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अन्नदाता का नाम, साजिशें तमाम

किसान के नाम पर देश विरोधी ताकतों का कुचक्र

अन्नदाता का नाम, साजिशें तमाम
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संसद में पारित कराए जाने के बाद कानून की शक्ल अख्तियार कर चुके 3 कृषि कानूनों के विरोध में दिल्ली से लेकर कनाडा और लंदन तक कोहराम मचा है। दिल्ली की सीमाओं विशेषकर हरियाणा से सटे सिंघू, टीकरी और यूपी के गाजीपुर बार्डर जमे बैठे किसान लगातार इन कानूनों को रद्द कराने की मांग से कम किसी बात पर तैयार नहीं हैं। कृषि कानूनों के विरोध में तमाम राजनीतिक दल और कुछ अनाम से किसान संगठन लामबंद हो चुके हैं। मगर इस पूरे खेल की सच्चाई वो नहीं, जो अभी नजर आ रही है।

सच्चाई ये है कि कृषि क्षेत्र में जिन सुधारों के लिए कांग्रेस की अगुवाई वाला मौजूदा विपक्ष कभी प्रयास करता रहा, आज मौजूदा सरकार ने जब उन्हीं सुधारों को कानूनी जामा पहनाया तो राजनीतिक या कुछ और कारणों से वही विपक्ष समूचे भारत बंद को तैयार बैठा है। कभी इन्हीं सुधारों की पैरवी करने वाले आज अचानक इनके घोर विरोधी क्यों बन गए। जब कांग्रेस की केंद्र और राज्य सरकारें सुधारों का सार्वजनिक रूप से एलान करती थीं, तब एक भी किसान नहीं बोलता था। आज वही सुधार मोदी सरकार ने किए तो अचानक ऐसी-ऐसी किसान यूनियनें और नेता खड़े हो गए, जिनके बारे में आज से पहले कभी मीडिया में कहीं चर्चा तक नहीं हुई। आखिर क्यों?

एक बानगी- 27 दिसम्बर, 2013 को तत्कालीन कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कांग्रेस के 12 मुख्यमंत्रियों की मीटिंग के बाद प्रेस कॉन्फ्रें स में कहा था कि कांग्रेस के शासन वाले सभी राज्यों को एपीएमसी एक्ट के नियमों में 15 जनवरी तक संशोधित लाना होगा, जिससे फलों और सब्जियों को एपीएमसी एक्ट की सूची से हटाया जा सके, ताकि इनकी कीमतों पर नियंत्रण पाया जा सके। उस वक्त समूची कांग्रेस और राहुल गांधी का मानना था कि निजी कंपनियों के आने से किसानों को अपने उत्पाद फ्री मार्केट में बेचने का मौका मिलेगा। और बिचौलिए हटने से कालाबाजारी और कीमतों पर भी अंकुश लगाया जा सकेगा। कांग्रेस का मानना था कि उस वक्त दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार का सबसे बड़ा कारण फलों सब्जियों की महंगाई ही थी।

कांग्रेस का 2019 के लोकसभा चुनावों का मेनीफेस्टों देखिए, पेज 17 पर 11वें प्वॉइंट में साफ लिखा है कि "Congress will repeal the Agriculture produce market Committees Act and make the trade in agriculture produce-including e&ports and Inter-state trade-free from all restrictions" तो आज अचानक क्या हो गया। कांग्रेस के इसी मैनिफेस्टों के पेज नं 18 पर प्वाइंट नंबर 21 में आवश्यकता वस्तु अधिनियम 1955 के बारे में कांग्रेस ने 414 ftat Po It belongs to the age of controls' Bit to eat foto "Congres promises to replace the act by an enabling law that can be invoked only in the case of emergenciesÐ" यानी मैनिफेस्टों के मुताबिक अगर कांग्रेस की अगुवाई में सरकार बनती तो वो यही कृषि सुधारों की दिशा में तो काम करते या फिर ये केवल किसानों को भरमाने के लिए लिखा था, अपने ही पुराने रुख को छोड़कर आज यू-टर्न लेने की क्या जरूरत कांग्रेस और विपक्ष को आ पड़ी।

यूपीए सरकार ने अपने शासनकाल में कन्ज्यूमर्स अफेयर्स के मामले में 2011 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में एक वर्किंग ग्रुप बनाया था। उस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट जो पीएम मनमोहन सिंह को सौंपी थी उसमें 20 अनुशंषाएं और 64 ऐसे विषय जिन पर एक्शन लिया जा सकता है, शामिल थे। उस कमेटी की रिपोर्ट साफ बताती है कि इन सुधारों की नींव काफी पहले ही रखी जा चुकी थी, आवश्यक वस्तुओं में फ्यूटर ट्रेडिंग पर पाबंदी से लेकर एपीएमसी एक्ट में तेज सुधारों तक, एग्री मार्केटिंग इन्फ्रास्ट्रक्टर खड़ा करने से लेकर संगठित क्षेत्र और कॉपरेटिव सेक्टर के बीच प्रतियोगिता बढ़ाने के उपायों तक, वो सारी जानकारी आज भी रिकार्ड पर है।

2013 में एग्रीकल्चर मार्केटिंग में सुधारों के लिए यूपीए सरकार ने राज्य के मंत्रियों की एक कमेटी गठित की थी, इस कमेटी ने भी अपनी रिपोर्ट में भी एपीएमसी एक्ट में संशोधन और वर्तमान में चल रहे बिचौलिया सिस्टम को आधुनिक रजिस्ट्रेशन सिस्टम से बदलने की सिफारिश की गई थी। बड़ी बात निजी होलसेल मार्केट और निजी इन्वेस्टमेंट की भी सिफारिश की गई थी।

बात एनसीपी नेता शरद पवार की, पवार की एक चि_ी मीडिया और सोशल मीडिया में घूम रहा है। 2010 में बतौर कृषि मंत्री वह दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को पत्र में लिख रहे हैं कि किस तरह कृषि के क्षेत्र में विकास और रोजगार बढ़ाने के लिए निजी क्षेत्र की जरुरत है और इसके लिए एक नियामक नीति की भी जरुरत है, इसके लिए वो स्टेट एपीएमसी एक्ट में बदलाव की जरुरत की बात लिख रहे हैं। वास्तव में ऐसे पत्र शरद पवार उस वक्त सभी मुख्यमंत्रियों को लिखे थे।

मई 2012 में राज्यसभा में कृषि विपणन सुधारों पर एक प्रश्न के उत्तर में बतौर कृषि मंत्री शरद पवार कहते हैं कि कुछ सुधारों को स्वीकार किया गया है, जैसे उदार खरीदी के बारे में सिफारिशें। इसी उत्तर में पवार कहते हैं कि सभी राज्य सरकारों को एपीएमसी एक्ट में संशोधन के लिए कहा गया है।

महाराष्ट्र की कांग्रेस सरकार के को-ऑपरेशन और पार्लियामेंट्री अफेयर्स मंत्री हर्षवर्धन पाटिल की अगुवाई में बनी कमेटी ने भी कहा था कि एपीएमसी और ईसीए में संशोधन की जरुरत है ताकि राज्य में बाधा मुक्त स्टोरेज और खेती उत्पादों को राज्यों में कहीं भी लाने ले जाना सुनिश्चित किया जा सके। इस कमेटी ने ये भी कहा कि देश को एक नेशनल एग्रीकल्चर मार्केट की भी जरूरत है ताकि किसानों को अपनी फसल का उचित मूल्य मिल सके। योजना आयोग की 12वीं पंचवर्षीय योजना (2012-17) की रिपोर्ट में भी एपीएमसी एक्ट में संशोधन की बात की गई थी, इस रिपोर्ट के पेज 2324 पर इस एक्ट की खामियां और सुधारों की सलाह के बारे में लिखा गया है।

दिल्ली की सीमा पर जुटे किसानों का प्रदर्शन पंजाब से शुरु हुआ, नाम भले ही किसानों की यूनियनों का हो, लेकिन सच ये भी है कि पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह भी लगातार इसे पर्दे के पीछे से समर्थन देते आए। केंद्रीय गृह मंत्री से मिलना और पंजाब की अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति चिंता जताने का क्या मायने है, ये भी प्रश्न है, मगर इससे बड़ा सवाल ये कि मुख्यमंत्री की पार्टी कांग्रेस के बड़े नेता राहुल गांधी किसान प्रदर्शन के शुरु होते ही लगभग रोजाना ट्वीट के जरिए इस आंदोलन को हवा देने में लगे हैं। जबकि ये वही पंजाब है, और ये वही राहुल गांधी हैं, जो कभी इन्हीं कृषि काननों की तर्ज पर किसानों को मंडियों के दुष्चक्र से बाहर निकालकर मुक्त व्यापार और निजी कंपनियों द्वारा सीधी कृषि उपज की खरीद के पक्ष में थे।

मई 2018 में लुधियाना में सीआईआई और पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के साथ मिलकर एक बड़ा कार्यक्रम किया गया, जिसमें खाद्य प्रसंस्करण उद्योग की बड़ी कंपनियों पेप्सीको और आईटीसी जैसों ने पंजाब में बड़े निवेश का एलान किया। पेप्सीको के अधिकारी रिंकेश सतीजा ने राज्य की औद्योगिक नीति की तारीफ करते कई और यूनिट खोलने का एलान किया तो आईटीसी ने डेयरी सेक्टर में और निवेश का वादा किया। इसी सेक्टर की कई और कंपनियां उस समय पंजाब के मुक्त कृषि क्षेत्र की नीति की लेकर काफी उत्साहित थीं। 8 मार्च 2019 को पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने पठानकोट में पेप्सीको की फ्रेंचाइज वरुण बेवरेजेंस लिमिटेड का उद्घाटन किया। ये सब पंजाब की उसी नीति के तहत हो रहा था, जिसमें कृषि और खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में निजी कंपनियों की भागीदारी को प्रोत्साहित करने के लिए कई रियायतें भी दी गई थीं। आज वही मुख्यमंत्री और उन्हीं की पार्टी कांग्रेस केंद्र के वैसे ही कानूनों का विरोध कैसे कर सकती हैं। ये वही कांग्रेस है, 2103 में जिसके तत्कालीन उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रेस कांफ्रें स में बाकायदा एलान किया था, कि कांग्रेस शासित राज्यों में किसान अपनी उपज सीधे कंपनियों को बेच सकते हैं, इसके लिए बाकायदा मुख्यमंत्रियों को मंडी समितियों के नियम बदलने के निर्देश भी दिए गए थे। दिलचस्प मामला डीएमके का भी है, जो डीएमके आज खुलकर किसान आंदोलन के समर्थन में भारत बंद करने का ऐलान कर रही है, बीजेपी के संगठन महामंत्री बीएल संतोष ने उनका 2016 का मेनीफेस्टो ट्विटर पर शेयर किया है कि कैसे उन्होंने 24वें प्वॉइंट में वायदा किया है कि किसानों को सीधे अपने उत्पादों को किसी को भी बेचने का अधिकार देने के लिए नई नीति लाई जाएगी और एक नया कानून भी लाया जाएगा। आज किस मुंह से ये लोग इन्हीं सुधारों का विरोध कर रहे हैं? बीएल संतोष ने 2008 के किसान प्रदर्शनों की खबरें भी शेयर की हैं, जिनमें निजी खरीदारों की गेंह खरीदने पर लगी रोक के विरोध में तमाम किसान यूनियनों ने विरोध किया था, जिसमें पंजाब की यूनियंस भी शामिल

थीं। तो ये कैसे संभव है कि जो पार्टियां कल तक कृषि क्षेत्र में आमूल चूल सुधारों और निजी कंपनियों की भागीदारी के पक्ष में थी, आज वही कह रही है कि निजी कंपनियां किसानों की जमीनें हड़प लेंगी, जबकि मौजूदा कानून के मुताबिक ये संभव ही नहीं है। तब फिर से राजनीति नहीं तो क्या है। भ्रम फैलाकर, झूठ बोलकर अराजक स्थितियां खड़ी करने के पीछे कांग्रेस का मकसद क्या है। प्रश्न उठता है कि ये विरोध क्या कृषि सुधारों को गति देने वाले के लिए तो नहीं।

लेखक- राज चावला (वरिष्ठ पत्रकार) एवं विष्णु शर्मा (वरिष्ठ पत्रकार)

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