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ट्रंप की पराजय से बदलेगी वैश्विक नीतियां

ट्रंप की अनुपस्थिति में भारत-अमेरिकी संबंध

ट्रंप की पराजय से बदलेगी वैश्विक नीतियां
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विकेश कुमार बडोला

डोनाल्ड ट्रंप 59वां राष्ट्रपति चुनाव हार चुके हैं। अमेरिकी लोकतांत्रिक इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि किसी (ट्रंप)राष्ट्रपति का दूसरे कार्यकाल के लिए चयन नहीं हुआ। जो. बाइडेन 46वें अमेरिकी राष्ट्रपति बनने की दिशा में बढ़ चुके हैं। डेमोक्रेट्स और वामपंथी खुश हैं। उनकी दृष्टि में अमेरिका-अमेरिकी फस्र्ट की धारणा बनाने वाले ट्रंप फासीवादी थे। उनकी नजर में ट्रंप मूर्ख और बेहूदा नेता थे। भारतीय वामपंथी मीडिया बिरादरी भी ऐसा ही सोचती है। हमारे यहां मीडिया की इस बिरादरी को राहुल गांधी के बचकाना वक्तव्य बेशक मूर्खता का पर्याय न लगें, सोनिया गांधी अनपढ़ होकर भी और दस वर्षों तक यूपीए को परदे के पीछे से जैसे-तैसे डिक्टेट करते हुए चलाते हुए भी मूर्ख व बेहूदा न लगे, पर ट्रंप इन्हें मूर्ख लगते हैं। जो ट्रंप 2019 की संयुक्त राष्ट्र की आमसभा में कागज का टुकड़ा हाथ में लिए बिना, सवा घंटे तक धाराप्रवाह सुविचारित वक्तव्य दे देते हों, जो हर बात को बिना लाग-लपेट के अमेरिकी हित सोचकर बोल देते हैं, वे अमेरिकी और दुनिया की वामपंथी मीडिया के लिए मूर्ख नेता हैं। जिनका नामांकन नोबल शांति पुरस्कार के लिए हो चुका हो, वे विरोधियों की नजर में हलके नेता हैं। यही मीडिया बिरादरी और यही ट्रंप विरोधी लोग, आतंकवादी गिरोहों के मुखियाओं को 'जी' व 'श्री' का संबोधन देते आए हैं, परन्तु ट्रंप इनके लिए निकृष्ट किस्म के व्यक्ति इसलिए बन जाते हैं, क्योंकि वे रिपब्लिकन की ओर से अमेरिकी राष्ट्रपति होते हुए सच्ची राष्ट्रीय अस्मिता की बात करते हैं। इस दिशा में अपने शासकीय कार्य करते हैं। वे चूंकि अमेरिकी संस्कृति, सम्प्रभुता और निष्ठा के लिए बिना किसी के हाथों बिके नि:स्वार्थ भाव से देश हित में कार्यरत थे, इसलिए वे मूर्ख व बचकाने नेता हैं।

ट्रंप के बारे में ऐसा ही दुष्प्रचार किया गया। अमेरिकी लोगों ने मूर्खतावश इस दुष्प्रचार को सच मान लिया और ट्रंप को पुन: सत्तारूढ़ करने का बहुमत नहीं दिया। इसलिए अमेरिका अब डेमोक्रेट के हाथों में पहुंचकर आत्मघाती राह पर पुन: लौट चुका है। निस्संदेह डेमोक्रेट्स के लिए सत्तारूढ़ होना अचरच का विषय नहीं। अमेरिकी लोकतांत्रिक आविर्भाव से लेकर अब तक डेमोक्रेट्स ने ही दीर्घकाल तक अमेरिकी सत्ता का नेतृत्व किया है। परन्तु रिपब्लिकन का सत्ताच्युत होना अवश्य ही अमेरिकियों और ट्रंप के वैश्विक समर्थकों के लिए बहुत बड़ा धक्का है। यह चुनाव परिणाम तात्कालिक और दीर्घकालिक दोनों ही दृष्टियों से न तो अमेरिका और न ही दुनिया के हित में है। यह परिणाम चीन, मुसलिम देशों, मानवाधिकार के नाम पर दुनिया में लोगों के अवैध आवागमन-प्रवासन के पक्ष में रहकर अपनी राजनीतिक सत्ता कायम करने के इच्छुक अमेरिकी-विदेशी नेताओं के लिए सुखद समाचार बनकर आया है। अमेरिका के आनेवाले 4 साल फिर से उसी पटरी पर पहुंचने वाले हैं, जहां 2016 से पहले थे। जो राज व्यवस्था ट्रंप ने स्थापित की थी, जो वैश्विक कूटनीतियां उन्होंने बनायी थीं, जितना राजनीतिक श्रम उन्होंने अमेरिकी राजनीति को अपेक्षित कार्यवाहक दिशा देने के लिए किया था और राष्ट्रवाद की जो अभिव्यक्ति उन्होंने कार्यरूप में परिणत की,किंचित संदेह नहीं है कि वह सब कुछ डेमोक्रेट्स के सत्तारूढ़ होते ही धूमिल हो जाएगा।

भारत में कई विशिष्ट और साधारण लोगों द्वारा लिखा-बोला जा रहा है कि ट्रंप हों या बिडेन उससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा। यह कदाचित व्यर्थ आकलन है। बिडेन राष्ट्रपति के रूप में अंतर्राष्ट्रीय और भारतीय नीतियों को उसी दिशा में ले जानेवाले हैं, जो दिशा ओबामा प्रशासन में उन्होंने उप-राष्ट्रपति रहते हुए तय की थी। ओबामा वामपंथियों, मुसलमानों, धर्मनिरपेक्षियों और मानवाधिकार की आत्घाती नीतियां बनानेवालों की पसंद थे। इसलिए अब अमेरिका में वही काम फिर से होने शुरू हो जाएंगे, जिनके विरोध में मूल अमेरिकी उठ खड़े हुए थे, और ट्रंप को अप्रत्याशित जीत दिलायी थी। निश्चित रूप में डेमोक्रेट्स जो. बाइडेन, दुनिया में सर्वाधिक चुनातियां खड़े करने वाले चीन के प्रति वैसा सटीक, संतुलित और अमेरिका-दुनिया का हित चाहने वाला व्यवहार नहीं करेंगे, जैसा ट्रंप कर रहे थे। इसके पीछे बाइडेन की मजबूरी है। मजबूरी यह है कि डेमोक्रेट्स को कहीं न कहीं ट्रंप के विरुद्ध चीन प्रेरित राजनीतिक समर्थन भी प्राप्त था। अत: अब बाइडेन को इसकी कीमत भी चीन को चुकानी ही पड़ेगी। इसलिए डेमोक्रेट्स के सत्तारूढ़ होते ही दुनिया में चीन के विरुद्ध आकार लेने वाली भारत, अमेरिका, आस्ट्रेलिया और जापान की गुटसापेक्षता धीरे-धीरे कुंद पड़ती जाएगी। आतंकवाद पर नियंत्रण और उन्मूलन के लिए जो कठोर और कार्यकारी कदम ट्रंप प्रशासन ने उठाए थे, अब डेमोक्रेट्स के सत्तारूढ़ होते ही उनमें कई कारणों से ढिलायी शुरू हो जाएगी। इन कारणों में प्रमुख कारण हैं-धर्मनिरपेक्षता और मानवाधिकार के संरक्षण के लिए डेमोक्रेट्स का झुकाव। जबकि यही धर्मनिरपेक्षता और मानवाधिकार के नाटक-नौटंकी दुनिया में आतंकवाद में वृद्धि होने का धीमे विष हैं। जिस प्रकार ट्रंप को लेकर अमेरिका और दुनिया का वामपंथी मीडिया विरोध की विरोधाभासी स्थितियों से घिरा हुआ है, वही स्थिति ट्रंप विरोधी देशों या देशों में ट्रंप का विरोध करनेवाले राजनीतिक दलों की भी है। विरोध के विरोधाभासों का उदाहरण समझने लोगों को 2016 के राष्ट्रपति चुनाव परिणामों के कालखंड में झांकना पड़ेगा। जैसे ट्रंप अभी कह रहे हैं कि अवैध मतदान हुआ है, सभी मत वैध तरीके से पड़ते तो वे निश्चित ही विजयी होते और, कि इस धांधली को वे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे, ठीक इसी प्रकार के वक्तव्य 2016 में डेमोक्रेट्स की पराजित राष्ट्रपति प्रत्याशी हिलेरी क्लिंटन ने भी दिए थे। इस समय अमेरिका में ट्रंप के समर्थक अवैध मतदान होने, फिर से मतगणना करने, चुनाव निरस्त करने और पुनर्मतदान करने को लेकर जिस आक्रोश व गुस्से के साथ सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन कर रहे हैं, ठीक ऐसा ही आक्रोश व गुस्सा 2016 में ट्रंप की विजय की घोषणा के बाद से लेकर जनवरी में राष्ट्रपति पद के शपथग्रहण समारोह (इनैग्युरेशन) तक हिलेरी के समर्थकों ने प्रदर्शित किया था। परन्तु तब किसी भी अमेरिकी मीडिया संस्थान, मीडियाकर्मी और न्यायाधीश ने हिलेरी को लोकतंत्र, संविधान और जनमत के प्रति सम्मान दिखाने की हिदायत नहीं दी। इसके उलट, तमाम मीडियाकर्मी और कई न्यायालयों के न्यायाधीश हिलेरी के इन आरोपों का समर्थन ही कर रहे थे कि ट्रंप फर्जी तरीके से चुनाव जीते हैं। लेकिन यही अमेरिकी मीडिया और न्यायिक बिरादरी इस समय ट्रंप की लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति, राष्ट्रपति बने रहने तक उनके द्वारा किए जानेवाले व लिए गए निर्णयों और चुनाव परिणामों से संबंधित उनके हर उचित रोष का गलत व हास्यास्पद अर्थ निकाल रही है। देखा जाए तो ऐसा होना स्वाभाविक भी है, क्योंकि वाशिंगटन पोस्ट और न्यूयार्क टाइम्स जैसे मीडिया संस्थानों से लेकर दुनिया के कोने-कोने में फैले वामपंथी मीडिया संस्थानों तक इनसे जुड़े मीडियाकर्मियों के लिए यह सुखद एहसास उनकी इच्छा के अनुरूप ही है कि अब अमेरिका रिपब्लिकन, विशेषकर ट्रंप के हाथों में नहीं है।

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