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जम्मू-कश्मीर: गुपकार नहीं, गुपचुप हड़पने की साज़िश

अब गुपकार से जुड़े यह दल एक बार फिर अनुच्छेद 370 को लागू करने की वकालत करते नज़र आ रहे हैं।

जम्मू-कश्मीर:  गुपकार नहीं, गुपचुप हड़पने की साज़िश
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डॉ शिव कुमार राय

कश्मीर को अपनी जागीर समझने वाले मुट्ठी भर राजनेता अब जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के बाद बौखला उठे हैं। अब गुपकार से जुड़े यह दल एक बार फिर अनुच्छेद 370 को लागू करने की वकालत करते नज़र आ रहे हैं। वैसे फ़ारूक़ अब्दुल्ला इस गठबंधन का नाम 'पीपल्स एलायंस फॉर गुपकार डिक्लेयरेशन' बता रहे हैं। उनका कहना है कि यह हमारी संवैधानिक लड़ाई है, लेकिन यह लड़ाई न तो संवैधानिक है और न ही गुपकार से जुड़े लोग जम्मू-कश्मीर की पहचान या उसकी स्वायत्तता को लेकर चिंतित हैं। दरअसल, 4 अगस्त 2019 को फारूक अब्दुल्ला के गुपकार स्थित आवास पर नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी और कांग्रेस समेत कुल छह दलों की एक सर्वदलीय बैठक हुई थी जिसमें जम्मू-कश्मीर की पहचान, स्वायत्तता और उसके विशेष दर्जे को बनाए रखने के लिए एक प्रस्ताव पास हुआ और उसे ही गुपकार समझौता कहा गया। इन लोगों का कहना था कि राज्य का बँटवारा कश्मीर और लद्दाख के लोगों के ख़िलाफ़ अन्याय है। इन लोगों ने 370 समाप्त करने के फैसले को भी असंवैधानिक बताया था। गुपकार समझौते के अगले ही दिन जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटा दिया गया था। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर से लद्दाख को अलग कर उसे केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दे दिया गया और जम्मू-कश्मीर भी केंद्र शासित प्रदेश बन गया। दरअसल इनकी चिंता कश्मीर की पहचान को लेकर नहीं अपनी अवैध तरीकों से खड़ी की हुई जागीर को लेकर ज़्यादा है। इस बात की पुष्टि अब जम्मू-कश्मीर के रोशनी एक्ट भूमि घोटाले के सामने आने के बाद हो रही है। यह जानना ज़रूरी है कि रोशनी एक्ट को लागू करने वाले कोई ओर नहीं स्वयं फ़ारूक अब्दुल्ला ही थे। यह बात 2001 की है, उस वक्त फ़ारूक राज्य में मुख्यमंत्री थे। इस एक्ट के तहत जो गरीब किसान सरकारी भूमि पर कई सालों से खेती बाड़ी कर रहे थे, वह उस जमीन को अपने नाम कर पाएँगे लेकिन रोशनी एक्ट भूमि घोटाले में अब जो तस्वीर सामने आ रही है, वह एकदम इसके उलट है। इसमें किसानों को फ़ायदा भले ही नहीं मिला हो लेकिन फ़ारूक अब्दुल्ला जैसे नेताओं ने इसका लाभ ज़रूर उठाया। सीबीआई जाँच में जो बात सामने आ रही है, उसके मुताबिक नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी और कांग्रेस के नेताओं ने इस एक्ट के नाम पर करोड़ों रूपये की संपत्ति हथिया रखी है। इस पूरे मामले में फ़ारूक के अन्य रिश्तेदारों के नाम भी सामने आ रहे हैं। इतना ही नहीं, इस एक्ट के नियमों के मुताबिक जमीन को अपने नाम करने के लिए जो राशि सरकारी खजाने में जमा होनी थी, उसकी भी जानबूझकर अनदेखी की गई। दरअसल, हाईकोर्ट के आदेश के बाद राजस्व विभाग रोशनी एक्ट के लाभार्थियों और इस एक्ट की आड़ में जमीन हड़पने वालों के नाम सार्वजनिक कर रहा है। सीबीआई अब इस पूरे मामले की जाँच कर रही है, जिसमें जल्द ही सारी बातें उजागर होंगी। कश्मीरी पंडितों को अपनी ही ज़मीन से बेदखल किए जाने पर भले ही कोई गुपकार गैंग सामने नहीं आया लेकिन अब जब जम्मू-कश्मीर विकास की मुख्य धारा में आगे बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है तो चंद लोग राज्य की पहचान को लेकर राजनीतिक ढोंग रचते दिखाई दे रहे हैं। रोशनी एक्ट भूमि घोटाले के सामने आने के बाद यह बात साबित हो गई है कि गुपकार से जुड़े फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला जैसे लोग कश्मीर को लेकर नहीं बल्कि गुपचुप तरीके से हड़पी गई अपनी जागीर को बचाने को लेकर चिंतित हैं।

( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)


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