Top
undefined

सिद्धांत सेवा और समर्पण का अद्भुत उदाहरण थे सारंग जी

कैलाश सारंग एक अनुशासन बद्ध और समर्पित कार्यकर्ता थे

सिद्धांत सेवा और समर्पण का अद्भुत उदाहरण थे सारंग जी
X

रमेश शर्मा

श्री कैलाश नारायण सारंग मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी प्रमुख संस्थापक सदस्य तो थे ही वे भारतीय जनता पार्टी के पूर्व स्वरूप भारतीय जनसंघ की नींव को सींचने वाले कुछ गिने चुने लोगों में थे। वे मूल भोपाल के नहीं थे, भोपाल के समीप रायसेन जिले में एक छोटे-से गांव डूंगर गांव के रहने वाले थे। पिता शिक्षक थे, पूर्वजों की कुछ कृषि भूमि भी थी। बाल व्यय में वे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़ गये । उनका गांव और जिला भोपाल रियासत का हिस्सा था । यहाँ के नबाब दोस्त मोहम्मद खां ने अपनी रियासत को पाकिस्तान में मिलाने की घोषणा कर दी थी। इससे जन आक्रोश बढ़ा और आँदोलन खड़ा हुआ । यह आँदोलन भोपाल शहर में कम लेकिन आसपास के गांव में तेज हुआ । सारंग जी किशोर वय में ही इस आँदोलन से जुड़े और समाज सेवा और देश सेवा की ऐसी राह पकड़ी कि फिर पीछे पलटकर न देखा । भोपाल विविधीकरण आंदोलन में उन्हे प्रभात फेरियां निकालने का काम मिला वे इसी काम में जुट गये। समय के साथ भोपाल रियासत भारतीय गणतंत्र का हिस्सा बनी और सारंग जी का भोपाल आना जाना शुरू हुआ। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने राष्ट्रीय स्तर पर एक राजनैतिक दल के गठन का निर्णय लिया इसकी शाखा भोपाल में भी बनी । जनसंघ की शुरूआत लखेरापुरा में एक किराये के मकान में शुरु हुई। संघ संपर्कों ने सारंग जी को जनसंघ में काम करने के लिये प्रोत्साहित किया और सारंग जी जनसंघ से जुड़ गये । यह वो समय था जब जनसंघ के पास आय के रूप में एक नये पैसे की भी आवक नहीं थी । जो भी कार्यकर्ता तब जनसंघ से जुड़े वे अपनी जेब से खाते ही थे और खाने के लिये भी कहीं अलग मेहनत करके आजीविका का प्रबंध करते थे । सारंग जी भी उनमें से एक थे उन्हें पार्टी कार्यालय के रख रखाब का दायित्व मिला। जो उन्होंने पूरे मनोरोग से निभाया । उन्हें कार्यालय प्रभारी बनाया गया । कार्यालय में टेबल कुर्सी भी नहीं थी । कमरे में दरी बिछी थी । सब वहीं आकर बैठते। सारंग जी ने अपनी आजीविका के लिये पहले ट्यूशन पढ़ाना आरंभ की और फिर एक दैनिक समाचार पत्र में नौकरी कर ली, पर पार्टी की सेवा न छोड़ी । यह कोई कल्पना कर सकता है कि एक कार्यालय प्रभारी कार्यालय की सफाई भी स्वयं अपने हाथ से करे । सारंग जी यह सब करते थे। वे बड़े सबेरे आकर पहले कार्यालय की सफाई करते, झाड़ू लगाते पानी का मटका भरते । फिर स्नान करके बढिय़ा कुर्ता पायजामा या धोती कुर्ता पहनकर प्रभारी के रूप में आसन जमा लेते । यह क्रम उनका वर्षों रहा। समय के साथ पार्टी कार्यालय सोमवारा चौक में आया। कुछ साधन बढ़े तो टेबिल कुर्सी और अलमारी आ गयी पर चपरासी रखने लायक साधन न बढ़े । कार्यालय प्रभारी का पद कार्यालय मंत्री के रूप में हो गया । सारंग जी का एक कक्ष भी हो गया लेकिन चपरासी रखने की गुंजाइश अभी भी न बनी। वे कार्यालय परिसर में ही रहते और कार्यालय सफाई का काम बड़े गर्व से करते । वे एक अनुशासन वद्ध और समर्पित कार्यकर्ता थे । संगठन के प्रभारी कुशाभाऊ ठाकरे थे । उन दिनों जनसंघ में पद नाम का कोई महत्व नहीं होता था, दायित्व का महत्व होता था। पदनाम कुछ भी हो लेकिन कुशाभाऊ ठाकरे के पास मानों सारे अधिकार निहित रहते । सारंग जी का क्रम उनके बाद आता । सारंग जी मानों संगठन के इनरव्हील थे । कार्यकर्ता तैयार करने, संगठन का विस्तार करने, साधन बढ़ाने और समय की चुनौतियों के अनुरूप राजनैतिक अभियान चलाने के प्रांतीय निर्णय या केन्द्र से कार्यक्रमों के क्रियान्वयन की रणनीति बनाने का जिम्मा सारंग जी के ऊपर था । वे यह खूब जानते थे कि कौन कार्यकर्ता क्या काम कर सकता है, वे इसी बात को भांप कर काम सौंपते थे । उनके लिये ठाकरे जी कथन मानों ब्रह्म वाक्य होता था । यह अनुशासन का वह पाठ होता है संघ का प्रत्येक स्वयं सेवक शाखा में सीखता है। सारंग जी में आजीवन यह पाठ देखा गया । उन्होंने न कभी मर्यादा की सीमा लांघी और न कभी अनुशासन भंग किया । वे तब भी शांत और अनुशासन बद्ध रहे जब एक बार पर कुछ राजनैतिक द्वेष के कारण आक्षेपों की बौछार हुई । सारंग जी शांत और संयत रहे । समय के साथ बादल छटे और उनकी प्रखर सेवा का प्रकाश पुन: फैल गया। वे चौबीसों घंटे पार्टी सेवा के लिये प्रस्तुत रहते । सोमवारा के जनसंघ कार्यालय में तीसरे मंजिल पर आगे चल कर एक कक्ष और बढ़ा जो अतिथियों के लिये बना । उस कक्ष में दीनदयाल जी, अटल जी, आदि सभी शीर्षस्थ राजनेता आकर ठहरते । सबके भोजन का प्रबंध सारंग जी के घर से होता था । यह उनके समर्पण का एक उदाहरण है। १९६२ के विधानसभा चुनाव के समय प्रदेश भर में जनसंघ उम्मीदवारों के चयन में सारंग जी की बड़ी भूमिका रही । १९६७ में कांग्रेस के जिन चालीस विधायकों ने दल बदल करके कांग्रेस सरकार को गिराया था। उन सभी विधायकों को भोपाल में गोपनीयता के साथ आवास भोजन की सारी व्यवस्था का जिम्मा सारंग जी के पास था । वे आपात काल में मीसा में बंदी रहे । १९७३ के बाद देश भर में आरंभ हुये जेपी आँदोलन की सभाओं का आंतरिक प्रबंध भी सारंग जी के हाथ में था । आपातकाल के बाद पूरे प्रदेश भर सभाएं चुनाव प्रबंध, कौन वक्ताओं को कहाँ भेजना आदि सब प्रबंध सारंग जी करते थे। १९७७ में जनसंघ का विलय जनता पार्टी में हो गया लेकिन तालमेल न बैठा । १९८० में जनसंघ घटक के लोगों ने एक नये दल भारतीय जनता पार्टी का गठन किया । कहने का अर्थ यह है कि सारंग जी जनसंघ की नींव को सींचने वाले थे तो मध्यप्रदेश में भाजपा के बीज को रोपने वालों में प्रमुख थे । उन्होंने सैकड़ों कार्यकर्ताओं को मानों गढ़ा था, निखारा था । वर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान उनमें से एक हैं । एक सिद्धांत के लिये, संग़ठन के लिये एक अनुशासन बद्ध कार्यकर्ता थे । अपने वरिष्ठ के संदेश को समझना और उसे नीचे कार्यकर्ताओ तक पहुँचाना उनकी विशेषता थी । वे लक्ष्य पूर्ति मे भरोसा रखते थे । असफलता शब्द मानों उनके शब्द कोष में न था । वे असफलता के लिये न बहाने खोजते न सुनना पसंद करते । लक्ष्य भेद करने का मानों उन्हें जुनून रहता । वे जो काम हाथ में लेते उसे पूरा किये बिना रुकते न झुकते। निष्ठा बदलना सिद्धांत बदलना, समस्या आने पर मार्ग बदलना उनके स्वभाव में था । वे संवेदनाओं से भरे थे। भावुक स्वभाव के थे लेकिन संकल्पशीलता अद्भुत थी । दृढ़ता से भरी गतिशीलता सदैव रहती । एक बार कदम बढ़ा कर पीछे न हटाना उनकी कार्यशैली का अंग था । लेकिन अपनी गलतियों को छिपाना या पर्दा डालना उन्हें आता नहीं था । गलती को तुरन्त स्वीकार कर लेते । सब बात ठाकरे जी बता देते । अपने काम का लक्ष्य उनके सामने सदैव महत्वपूर्ण होता । परिवार के दायित्व भी कई बार पीछे छूटे हैं ।

Next Story
Share it
Top