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क्या दक्षिण की राजनीति बदलेगी?

भाजपा हैदराबाद निकाय चुनाव की सफलता की पुनरावृत्ति आंधप्रदेश, तेलंगाना, केरल और तमिलनाडु में कर पाएगी?

क्या दक्षिण की राजनीति बदलेगी?
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बलबीर पुंज

क्या अब दक्षिण भारत की राजनीति में परिवर्तन आएगा, अभी तक कर्नाटक को छोड़कर भारतीय जनता पार्टी की आंधप्रदेश, तेलंगाना, केरल और तमिलनाडु में उपस्थिति अभी बहुत सीमित है। यहां तक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता भी इस चार प्रदेशों की भाजपा ईकाई में जान नहीं फूंक पाई है। किंतु क्या अब इसमें परिवर्तन होगा, हाल ही में ग्रेटर हैदराबाद नगर निकाय चुनाव के नतीजे आए, जिसमें भाजपा 4 से सीधा 48 सीटों पर पहुंच गई। वर्ष 2016 के चुनाव में जहां उसे 10.34 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए थे, वह इस वर्ष बढ़कर 35.5 प्रतिशत पर पहुंच गया। इससे पहले तेलगांना विधानसभा की एक सीट पर हुए उप-चुनाव में भी भाजपा 38.5 प्रतिशत मतों के साथ विजयी हुई थी।

ऐसा क्या हुआ है कि दक्षिण भारत में भाजपा एक विकल्प बन रही है? इस प्रश्न का उत्तर- कांग्रेस के वैचारिक स्खलन और उसके संकुचित होते राजनीतिक आधार में छिपा है। स्वतंत्रता के समय तक कांग्रेस का वैचारिक अधिष्ठान सरदार पटेल के राष्ट्रवाद और गांधीजी के सनातन विचारों से ओतप्रोत था। किंतु इन दोनों जननेताओं के निधन पश्चात कांग्रेस पर 'समाजवादीÓ पं. नेहरू का प्रभाव बढ़ गया। परिणामस्वरूप, कालांतर में पं. नेहरू की सुपुत्री श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा 1969-70 में वामपंथी चिंतन को आत्मसात करने के बाद कांग्रेस का शेष राष्ट्रवादी और सनातनी दृष्टिकोण विकृत हो गया।

गांधीजी की जिस विरासत पर आज कांग्रेस और नेहरू-गांधी परिवार अपना दावा जताते है, उसमें गौ-संवर्धन और गौरक्षा भी निहित था। किंतु वामपंथी केंचुली धारण करने के बाद उसी कांग्रेस के कार्यकर्ता- राजनीतिक विरोध के नाम पर सार्वजनिक रूप से गाय के बछड़े की हत्या करके उसके मांस को सेवन हेतु लोगों के बीच बांटते है। केरल में 2017 की घटना इसका प्रमाण है। वही दिल्ली में पार्टी के शीर्ष नेता राहुल गांधी 'भारत के तेरे टुकड़े होंगे..इंशा अल्लाह' नारा लगाने कन्हैया कुमार के साथ खड़े नजर आते है। यही कारण है कि आज शेष भारत की भांति दक्षिण भारत में भाजपा अपने राष्ट्रवादी एजेंडे और देश की मूल सनातन संस्कृति से अधिक निकट होने के कारण 'वैचारिक रूप से शून्य' कांग्रेस का विकल्प बनकर उभर रही है। बात केवल भाजपा के जनाधार बढऩे तक सीमित नहीं है। एशिया के सबसे महंगे और देश के लोकप्रिय अभिनेताओं में से रजनीकांत 31 दिसंबर को अपने राजनीतिक दल की औपचारिक घोषणा करेंगे। उनकी पार्टी अगले वर्ष होने वाले तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में हिस्सा लेगी। दक्षिण भारत के इस प्रदेश में दो बड़े नेताओं और पूर्व मुख्यमंत्रियों- जयाराम जयललिता और एम.करूणानिधि के निधन के बाद, जो राजनीतिक खालीपन आया है- उसे भरने में क्या रजनीकांत बड़ी भूमिका निभाएंगे?

'आध्यात्मिकÓ रजनीकांत ऐसे समय पर राजनीति में प्रवेश कर रहे है, जब तमिलनाडु के दो मुख्य दल- अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कडग़म (अन्नाद्रमुक) और द्रविड़ मुन्नेत्र कडग़म (द्रमुक) व्यक्तिगत महत्वकांशा और गुटबाजी से जूझ रहे है। डीएमके में जहां दिवंगत एम.करुणानिधि के दो पुत्र एमके स्टालिन और एमके अलागिरी आमने-सामने है, वही एआईएडीएमके से निष्कासित वीके शशिकला, जो जयललिता की निकटवर्ती सहयोगी भी थी- उनका प्रदेश के मुख्यमंत्री के.पलानीस्वामी और उप-मुख्यमंत्री व पार्टी समन्वयक ओ.पन्नीरसेल्वम से चल रहा द्वंद सर्वविदित है। पिछले कुछ वर्षों में इन दोनों पार्टियों का वैचारिक अधिष्ठान भी कमजोर पड़ गया है। रजनीकांत के भावी राजनीतिक दल की विचारधारा क्या होगी?- उसकी झलक इसी वर्ष 14 जनवरी को प्रसिद्ध तमिल साप्ताहिक पत्रिका 'तुगलक' की 50वीं वर्षगांठ पर आयोजित कार्यक्रम में तब दिख गई थी, जब उन्होंने पेरियार (इरोड वेंकट रामासामी नायकर) द्वारा श्रीरामचंद्र और सीता की निर्वस्त्र मूर्तियों को जूतों की माला पहनाकर जुलूस निकालने का उल्लेख किया था। इस शर्मनाक घटनाक्रम का संबंध उस द्रविड़ आंदोलन से है, जिसके रूग्ण विचार का इतिहास लगभग 200 वर्ष पुराना है। वर्ष 1813 में चर्च के दवाब में आकर ब्रितानियों ने अपने ईस्ट इंडिया कंपनी के चार्टर में एक विवादित धारा को जोड़ दिया था, जिसके माध्यम से ईसाई मिशनरियों को भारत में आकर खुले तौर पर मतांतरण करने का रास्ता प्रशस्त हो गया। 'द वाइट मैन बर्डन' के मजहबी कर्तव्य हेतु अंग्रेजी हुकूमत ने प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से चर्च और ईसाई मिशनरियों को हरसंभव सुविधाएं दी। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि वर्ष 1857 की पहली स्वतंत्रता क्रांति में देश का एकमात्र समाज, जो पूरी तरह अंग्रेजों के साथ और स्वाधीनता के विरोध में खड़ा था- वह केवल नव-मतांतरित ईसाई समुदाय था। कालांतर में जब ब्रितानी शासक सर सैयद अहमद खान के माध्यम से हिंदू-मुसलमान संबंधों में सदियों पुराने अविश्वास का लाभ उठाकर उत्तर-भारत में मुस्लिम अलगाववाद की पटकथा लिख रहे थे, तब मद्रास (चेन्नई) में कुटिल चर्चों और ईसाई मिशनरियों ने ब्राह्मणों के साथ हिंदू समुदाय के उच्च और शिक्षित वर्ग के मतांतरण का प्रयास तेज कर दिया। किंतु उन्हे आपेक्षित सफलता नहीं मिली। उस कालखंड में दक्षिण भारत सहित समूचे देश में स्वाधीनता की भावना सुदृढ़ हो चुकी थी और चर्च-ईसाई मिशनरियों के मजहबी एजेंडे में तत्कालीन कांग्रेस बड़ी रुकावट बन गई। तब पश्चात ईसाई मिशनरियों ने अपनी रणनीति बदली और हिंदुओं में उपेक्षित, शोषित और वंचित वर्ग- जिन्हे आज दलित कहकर संबोधित किया जाता है, उन्हे मजहबी एजेंडे का शिकार बनाया।

तथाकथित सामाजिक न्याय के नाम पर ब्राह्मणों के खिलाफ गैर-ब्राह्मणों को एकजुट किया गया और उन्हें राजनीतिक रूप से लामबंद करने हेतु ब्रितानी संरक्षण में वर्ष 1917 में साउथ इंडियन लिबरल फेडरेशन, जिसे जस्टिस पार्टी (द्रविड़ कडग़म) नाम से भी जाना गया- उसका गठन किया गया। इस संगठन का स्पष्ट मत था कि भारत में अंग्रेजों का राज बना रहना चाहिए, क्योंकि इस संगठन के अनुसार- स्वाधीनता का अर्थ देश में ब्राह्मणों का शासन होगा और बाकी सभी लोग- विशेषकर दलित दोयम दर्जे के नागरिक हो जाएंगे। यह कुप्रचार तब हो रहा था, जब 13वीं शताब्दी में भारत यात्रा पर आए इतालवी यात्री, व्यापारी और खोजकर्ता मार्को पोलो ने ब्राह्मणों को विश्व के सर्वाधिक विश्वासी व्यापारियों में से एक बताने के साथ उन्हें ईमानदार, उदार और दयालु बताया था। अंग्रेजों के प्रति अपनी वफादारी सिद्ध करने हेतु जस्टिस पार्टी ने 13 अप्रैल 1919 के जलियांवाला बाग नरसंहार को न्यायोचित तक ठहरा दिया।

सच तो यह है कि अंग्रेजों ने भारत में अपने शासन को शाश्वत बनाए रखने हेतु जिस कुटिल 'बांटो और राज करो' नीति को प्रतिपादित किया था, उसका संभवत: पहला दुष्परिणाम 1947 में इस्लामी पाकिस्तान का जन्म न होकर हिंदू समाज को बांटने वाला जस्टिस पार्टी का उदय था, जिसकी शाखा का कालांतर में विस्तार आत्म-सम्मान और द्रविड़ आंदोलन के रूप में हुआ। तब रामासामी नायकर 'पेरियार' इसी विकृत दर्शन के सबसे बड़े नेता बनकर उभरे। वर्ष 1947 आते-आते वे खुलकर हिंदुओं को ईसाइयत और इस्लाम मतांतरण के लिए प्रेरित करने लगे। अंग्रेजों से मिली स्वतंत्रता को शोक दिवस के रूप में मनाया। वे ब्राह्मण विरोधी अभियान में हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियों (नग्न चित्रों सहित) का अपमान करते। वास्तव में, पेरियार का द्रविड़ आंदोलन- घृणा और वैमनस्य पर टिका हुआ था। इसलिए असमानता और अन्याय के नाम पर उन्होंने 'आर्य बनाम द्रविड़', 'ब्राह्मण बनाम गैर-ब्राह्मण', 'हिंदी बनाम तमिल', 'तमिलवासी बनाम गैर-तमिलवासी', 'दक्षिण-भारत बनाम उत्तर-भारत' का विषाक्त राजनीतिक दर्शन प्रस्तुत किया। तब चर्च-ईसाई मिशनरी, मुस्लिम समाज, वामपंथी और पेरियार के नेतृत्व में द्रविड़ कडग़म- कांग्रेस का विरोध उसके राष्ट्रवादी विचारों और बहुलतावादी सनातन परंपराओं से निकटता के कारण करते थे। वे उसे ब्राह्मणवादी, सांप्रदायिक और फांसीवादी कहकर संबोधित करते।

इसी चिंतन से प्रदेश का वातावरण इतना विषाक्त हो गया कि कांग्रेस के बड़े लोकप्रिय नेताओं में से एक के.कामराज 1967 का विधानसभा चुनाव एक अनुभवहीन नवयुवक द्रमुक प्रत्याशी से हार गए। विडंबना देखिए कि आज उन्हीं शाश्वत सनातन प्रतीकों के अधिक समीप होने के कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी को चर्च-ईसाई मिशनरी, वामपंथी, द्रविड़ आंदोलन समर्थक और कांग्रेस सहित स्वघोषित सेकुलरिस्ट- वही गालियां देते है, जो स्वाधीनता से पहले कांग्रेस के लिए 'आरक्षित' थी। इस पृष्ठभूमि में क्या रजनीकांत अपने करिश्माई व्यक्तित्व और अपनी जनप्रसिद्धि का उपयोग करके तमिलनाडु में वैचारिक परिवर्तन ला पाएंगे? क्या भाजपा हैदराबाद निकाय चुनाव की सफलता की पुनरावृत्ति आंधप्रदेश, तेलंगाना, केरल और तमिलनाडु में कर पाएगी, उत्तर भविष्य के गर्त में छिपा है। परंतु संकेत भाजपा के लिए शुभ है।

(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार, पूर्व राज्यसभा सांसद और भारतीय जनता पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय-उपाध्यक्ष हैं।)

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