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भारतीय जनमानस एवं प्रकृति और छठ पूजा

प्रकृति और मनुष्य के अटूट संबंध है, दोनों एक दूसरे के पूरक हैं

भारतीय जनमानस एवं प्रकृति और छठ पूजा
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डॉ.नीना छिब्बर

प्रकृति और मनुष्य के अटूट संबंध है । दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। हम मनुष्यों के लिए धरती हमारे घर का आंगन है, आसमान छत, सूरज, चांद ,तारे रोशनी के स्त्रोत, सागर नदियां, जल के स्त्रोत और पेड़ पौधे हमें भोजन देते हैं अर्थात प्रकृति परिवार के मुखिया या गुरु की तरह हमें सही मार्गदर्शन देती है। प्रकृति की हर करवट, हर हरकत, कर ऋतु और हर आहट हमें कुछ सिखाती है। पतझड़ सिखाता है कि यह अंत नहीं पुनर्निर्माण का समय है। मौसम बदलते हैं और संदेश दे जाते हैं कि परिवर्तन ही जीवन है । भारतीय परंपराएं और संस्कृति सबसे पुरानी और वैज्ञानिक भी है। हमारे त्यौहार, पर्व उत्सव ,खान -पान, वस्त्र और पूजा विधियां भी शास्त्र सम्मत हैं। भारत में पंचतत्वों को महत्व दिया जाता है। हम ने आदिकाल से प्रकृति को जाना ,माना और समझा। पेड़, पहाड़, जल नभ ,अग्नि ,वायु को हम देवतुल्य मानते हैं। हमारे पर्व या त्यौहार कितने वैज्ञानिक और मानव हितकारी हैं यह जानना जरूरी है । छठ पूजा कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्टी को मनाया जाता है । यह मुख्यत: बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश, और नेपाल में मनाया जाता है। ये पर्व मुख्य रूप से ऋषियों द्वारा लिखित ऋग्वेद में सूर्य पूजन, ऊषा पूजन और अघ्र्य परंपरा के अनुसार मनाया जाता है। इस के साथ ऐतिहासिक कहानियां जुड़ी हैं। राजा प्रियंवद के कोई संतान नहीं थी। महर्षि कश्यप ने रानी मालिनी को यज्ञ की आहुति के लिए बनाई खीर दी। इससे उन्हें पुत्र हुआ लेकिन वो मर गया। राजा पुत्र वियोग में शमशान में प्राण त्यागने के लिए तत्पर थे तभी ब्रह्मा की मानस पुत्री देवसेना ने बताया कि वो सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हैं और षष्टी कहलाती हैं। अपनी पूजा करने को कहा। पूजा के बाद पुत्र प्राप्ति हुई।

दूसरी कथा यह है कि रावण वध के बाद सीता राम अयोध्या लौटे तो रावण वध के पाप से मुक्त होने के लिए राजसूय यज्ञ किया। ऋषि मुद्गल ने सीता पर गंगाजल छिड़क कर पवित्र किया और कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्टी को सूर्य पूजन के लिए कहा। जिसे सीता मां ने छ: दिन आश्रम में रहकर सूरज भगवान की पूजा कर पूर्ण किया। एक मान्यता यह भी है कि महाभारत काल में कर्ण ने इसकी शुरूआत की थी । कर्ण सूर्य के अनन्य भक्त थे। वो रोज कमर तक पानी में खड़े रहकर अघ्र्य देते थे । यही परंपरा छठ पूजा में अपनाई जाती है। लोक परंपरा में सूरज और छठ माई को भाई बहन माना जाता है ।

चार दिन तक चलने वाले पर्व के नियम कठिन हैं। इस में पवित्र स्नान, उपवास, पीने के पानी से दूरी, लंबे समय तक पानी में खड़े रहना सात्विक आचार विचार और व्योहार का भी महत्व है। परावातिन नामक मुख्य उपासक महिलाएं ही होती है परंतु पुरुष भी इसका पालन करते हैं।

पहले दिन को नहाय खाय, दूसरे को खरना, तीसरे को संध्या अघ्र्य और चौथे दिन को ऊषा अघ्र्य कहते हैं। यह तकरीबन 36 घंटे का व्रत है। तीसरे दिन सूप में नारियल, पांच प्रकार के फल, पूजा का सामान, द उरा में रखकर पुरुष छठ घाट पर जाते हैं। छठ पर्व के बारे में पर्यावरण विदों का दावा है कि पारिस्थितिकीय विज्ञान और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ा है। कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्टी तिथि एक विशेष खगोलीय अवसर है। उस समय सूर्य की पराबैंगनी किरणें पृथ्वी की सतह पर सामान्य से कई अधिक मात्रा में होती हैं। इसके संभावित कुप्रभावों को कम करने के लिए जल का अघ्र्य सामूहिक रूप से दिया जाता है। छठ पर्व से सूर्य (तारा ) प्रकाश ( पराबैंगनी )किरणों के हानिकारक प्रभाव से जीवों की रक्षा होती है।

प्रकृति, पर्व और मानव को एक रेखा में रखकर देखा जाए तो छठ पर्व धार्मिक महत्व तो रखता है पर उस के साथ पर्यावरण संरक्षण, सात्विक जीवनयापन और संयम को भी रेखांकित करता है। कार्तिक माह में ठड़ होती है आलस्य त्याग कर स्नान ,पूजा अर्चना करना मानसिक बल को बढ़ाता है। हम जीवन में जो संयम , नियम और देने की प्रवृत्ति सीखते हैं वो इन पर्वों से ही सीखते हैं। प्रकृति का कोई भी तत्व अपनी वस्तु स्वयं उपयोग नहीं करता है। परोपकार में ही जीवन बिता देता है । छठ पर्व भी यही संदेश देता है।

(लेखक: सेवानिवृत्त अंग्रेजी व्याखाता)

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