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सृष्टि का प्रत्येक प्राणी गाय से उपकृत है

भारतीय पञ्चांग के अनुसार आज गोपाष्टमी है

सृष्टि का प्रत्येक प्राणी गाय से उपकृत है
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स्वामी अखिलेश्वरानंद गिरि

भारतीय सनातनी परम्परा में गोपालन एवं गोसेवा को परम पवित्र कार्य माना गया है। हम सनातन धर्मावलम्बियों के पूर्वज सदा से गोसेवाब्रती रहे हैं, गोपालन उनकी सहज अभिरुचि रही है। जब से यह सृष्टि से तभी से गोवंश (गायों) का संबंध जंगल से एवं जंगल का संबंध गायों से रहा है। वन और गायों के मध्य एक प्राकृतिक समीकरण रहा है वह यह कि-

गायों का भोजन जंगल में और जंगल का आहार गायों के पास आज भी उक्त समीकरण यथावत बना हुआ है गोवंश (गाय) पुरातन काल में जितनी महत्वपूर्ण और प्रासंगिक रही है, उसकी प्रासंगिकता आज भी उतनी ही महनीय है। हम गायों को अपने घरों में तो केवल सेवा के लिये ही रखते है क्योंकि वह हमारे घर और आँगन की शोभा है, गाय हमारे परिवार की सदस्य है। गाय, तुलसी का पौधा, शालिग्राम की लघुकाय (नन्ही ) बटईया, घर में पूजा के स्थान पर गंगा जल से परिपूर्ण कलश एवं घर के एक कोण पर काष्ठ निर्मित दीप स्तम्भ यह एक सनातन धर्मावलम्बी हिन्दू घर की सहज पहचान होती थी। घर में प्रतिदिन की रसोई से प्रथम रोटी गायकी 'गोग्रास के बतौर तथा आखिरी रोटी श्वान (कुत्ते) के लियेÓ निकलती थी।

पौराणिक कथाओं के अनुसार द्वापरयुग में उसयुग के महानायक लीलापुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण नन्हें बालक थे तब वे अपने बालसखाओं के साथ गोचारण हेतु (गायों को चराने के लिये) प्रथम बार जंगल चराने लेकर गये थे ,वह दिन कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की अष्टी तिथि थी जिसे*गोपाष्टमी* कहा जाता है।

*द्वापर युग की यह तिथि भारतीय इतिहास में सदा सदा के लिये 'गोसेवा के पावन संकल्प और गो-पूजन हेतु अमर हो गई क्योंकि जगत् का पालनहार (विष्णु का अंशावतार ,अपनी षोडस कलाओं से परिपूर्ण भगवान् श्रीकृष्ण ने) अपनी सहज बाल क्रीड़ा के माध्यम से, जनसामान्य को गोपालन की पारम्परिक महनीय विधा की प्रेरणा देने एवं गोवंश के महत्त्व को अमरत्व प्रदान करने, गायों से प्रेम की वृत्ति को स्थायित्व देने एवं धरती पर समृद्धि की देवी गाय (गोवंश) को चारा चराने स्वयं जंगल गये। गाय (सम्पूर्ण गोवंश) विश्व की आर्थिक समृद्धि एवं कृषिक उन्नति का मुख्य आधार है, इस महत्व को कभी भी किसी युग में भुलाया नहीं जा सकता। गाय के चतुर्दिक अनेक सामाजिक, धार्मिक, साँस्कृतिक, आध्यात्मिक, प्राकृतिक, आर्थिक, पर्यावरणीय तथा आयुर्वेदिक एवं वैज्ञानिक जैसी विधायें परिक्रमा लगाती रहती हैं। इन्हीं महनीय और प्रत्येक युग में सदा प्रासंगिक तथ्यों को युगानुकूल बनाये रखने के लिये श्रीकृष्ण के मुख से यह उद्गार अभिव्यक्त हुये--

*गावो मेअग्रत: सन्तु गावो मे सन्तु पृष्ठत:।*

*गावो मे परित: सन्तु (गावो मे सर्वत: सन्तु) गवां मध्ये वसाम्यहम्।।*

*सृष्टि का ऐसा कौन सा क्षेत्र है,जिसके विकास में गोवंश का योगदान नहीं है? तभी तो हमारे शास्त्रकारों द्वारा 'गावो विश्वस्य मातर:' यह सूत्र निर्माण किया है। सृष्टि का प्रत्येक प्राणी गाय के उपकार से उपकृत है अत: सृष्टि यह उपकारक विधा सदैव रक्षणीया है।*

स्वतंत्र भारत में आज ही के दिन सन् 1966 में (उस दिन अँग्रेजी तारीख 7 नवम्बर थी) तथा भारतीय पञ्चाङ्ग के अनुसार 'गोपाष्टमी' की तिथि थी। भारत के तत्कालीन सन्त, महात्माओं श्रेष्ठ धर्माचार्यों के नेतृत्व में भारतवर्ष में 'गोवध पर पूर्ण प्रतिबंध लगवाने कठोर कानून की माँग को लेकर लाखों गोभक्त भारतीय नागरिक दिल्ली में संसद भवन के सामने धरना-प्रदर्शन हेतु एकत्रित हो तत्कालीन प्रधानमंत्री से मिलने उन्हें अपनी माँग से सम्बंधित ज्ञापन सौंपने संसद् भवन की ओर जा रहे थे परन्तु सन्तों-धर्माचार्यों, गोभक्तों पर पुलिस बल के द्वारा अश्रुगैस के गोले फेंके गये पुलिस बल ने फायरिंग की और लाठियों से प्रहार किया-अनेक गोभक्त घायल हुये, अनेक गोभक्त 'वन्दे धेनु मातरम' कहते गोलोकवासी हो गये।

कहाँ वह द्वापरयुग का पवित्र गोपाष्टमी का वह दिन जिसने भारतीय गोवंश के प्रति श्रद्धा,आस्था और विश्वास को अभिव्यक्त करते हुये उसका एवं गोपालकों के महत्व को स्थापित किया और स्वतंत्र भारत में यह गोपाष्टमी का पावन दिवस कलंकित हो,एक रक्तरंजित श्यामवर्णी इतिहास लिख गया! गोभक्त क्षुभित मन से आज भी भारतवर्ष की वर्तमान पीढ़ी अपनी गोवंश की रक्षा हेतु प्रतिबद्ध हो, अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करती है।

हम अपने स्वर्णिम इतिहास को स्मरण रखें और स्वर्णिम भारत के स्वप्न को साकार करें 'इस हेतु आज गोपाष्टमी के दिन पूज्य सन्तों-धर्माचार्यों-गोभक्तों को स्मरण करते हैं एवं गो सेवा व्रत का संकल्प लेते हैं।'

'वन्दे भारत मातरम्' --'वन्दे धेनु मातरम्'

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