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सात्विक प्रवृत्तियों को जागृत करने का पुण्य माह है कार्तिक

सात्विक प्रवृत्तियों को जागृत करने का पुण्य माह है कार्तिक
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मार्कण्डेय शारदेय

हम बचपन से ही देखते आ रहे हैं कि कार्तिक आते ही हमारी मां-बहनें रात बीतने के पहले ही जग कर घर-आंगन की सफाई कर स्नानार्थतत्पर हो जाती हैं। आस-पास में नदी, नहर, तालाब, कुआं, जो संभव हुआ, वहां प्रात: स्नान कर पूजा-पाठ, कथा-श्रवण किया करती हैं। आज करोना काल में भले इसमें सामूहिक दूरियां आयी हों, पर धार्मिक भावना मंद नहीं पडऩे वाली।

यद्यपि शास्त्रों में पुरुषों से ही यह कृत्य संबद्ध है, तथापि पुरुष वर्ग इसमें पिछड़ा दिखता है। संभवत: पुरुषों को देश-देशांतर में अर्थोपार्जन हेतु जाना पड़ा तब स्त्रियों ने मोर्चा संभाला। शायद अत्यधिक आचरित व्रतादि में कभी पुरुषवर्ग अडंगा डालने लगा, तो कन्या की ओर से वैवाहिक प्रतिज्ञाओं में जोड़ दिया गया -

व्रतोद्यापन-दानानि स्त्रीणां भावा: स्वभावजा:।

कृतभंगोनते कार्य: स्त्रीणांराय: तथा वदेत् ।।

आशय यह कि हमारा स्वभाविक धर्म है कि हम व्रत, उद्यापन, दान-जैसे धार्मिक कृत्य करें। इसमें आप बाधा नहीं डालेंगे, ऐसी प्रतिज्ञा करें।

वस्तुत: कार्तिक शरद ऋतु का दूसरा महीना है। इस समय भगवान सूर्य प्राय: तुला राशि पर रहते हैं और नवजात ठंड बढ़त पर रहती है। पूर्णिमा को कृत्तिका नक्षत्र होने से इसका नाम कार्तिक पड़ा है। इसके और नामों में बाहुल, ऊर्जा एवं कौमुद भी हैं। वैष्णवी भावना से कार्तिक, माघ एवं वैशाख का पुराणों में विशेष महत्व है। इसके पक्ष में कहा गया है -

कार्तिक: प्रवरोमासो वैष्णवानां प्रिय: सदा।

कार्तिक मास आता है तो अनेक पर्व-त्योहार भी दौड़े चले आते हैं। उनमें खास हैं- करवाचौथ, अहोई, धनतेरस, दीपावली, भइया दूज, छठ, अक्षय नवमी, देवोत्थान एकादशी एवं कतिकी पूनो। ये अपने साथ इतिहास-पुराण की कहानियों को जोड़े आते हैं। हमें मानवीय मूल्यों की सीख देने तथा सदाचारों की प्रेरणा देने आते हैं। अन्य मासों के अतिरिक्त इसमें अपनायी जाने वाली विधि-निषेधों से युक्त दिनचर्या जहां ऋतुसंधि से उत्पन्न प्रकोपों से हमारा बचाव करती है, वहीं सात्विक प्रवृत्तियों को जागृत भी करती है। इसीलिए कहा गया है-

कार्तिके सकलं मासं प्रात:स्नायी जितेन्द्रिय:।

जपन् हविष्यभुक् शान्त: सर्वपापै: प्रमुच्यते ।।

अर्थात, इन्द्रिय-निग्रह के साथ पूरे कार्तिक प्रात: स्नान करने वाला, मंत्रों का जप करने वाला, हविष्य ग्रहण करने वाला एवं शांत चित्त, यानी किसी से झगड़ा-लड़ाई न करने वाला व किसी को कठोर शब्द न बोलने वाला सभी पापों से मुक्त हो जाता है।

सभी देवता एक ही हैं, जिनमें पंचदेवता (विष्णु, शिव, गणेश, सूर्य एवं दुर्गा) प्रधान हैं। फिर भी ये पांच होकर भी पांच नहीं, एक ही हैं। इसी तथ्य को उजागर करते 'कार्तिक- माहात्म्यÓ के पहले अध्याय में श्रीकृष्ण, सत्यभामा से कहते हैं- एकोऽहं पंचधा जात: क्रीडया नामभि: किल। इसे वह खेल कहते हैं, जिसे हम लीला मानते हैं। खैर, उनका यह भी कहना है कि चाहे किसी देवी-देवता की पूजा करें, मेरी ही हो जाती है। कहा भी गया है -

आकाशात् पतितं तोयंयथागच्छतिसागरम्।

सर्वदेव-नमस्कार: केशवं प्रतिगच्छति ।।

अर्थात्, जैसे आसमान से बरसा पानी, अंतत: सागर में ही जाता है, वैसे ही और देवताओं की गयी पूजा व नमन भी श्रीहरि के पास ही पहुंचता है। कार्तिक स्नान के साथ यह प्रार्थना भी आयी है -

ऊं कार्तिकेऽहं करिष्यामि प्रात:स्नानंजनार्दन।

प्रीत्यर्थं तव देवेशदामोदर मया सह।।

पूरे माह नित्य व्रत-विधि अपनाने में दिक्कत हो तो कम-से-कम अंतिम पांच दिनों तक ही अवश्य करें। शास्त्र-निर्दिष्ट विधि से कतराना पाप माना गया है, इसलिए जो मांसाहारी हैं, वे भी शाकाहार करते हैं।

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