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ईदगाह का 'हामिद' और राष्ट्रवाद में खोट ढूंढ़ते हामिद

व्यापक विचारधारा के रूप में प्रतिशोध को प्रेरित करता है

ईदगाह का हामिद और राष्ट्रवाद में खोट ढूंढ़ते हामिद
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डॉ. शिव कुमार राय

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर की नई पुस्तक 'द बैटल ऑफ बिलॉन्गिंग' के डिजिटल विमोचन के अवसर पर देश के उपराष्ट्रपति रह चुके हामिद अंसारी 'राष्ट्रवाद' को कोरोना से बड़ी बीमारी बता रहे हैं, भारतीय विदेश सेवा से सेवानिवृत्त हामिद अंसारी का कहना है कि कोरोना से पहले ही देश 'धार्मिक कट्टरता' और 'आक्रामक राष्ट्रवाद' की महामारी का शिकार है। ऑस्ट्रेलिया, अफगानिस्तान, ईरान और सऊदी अरबिया में बतौर राजदूत भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हामिद अंसारी का कहना है कि आज देश ऐसे 'प्रकट और अप्रकट' विचारों और विचारधाराओं से खतरे में दिख रहा है जो उसको 'हम और वोÓ की काल्पनिक श्रेणी के आधार पर बांटने की कोशिश करती हैं। हामिद अंसारी ने यह भी कहा कि दुनियाभर के रिकॉर्ड उठाकर देखें तो पता चलता है कि यह कई बार नफरत का रूप लेता है और इसका इस्तेमाल एक टॉनिक के रूप में किया जाता है। यह व्यापक विचारधारा के रूप में प्रतिशोध को प्रेरित करता है। हामिद अंसारी का कहना है कि इसका कुछ अंश हमारे देश में भी देखा जा सकता है। देश के संवैधानिक और अन्य प्रमुख पदों पर विराजमान रह चुके हामिद अंसारी से आज देश का एक आम भारतीय पूछता है कि देश को जोडऩे और राष्ट्रभक्ति की भावना को बढ़ाने के लिए उन्होंने क्या कदम उठाए ? देश की जनता यह जानना चाहती है कि हामिद अंसारी जैसे लोग देश और समाज में नफरत का बीज क्यों बोते रहते हैं? और यह बात ऐसे लोगों की कार्यशैली और उनके बयानों से साफ जाहिर होती रही है। देश की सबसे बड़ी अदालत ने 2017 में जब हर फिल्म से पहले 'राष्ट्रगान' अनिवार्य किया था और मद्रास हाईकोर्ट ने 'वंदे मातरम्' को लेकर फैसला सुनाया था उस वक्त हामिद अंसारी ने कहा था कि 'अदालतें समाज का हिस्सा हैं, तो अदालतें जो कहती हैं वह कई बार समाज के माहौल का प्रतिबिंब होता है, मैं इसे असुरक्षा की भावना कहूंगा.. दिन रात अपना राष्ट्रवाद दिखाने की बात फिज़ूल है। मैं एक भारतीय हूं और इतना काफी है। 'महाशय हामिद अंसारी जैसे लोगों को यह समझना होगा कि दिन रात राष्ट्रवाद दिखाने की बात फिजूल नहीं है और राष्ट्रभक्ति किसी भी मजहब या धर्म से बड़ी है। राष्ट्रवाद या राष्ट्रभक्ति ही वह मार्ग है जिस पर चलकर हम एक सशक्त राष्ट्र की बुनियाद रख सकते हैं। आजादी के पहले जिस वंदेमातरम् की गूंज से लोग देश के लिए हंसते हंसते अपने प्राणों की आहूति दे देते थे, उसी वंदेमातरम् पर आज हामिद अंसारी जैसे मु_ी भर लोग एतराज करते हैं। मुस्लिम समुदाय के नाम पर अल्पसंख्यक वोटों की राजनीति करने वालों को यह समझना होगा कि देश में ऐसे मुस्लिमों की तादाद कहीं ज्यादा है जिन्हें राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत से कोई एतराज नहीं है। मुस्लिम समुदाय के कुछ तथाकथित ठेकेदारों ने इनकी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पर ध्यान देने की बजाय इन्हें राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत जैसे मुद्दों में उलझाए रखा। अंग्रेजों से आजादी की लड़ाई कोई हिन्दू और मुस्लिम नहीं लड़ रहा था, यह लड़ाई हर एक भारतीय लड़ रहा था और इसमें हर मजहब के लोग शामिल थे लेकिन भारतीयों में फूट डालने के लिए अंग्रेजों ने जो अलगाववाद के बीज बोए थे, उसमें कुछ राजनीतिक दल आजादी के बाद भी खाद और पानी देते रहे। अगर ऐसा नहीं होता तो हामिद अंसारी जैसे लोग कभी राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत पर एतराज नहीं करते। उपराष्ट्रपति पद पर अपने कार्यकाल के अंतिम दिन हामिद अंसारी ने बयान दिया था कि देश के मुस्लिम समुदाय में घबराहट और असुरक्षा का माहौल है। देश में हामिद अंसारी जैसे कई लोग हैं जो वातानुकूलित कमरे में बैठकर तथाकथित तौर पर महान शिक्षाविद, महान विचारक, महान चिंतक या महान राजनयिक कुछ भी हो सकते हैं लेकिन उन्हें जमीनी हकीकत का अहसास नहीं होता। उस वक्त हामिद अंसारी जिस मुस्लिम समुदाय में असुरक्षा और घबराहट का थर्मामीटर लेकर बैठे थे, उनसे पूछा जाना चाहिए कि कई बरसों तक देश के बड़े से बड़े पद पर विराजमान रहने के बाद उन्होंने मुस्लिम समाज की बेहतरी के लिए क्या कदम उठाए? समाज के कमजोर तबके के उत्थान के लिए उन्होंने क्या पहल की ? हामिद अंसारी के बयान के वक्त भी सोशल मीडिया के माध्यम से हमने उनसे अपील की थी, अब आप पूरी तरह से पद की जिम्मेदारियों से मुक्त हो चुके हैं,वातानुकूलित कमरों से बाहर निकलकर देश का भ्रमण कीजिए, देश के हर मजहब और समुदाय के लोगों से मिलिए, आपको भारत बदला हुआ दिखाई देगा। आपको देश में कोई भी अल्पसंख्यक असुरक्षित और भयभीत दिखाई नहीं देगा। हामिद अंसारी जी, देश में एक बड़ा राजनीतिक बदलाव हुआ है, अब वोट बैंक को साधने के लिए देश के कोई प्रधानमंत्री यह नहीं कहते कि देश के संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों का है। अब देश में एक मजबूत राजनीतिक नेतृत्व हैं और इसकी अगुवाई करने वाले देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 'सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास' की बात करते हैं और सिर्फ बात ही नहीं करते इसका असर जमीन पर दिखाई भी दे रहा है। यही वजह है कि अल्पसंख्यक और अलगाववाद का बीज बोकर अपनी राजनीतिक फसल काटने वाले दलों की राजनीतिक जमीन अब बंजर हो चुकी है। गरीब की रसोई में गैस पहुंचाने की बात हो या गांवों में शौचालय, गरीब के सिर पर पक्की छत की बात हो या उसके घर में पहुंचने वाले बिजली के तार,गरीब के खाते में सीधे पैसे पहुंच रहे हैं, ऐसी एक दो नहीं कई योजनाएं हंै जिनका सकारात्मक असर दिखाई दे रहा है और हां, इसमें सरकार अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक में भेद नहीं कर रही है। आखिरी में, हामिद अंसारी जी को फिर यह कहना चाहूंगा कि मुझ जैसे कई भारतीयों का हामिद नाम से सबसे पहला परिचय देश के प्रख्यात साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद की रचना 'ईदगाह' के माध्यम से हुआ था, जिसके माता पिता बचपन में ही गुजर गए थे और नन्हा हामिद अपनी बूढ़ी दादी अमीना के पास रहता था। ईद के दिन हामिद के सभी साथी जब मौज मस्ती कर रहे थे, उस वक्त मासूम हामिद की जेब में सिर्फ तीन पैसे थे। उसने इन तीन पैसों से अपनी दादी के लिए चिमटा खरीदा था क्योंकि उसकी दादी का हाथ रोज चूल्हें से जल जाता था। प्रेमचंद की कहानी ईदगाह के माध्यम से नन्हा और मासूम हामिद हर भारतीय का नायक बन गया जिसने हम सभी को संवेदनशीलता का एक पाठ सिखाया। हामिद अंसारी जी, कोई भी नायक न हिन्दू होता है और ना मुसलमान, ना सिख होता है और ना ईसाई, नायक तो बस नायक होता है जो लोगों के दिलों में बसता है। यह देश का दुर्भाग्य है कि सामाजिक और राजनीतिक जीवन का इतना अनुभव होने के बावजूद भी आप भारतीय संस्कृति को नहीं समझ सके, आपको राष्ट्रवाद और राष्ट्रभक्ति समझ नहीं आई, आप वह हामिद नहीं बन सके जो हम सभी का नायक है।

( लेखक- वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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