक खाद्य पदार्थों के सेवन से अनेक प्रकार के रोगों ने देश के नागरिकों को घेर कर दबोच लिया। वर्तमान में चिंता भारतीय गोवंश को बचाने एवं उनके रक्षण-संरक्षण तथा संवद्र्धन की है।

मध्यप्रदेश शासन ने गोवंश की हत्या पर पूर्ण रोक लगाई

*मध्यप्रदेश शासन ने सन्त-महात्माओं की इच्छा एवं देश के समस्त देशभक्त नागरिकों की भावना का सम्मान करते हुये गोवंश रक्षा सम्बन्धी कानून बनाकर अपने राज्य की सीमा में 'गोवंश की हत्या पर पूर्ण रोक लगाई है' हम कह सकते हैं कि-मध्यप्रदेश में सम्पूर्ण गोवंश वध पर पूर्ण प्रतिबंधात्मक कानून राज्य में प्रभावी है लेकिन कानून बना देने या बन जाने मात्र से उद्देश्य की पूर्ति नहीं होती उसका क्रियान्वयन महत्वपूर्ण भाग है; जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन के साथ-साथप्रदेश के नागरिकों का भी दायित्त्व होता है।कानून की जानकारी शासक, प्रशासक और आमजन को समान रूप से होने पर क्रियान्वयन सही ढ़ंग से होता है, फिर न्यायालय भी नागरिकों के अधिकारियों के रक्षण एवं कानून की रक्षा तदनुरूप क्रियान्वयन में सहायक होते हैं। देश और प्रदेश के नागरिकों को अपने मौलिक अधिकारों का सम्यक् परिज्ञान महत्त्वपूर्ण पक्ष है। गोवंश की रक्षा करना नागरिकों का संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार है । भारत के सुप्रीमकोर्ट के सात जजों की संविधान पीठ का दिनाँक 26 अक्टूबर 2005 का निर्णय अत्यंत महत्वपूर्ण है जिसमें स्पष्टत: कहा गया है कि- भारत में गोवंश (गायों) के कत्लखाने बंद हों, यह आदेश 66पन्नों का है। सुप्रीमकोर्ट का मानना है गायों (गोवंश) का काटना संवैधानिक दृष्टि से अपराध और धार्मिक दृष्टि से पाप है; सुप्रीमकोर्ट का कहना है कि गोरक्षा एवं गोसंवद्र्धन करना देश के प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक कर्तव्य है, नागरिकों का मौलिक अधिकार है कि वे गोवंश की रक्षा करें।

*मध्यप्रदेश एक मात्र ऐसा राज्य है जिसके पास गोवंश रक्षा का मजबूत कानून है साथ ही राज्य की भू-परिधि में 95 हजार वर्गकिलोमीटर का जंगल भी है। 'गाय का भोजन जंगल में और जंगल का भोजन गाय के पास' इस प्राकृतिक समीकरण के आधार पर गोवंश संरक्षण और गो संवद्र्धन की प्रबल सम्भावना यहाँ मौजूद हैं। यही वजह है कि-अविभाजित मध्यप्रदेश में यहाँ के जंगल में 10 गो-सदन होते थे और वर्तमान भाजपा की सरकार ने आगर मालवा जिले की सुसनेर तहसील अन्तर्गत 'सालरिया' नामक ग्राम में 1400 एकड़ के विशाल भूमि में 'गो-अभयारण्य' विकसित किया है,जिसके विभिन्न हिस्सों में गायों के आवासादि की संरचना एवं सभी प्रकार के निर्माणों का कार्य पूर्ण होकर उसे गोवंश की सेवा में समर्पित किया गया है।*

*यह 'गो-अभयारण्य' उन समस्त सन्त-महात्माओं, पूज्य धर्माचार्यों की पावन स्मृति को समर्पित है, जिन्होंने अनेकानेक आन्दोलन,अभियान व अनुष्ठान स्वतंत्र भारत में चलाकर गो भक्तों, सरकारों से आह्वान किया यहाँ तक कि आवश्यकता पड़ी तो बलिदान भी दिये; उन्हीं दिव्यात्माओं/ अमलात्माओं, महात्माओं की स्मृति को समर्पित है यह बृहद् गो -सेवा प्रकल्प।*

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