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सामाजिक समरसता के मसीहा राष्ट्रभक्त बाबा साहब अम्बेडकर

सामाजिक समरसता के मसीहा राष्ट्रभक्त बाबा साहब अम्बेडकर
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लाल सिंह आर्य

एक अद्वितीय प्रतिभा सम्पन्न डॉ. भीमराव अम्बेडकर भारतीय समाज में गरीब, शोषित एवं पीडि़तोंको ऊपर उठाने वाले सच्चे एवं संवेदनशील मसीहा थे। भारत में कुछ वर्षों से व्याप्त जाति व्यवस्था के खिलाफ समाज को जागरूक करने वाले बाबा साहेब अम्बेडकर का कहना था कि 'छीने हुए अधिकार भीख में नहीं मिलते, अधिकार वसूल करना होता है।' आज नए भारत का जो स्वरूप हम देखते हैं, उसकी नींव में बाबा साहेब अम्बेडकर की सोच एवं परिश्रम है। देश के प्रथम कानून मंत्री रहे बाबा साहेब को संविधान निर्माता होने का भी श्रेय है। सामाजिक समरसता के मसीहा डॉ. भीमराव अम्बेडकर को भारत का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार 'भारत रत्न' से भी सम्मानित किया गया है। इस सम्मान के वे बड़े हकदार थे, जो उन्हें बहुत पहले ही मिल जाना था। डॉ. अम्बेडकर की जीवन यात्रा प्रत्येक जनमानस में पथ-प्रदर्शक के रूप में कार्य करता रहेगा। इनमहामना का जन्म मध्यप्रदेश की धरा महू इंदौर में हुआ था जो मध्यप्रदेश को गौरवांवित करता है।

बाबा साहेब एक सच्चे राष्ट्रभक्त थे। अपने जीवन में अनेक प्रकार के संकटों को सहा लेकिन वे नहीं चाहते थे किउनकेबाद की पीढ़ी भी सामाजिक भेदभाव का शिकार हो। उन्होंने मंदिर प्रवेश पर रोक के खिलाफ, पीने के पानी पर रोक के खिलाफ, सामाजिक बुराईयों के खिलाफ आंदोलन खड़े किए लेकिन सभी आंदोलन शांतिपूर्वक और अहिंसात्मक थे। बाबा साहब का मानना था कि सभी भारतीय भाई-बहनउनके ही भाई-बहनहै लेकिन सामाजिक विषमता के खिलाफ जागृति उत्पन्न करने के लिए किए गए आंदोलन हमेशा शांतिपूर्वक रहे। वे शोषण से मुक्ति दिलाने के लिए प्रयासरत रहे। उनका उद्देश्य लोगों से बदला लेना नहीं बल्कि उनके भीतर जागृति उत्पन्न करना था। उनके पवित्र उद्देश्यों के कारण ही स्वतंत्र भारत में प्रथम कानून मंत्री बनाया गया और संविधान निर्माण की गुरुत्तर जिम्मेदारी सौंपी गई। संविधान निर्माता के रूप में सर्वधर्म-समभाव का परिचय बाबा साहेब ने दिया और इस बात की संविधान में व्यवस्था की कि किसी भी भारतीय नागरिक के मौलिक अधिकार का हनन ना हो। बाबा साहब ने कहा था कि मैं सबसे पहले और अंत में भारतीय हूँ, यह हम सब के लिये प्रेरणास्पद है। मध्यप्रदेश के इंदौर जिले के महू तहसील में पिता रामजी मालोजी सकपाल और माता भीमाबाई के घर नन्हें भीमराव का जन्म हुआ। महार जाति का होने के कारण उन्हें 'अछूत' समझा जाता था। उनके पिता और दादा ने ब्रिटिश सेना में होने के कारण तत्कालीन सरकार द्वारा सभी सैन्य-कर्मियों के बच्चों की शिक्षा हेतु अच्छे स्कूलों का प्रबंध किया गया था इसलिए उन्हें भी अच्छी शिक्षा प्राप्त हुई। बचपन से प्रतिभा सम्पन्न अम्बेडकर के मन में सामाजिक रूढिय़ों के खिलाफ बदलाव की आग जल रही थी। वे शिक्षा को सामाजिक बदलाव का सबसे बड़ा हथियार मानते थे। बचपन में उन्हें छुआछूत का सामना करना पड़ा था इसलिए वे चाहते थे कि किसी और बच्चे को इस तरह की मानसिक यातना के दौर से ना गुजरना पड़े। प्रतिभासम्पन्न डॉ. अम्बेडकर और दूसरे बच्चों को स्कूल में अलग बिठाया जाता था। उनको क्लास रूम के अंदर बैठने की इजाजत नहीं थी। उन्होंने अपना पूरा जीवन भारतीय समाज की जातीय व्यवस्था और हिंदू धर्म की कुरूतियों के खिलाफ संघर्ष करते हुए बितादिया। इतना ही नहीं उनका जीवन खासतौर पर दलितों और पिछड़ों को उनके अधिकार दिलाने के लिए संघर्षशील रहा। उनका कहना था कि जीवन में शिक्षा ही सबकुछ है। अगर शिक्षा पा सके तो जीवन में कुछ भी हासिल करना मुश्किल नहीं होगा। उन्होंने समाज में हर वर्ग के लिए समानता, शिक्षा, अधिकार, न्याय, स्वतंत्रता, बन्धुत्व और सम्मान देने की बात कही और उसके लिए सदैव काम किया। उन्होंने पिछड़ों, महिलाओं और मजदूर वर्ग के अधिकारों के लिये सदैव समर्थन किया। अपने पिता की चौंदहवीं संतान भीमराव ही पढऩे में आगे निकले। स्कूल में उनके साथ जातिगत भेदभाव होता था लेकिन उनकी प्रतिभा से प्रभावित सातारा गांव के ब्राम्हण शिक्षक की सलाह पर अपनी जाति सकपाल से हटाकर अंबेडकर कर लिया। इस तरह भीमराव अंबेडकर हो गए। अंबेडकर उनके गांव 'अंबावडे' पर आधारित था। 1913 में उनके जीवन में एक बड़ा मोड़ आता है जब उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर बड़ौदा के महाराज सयाजी गायकवाड़ छात्रवृत्ति देकर उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेजते हैं। अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय से उन्होंने राजनीतिक विज्ञान, समाज शास्त्र, मानव विज्ञान, दर्शन और अर्थ नीति का अध्ययन कर अपनी प्रतिभा से दुनिया को चमत्कृत किया। अमेरिका में उन्होंने 'भारतीय जाति विभाजन' पर जो शोध पत्र पढ़ा था, आज भी वह मील का पत्थर माना जाता है। सन् 1937 में डॉ अंबेडकर ने कोंकण क्षेत्र में महारों के सरकारी गुलाम के रूप में काम करने की 'खेती प्रथा' को समाप्त करने के लिए एक विधेयक पेश किया था

बाबा साहेब अम्बेडकर आज हमारे बीच भौतिक रूप से जरूर उपस्थित नहीं हैं लेकिन भारतीय समाज के लिए उन्होंने जो कार्य किए हैं, वह हमेशा मार्गदर्शक के रूप में बने रहेंगे। बाबा साहब एक व्यक्ति नहीं बल्कि स्वयं में एक संस्था थे। एक ऐसी संस्था जिन्होंने अपना समूचा जीवन सामाजिक समरसता के लिए समर्पित कर दिया। भारत रत्न डॉ. अम्बेडकर उन चुनिंदा लोगों में हैं जिन्हें पूरी दुनिया सम्मान देती है और उन्हें युग पुरुष के रूप में स्मरण करती है। (लेखक भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष है)

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