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भारत के विरोध के बावजूद पीओके में चुनाव

पीओके भारत के जम्मू-कश्मीर राज्य का अधिकारिक भाग है

भारत के विरोध के बावजूद पीओके में चुनाव
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प्रमोद भार्गव

पाकिस्तान ने गिलगिट-बाल्टिस्तान को नए पांचवें प्रांत का प्रस्ताव पारित कराकर भारतीय अखंडता के विरुद्ध साजिश की बुनियाद पहले ही रख दी थी, अब इमरान खान सरकार ने यहां विधानसभा चुनाव कराकर इस साजिश को और गहरा दिया है। पाकिस्तान की ये कोशिशें असंवैधानिक होने के साथ शिमला-समझौते के भी खिलाफ हैं। इस प्रांत के नक्शे में विवादित पीओके की भूमि भी शामिल है। चुनाव में इमरान के नेतृत्व वाली 'पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) ने सर्वाधिक सीटें जीती हैं, बावजूद वह बहुमत में नहीं है। लेकिन निर्दलियों के बड़ी संख्या में जीतने से माना जा रहा है कि पीटीआई को सरकार बनाने में अड़चन नहीं आएगी। मालूम हो कि 2010 में पेश किए गए राजनीतिक सुधार के बाद यह पीओके में तीसरा विधानसभा चुनाव है। यहां परंपरा रही है कि जो पार्टी इस्लामाबाद में सत्तारूढ़ होती है, वही गिलगिट-बाल्टिस्तान में चुनाव जीत लेती है। यहां विधानसभा की कुल 24 सीटें हैं। चूंकि पीओके भारत के जम्मू-कश्मीर राज्य का अधिकारिक भाग है, इसलिए ये सीटें जम्मू-कश्मीर की सीटों में भी शामिल हैं। भारत ने इस चुनाव पर कड़ा विरोध जताया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने चुनाव की घोषणा पर कहा था कि सैन्य माध्यम से कब्जाए गए क्षेत्र की स्थिति में बदलाव करने के किसी कदम का कोई कानूनी आधार नहीं है। यह राज्य पाकिस्तान का न तो आधिकारिक भाग है और न ही अब तक इसे संवैधानिक दर्जा प्राप्त है। यहां के लोग राष्ट्रीय चुनावों में मतदान भी नहीं करते हैं। इसलिए हठपूर्वक की गई चुनावी प्रक्रिया अवैधानिक है। भारत ने अगस्त 2019 को जब जम्मू-कश्मीर को अलग संघ शासित प्रदेश बनाया तो पाकिस्तान ने मुद्दे का अंतर्राष्ट्रीयकरण करने की कोशिश की। किंतु भारत अविभाजित कश्मीर के वादे पर कायम रहा। नतीजतन पाकिस्तान को कहीं से भी समर्थन नहीं मिला।

पीओके की परिधि में आने वाले गिलगिट-बाल्टिस्तान वास्तव में भारत के जम्मू-कश्मीर राज्य के हिस्सा हैं। बावजूद 4 नबंवर 1947 से पाकिस्तान के नाजायज कब्जे में हैं। जिन इलाकों को पाक अधिकृत कश्मीर के रूप में जाना जाता है, उन्हें पाकिस्तान ने 1947-48 में हमला करके अपने कब्जे में ले लिया था। इनमें भी गिलगिट-बाल्टिस्तान का जो भूखंड है, उसकी कहानी थोड़ी भिन्न है। दरअसल गिलगिट का क्षेत्र अंग्रेजों ने जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरिसिंह से पट्टे पर लिया था। जिससे इस क्षेत्र के ऊंचे शिखरों से निगरानी की जा सके। इसके लिए गिलगिट स्काउट्स फोर्स नामक सेना भी रहती थी। अंग्रेजों को जब भारत छोड़कर जाना पड़ा तो उन्होंने पट्टे के दस्तावेज हरिसिंह को लौटा दिए। उन्होंने ब्रिगेडियर घंसार सिंह को यहां का गर्वनर बना दिया। गिलगिट स्काउट्स के सैनिक भी महाराज के अधीन कर दिए गए। मेजर डब्ल्यू ए ब्राउन और कैप्टन एएस मैथीसन इस फौज के अधिकारी थे। जब पाकिस्तान ने कबायलियों की आड़ में पाकिस्तानी फौज भेजकर जम्मू-कश्मीर पर आक्रमण कर दिया, तब इस विपरीत परिस्थति के चलते हरिसिंह को अपना राज्य भारत में विलय करने को मजबूर होना पड़ा। 4 अक्टूबर 1947 को इंस्टूमेंट ऑफ एक्सेशन नामक दस्तावेज पर दस्तखत हुए। इसके बाद गिलगिट-बाल्टिस्तान पर भारत का वैध कब्जा हो गया। लेकिन ब्राउन ने महाराज के साथ गद्दारी की। उसने घंसार सिंह को गिरफ्तार कर पेशावर की जेल में भिजवा दिया। साथ ही अंग्रेज सीनियर लेफ्टिनेंट रोजर बेकन को खबर की कि गिलगिट-बाल्टिस्तान पाकिस्तान का हिस्सा बनने जा रहा है। 2 नबंवर 1947 को ब्राउन ने यहां पाक का झण्डा भी फहरा दिया। तब से इस भूखंड पर पाक का कब्जा बना हुआ है। यहां तभी से राजनीतिक अधिकारों के लिए लोकतांत्रिक आवाज उठाने वाले लोगों पर दमन और अत्याचार जारी है। साफ है, पाक की आजादी के साथ गिलगिट-बाल्टिस्तान का मुद्दा जुड़ा हुआ है। पाक की कुल भूमि का 40 फीसदी हिस्सा यहीं है। लेकिन इसका विकास नहीं हुआ है। करीब 1 करोड़ 30 लाख की आबादी वाले इस हिस्से में सर्वाधिक बलूच हैं, इसलिए इसे गिलगिट-ब्लूूचिस्तान भी कहा जाता है। पाक और ब्लूूचिस्तान के बीच संघर्ष 1945, 1958, 1962-63, 1973-77 में होता रहा है। 77 में पाक द्वारा दमन के बाद करीब 2 दशक तक यहां शांति रही। लेकिन 1999 में परवेज मुशर्रफ सत्ता में आए तो उन्होंने ब्लूच भूमि पर सैनिक अड्डे खोल दिए। इसे ब्लूूचों ने अपने क्षेत्र पर कब्जे की कोशिश माना और फिर से संघर्ष तेज हो गया। इसके बाद यहां कई अलगाववादी आंदोलन वजूद में आए, इनमें प्रमुख ब्लूूचिस्तान लिबरेशन आर्मी है।

निर्वाचन की प्रक्रिया से गुजरने के बावजूद यहां की विधानसभा को अपने बूते कोई कानून बनाने का अधिकार नहीं है। सारे फैसले एक परिषद् लेती है, जिसके अध्यक्ष पाकिस्तान के पदेन प्रधानमंत्री होते हैं। लिहाजा चुनाव के बावजूद भी यहां विद्रोह की आग सुलगी रहती है। यह आग अस्तोर, दियामिर और हुनजा समेत उन सब इलाकों में सुलगी रहती है, जो शिया बहुल हैं। सुन्नी बहुल पाकिस्तान में शिया और अहमदिया मुस्लिमों समेत सभी धार्मिक अल्पसंख्यक प्रताडि़त किए जा रहे हैं। अहमदिया मुस्लिमों के साथ तो पाक के मुस्लिम समाज और हुकूमत ने भी ज्यादती बरती है। 1947 में उन्हें गैर मुस्लिम घोषित कर दिया गया था। तब से वे न केवल बेगाने हैं, बल्कि हिंदू, सिख व ईसाइयों की तरह मजहबी चरमपंथियों के निशाने पर भी रहते हैं। मई 2010 में लाहौर में एक साथ दो अहमदी मस्जिदों पर कातिलाना हमला बोलकर करीब एक सौ निरीह लोगों की हत्या कर दी गई थी।

पीओके और ब्लूचिस्तान पाक के लिए बहिष्कृत क्षेत्र हैं। पीओके की जमीन का इस्तेमाल वह, जहां भारत के खिलाफ शिविर लगाकर गरीब व लाचार मुस्लिम किशोरों को आतंकवादी बनाने का प्रशिक्षण दे रहा है, वहीं ब्लूूचिस्तान की भूमि से खनिज व तेल का दोहन कर अपनी आर्थिक स्थिति बहाल किए हुए है। अकेले मुजफ्फराबाद में 62 आतंकी शिविर हैं। यहां के लोगों पर हमेशा पुलिसिया हथकंडे तारी रहते हैं। यहां महिलाओं को वोट देने का अधिकार नहीं है। गरीब महिलाओं को जबरन वैश्यावृत्ति के धंधों में धकेल दिया जाता है। 50 फीसदी नौजवानों के पास रोजगार नहीं हैं। 40 फीसदी आबादी गरीबी रेखा के नीचे है। 88 प्रतिशत क्षेत्र में पहुंच मार्ग नहीं हैं। बावजूद पाकिस्तान पिछले 70 साल से यहां के लोगों का बेरहमी से खून चूसने में लगा है। जो व्यक्ति अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाता है, उसे सेना, पुलिस या फिर आइएसआई उठा ले जाती है। पूरे पाक में शिया मस्जिदों पर हो रहे हमलों के कारण पीओके के लोग मानसिक रूप से आतंकित हैं। दूसरी तरफ पीओके के निकट खैबूर पख्तूनख्वा प्रांत और कबाइली इलाकों में पाक फौज और तालिबानियों के बीच अकसर संघर्ष जारी रहता है, इसका असर गुलाम कश्मीर को भोगना पड़ता है। नतीजतन यहां खेती-किसानी, उद्योग-धंधे, शिक्षा-रोजगार और स्वास्थ्य-सुविधाएं तथा पर्यटन सब चौपट हैें।

ब्लूूचिस्तान ने 74 साल पहले हुए पाक के कब्जे को कभी स्वीकार नहीं किया। लिहाजा वहां अलगाव की आग निरंतर बनी हुई है। नतीजतन 2001 में यहां 50 हजार लोगों की हत्या पाक सेना ने कर दी थी। इसके बाद 2006 में अत्याचार के विरुद्ध आवाज बुलंद करने वाले 20 हजार सामाजिक कार्यकर्ताओं को अगवा कर लिया गया था, जिनका आज तक पता नहीं है। 2015 में 157 लोगों के अंग-भंग किए गए। फिलहाल पुलिस ने जाने-माने एक्टिविस्ट बाबा जानी 2011 से हिरासत में लिया हुआ है। पिछले 16 साल से जारी दमन की इस सूची का खुलासा एक अमेरिकी संस्था 'वॉशिगटंन में कार्यरत संस्था गिलगिट-बाल्टिास्तान नेशनल कांग्रेसÓ ने किया है। यहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कोई मायने नहीं हैं। बाबा की रिहाई के लिए मानवाधिकार संगठन लंबे समय से मांग कर रहे हैं। उनकी रिहाई के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय याचिका पर नामी अमेरिकी दर्शनिक नोम चोम्स्की, ब्रिटेन के राजनेता तारिक अली सहित कई प्रतिष्ठित लोग हस्ताक्षर कर चुके हैं।

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