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राष्ट्र विरोधी विषदंश से ग्रस्त आंदोलन

कृषकीय गौरव को क्षीण करते अनुचित प्रदर्शन

राष्ट्र विरोधी विषदंश से ग्रस्त आंदोलन
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विकेश कुमार बडोला

पंजाब के कृषकों का एक सप्ताह से अधिक समयावधि का आंदोलन भारतीय नागरिकों के लिए राजनीति, समाज, लोगों, लोकतंत्र और सत्ता के संबंध में एक गहन सीख व साहित्य रच रहा है। संसद के मानसून सत्र में केन्द्रीय शासन ने तीन नये कृषि विधेयक पारित किए। विधेयक विधि-व्यवस्था का अंग बन गए। विधेयकों के विधान बन जाने के बाद केन्द्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सहयोगी पार्टी शिरोमणि अकाली दल की केन्द्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने पद त्याग दिया। शिअद ने कृषि विधेयकों के पारित हो जाने के बाद पंजाब के कृषकों, कृषि उत्पादों के आढ़तियों और अन्य लोगों में विधेयकों के प्रति बढ़ती अप्रसन्नता भांपकर ही राजग से अलग होने का निर्णय लिया। पंजाब में शिअद की राजनीतिक स्थिति मजबूत नहीं है। लोकसभा और विधानसभा चुनाव में भाजपा से गठबंधन करने के बाद भी उसे कोयी लाभ नहीं हुआ। इस समय शिअद पंजाब में आधिकारिक विपक्ष की भूमिका में भी नहीं है। केन्द्र में उसकी मंत्री को महत्वपूर्ण पद भी भाजपा द्वारा गठबंधन धर्म निर्वाह करने के उद्देश्य से सौंपा गया था। नैतिक रूप में यह स्थिति भाजपा के लिए अच्छी थी। जबकि शिअद पर पंजाब में अपनी राजनीतिक जमीन खोने का दबाव लगातार बना हुआ था। कृषि विधेयकों के संबंध में स्थानीय कृषकों को राज्य की कांग्रेस सरकार ने कुतर्कों, काल्पनिक भय और अन्य वैचारिक षड्यंत्र कर-करके केन्द्र सरकार के विरोध में कर दिया। शिअद के लिए यह स्थिति भावी लोकसभा व विधानसभा चुनावों को देखते हुए सुगम नहीं थी। पंजाबी आम जनता कृषकों के रूप में जिस केन्द्र सरकार से विधेयकों के संबंध में असंतुष्ट, क्रुध और असहमत थी, भला उस सरकार में गठबंधन सहयोगी के रूप में रहना शिअद के लिए लाभकारी कैसे होता! यही सोचकर उसने राजग से गठबंधन तोड़ दिया और पंजाब को यह संदेश देने का प्रयास किया कि वह कृषकों के हित में भाजपा का साथ भी छोड़ सकती है। आगामी अप्रैल-मई में पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। हालांकि इन राज्यों में पंजाब नहीं है। परन्तु इसके बाद पंजाब में भी विधानसभा चुनाव है। कांग्रेस के केन्द्रीय नेताओं ने यही सोचकर रणनीति बनायी है। कांग्रेस जिन कृषि विधेयकों के विरोध में पंजाब के कृषकों का राजनीतिक बैकअप कर रही है, 2013-14 में कपिल सिब्बल संसद में इन्हीं विधेयकों की गंभीर व आक्रोशजन्य पैरवी करते दिख जाएंगे। तत्कालीन वीडियो में स्पष्ट देखा जा सकता है कि कैसे वे तब के विपक्ष को इन विधेयकों के राष्ट्रीय, कृषिकीय और कृषक हितैषी लाभ बता रहे थे। तत्कालीन विपक्ष भाजपा को तब इन विधेयकों के प्रावधान समुचित होते हुए भी इसलिए कृषकोपयोगी नहीं प्रतीत हुए, क्योंकि वे संसद से लेकर सड़क तक विरोधी वक्तव्यों में बारंबार यही दोहरा रहे थे कि यूपीए का भ्रष्टाचारमूलक शासन इन विधेयकों को ढंग से क्रियान्वित नहीं कर पाएगा। तत्कालीन विपक्ष को पता था कि जिस गठबंधन सरकार (यूपीए) का प्रधानमंत्री कठपुतली बन भ्रष्टाचारी राजनीतिक शक्तियों के संकेतों पर नाच रहा हो, वह उचित प्रतीत होते विधेयकों को कृषकों के हित में भलीभांति क्रियान्वित कर ही नहीं सकता। इस संदर्भ में आश्चर्य यह है कि जब कांग्रेस कृषि विधेयकों को संसद में पारित करवाने की कोशिश कर रही थी, तब न तो पंजाबी किसानों और न ही उनके हर तरह के समर्थकों ने इनके विरोध में एक भी आंदोलन किया। पंजाब के अधिसंख्य कृषक, लोग, कांग्रेस सरकार, विपक्षी दल, खेल-सिनेमा जगत के प्रसिद्ध जन और यहां तक कि पंजाब से विशेष लिंक रखनेवाले कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो भी दिल्ली में डटे आंदोलनकारियों की मांगों की आड़ लेकर केन्द्र सरकार को कृषक विरोधी सिद्ध करने में जुटे हुए हैं। एक प्रकार से अधिसंख्य पंजाबियों ने बहुसंख्यक भारतीय नागरिकों द्वारा चुने गये केन्द्र में सत्तारूढ़ राजनीतिक दल, इसके प्रधानमंत्री के लोकतांत्रिक अधिकारों का तिरस्कार किया है। पंजाबी नेता, अभिनेता, खिलाड़ी और दूसरे विशिष्ट लोग पुरस्कार लौटा रहे हैं और स्वयं के पंजाबी मूल के होने को भारतीय अस्मिता के साथ प्रतिस्पर्द्धी बना रहे हैं। क्या यह उचित है? क्या इसी भावना से उद्वेलित शेष भारतीय लोगों का सामना अकेले पंजाबी कर पाएंगे? राष्ट्रीयता के संदर्भ में यह अति अनुचित कदम है। एक प्रकार से लगभग पूरे पंजाब में भाजपा का राजनीतिक जनाधार अत्यल्प होने का अर्थ यह तो नहीं होना चाहिए कि वहां के कृषक भाजपा का विरोध करने राज्य में सत्तारूढ़ और अखिल भारत में भाजपा की प्रतिस्पर्द्धी कांग्रेस के उकसावे में कृषि विधेयकों की आड़ लेकर राजधानी दिल्ली में कुछ भी अराजक गतिविधियां करने लगें। क्या किसान आंदोलन को उग्र बनाने के लिए दिल्ली की चहुंमुखी घेरेबंदी उचित है? यह प्रश्न पंजाब को छोड़कर देश के शेष हिस्सों की जनता में आक्रोश के साथ उभर रहा है। इतना ही नहीं, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी आंदोलन के लंबा चलने की भनक पाते ही घोषणा कर दी कि वे भी केन्द्र सरकार के विरुद्ध किसानों के पक्ष में हैं। ममता बनर्जी वस्तुत: इसलिए विचलित हैं क्योंकि ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम चुनाव में भाजपा दूसरे नंबर की पार्टी बनकर उभर आयी है। भाजपा ने पिछली बार इस चुनाव में 4 सीटें जीती थीं तो इस बार 48 सीटों पर विजय प्राप्त की। वह तेरास के बाद दूसरे नंबर की पार्टी बनकर उभरी है। भाजपा ने ओवैसी के राजनीतिक क्षेत्र में भी अपनी उपस्थिति-हलचल से सभी राज्यों के विपक्षियों की नींदें उड़ा दी हैं। दक्षिण भारत में कर्नाटक के बाद तेलंगाना में भाजपा का राजनीतिक विस्तार अभूतपूर्व है। इससे पता चलता है कि केन्द्र के कृषि विधेयकों के विरोध में पंजाब के किसानों का आंदोलन राष्ट्रव्यापी आंदोलन नहीं बन पाया है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता इसीलिए बेचैन है। वह किसान आंदोलन के बहाने भाजपा विरोध में उतरने के संकेत दे चुकी है। इसी तरह मोदी शासन ने जिन राजनीतिक, सामाजिक संस्थाओं और व्यापारिक प्रतिष्ठानों को उनकी अवैध कारगुजारियों के कारण अस्थिर कर दिया है और निरंतर करने पर लगा हुआ है, वे कांग्रेस की छत्रछाया में मोदी शासन-प्रशासन के विरोध में उभरनेवाले हरेक आंदोलन को व्यापक और निरर्थक बनाने की कोशिश में जुटे हुए हैं। इसीलिए किसानों और केन्द्र सरकार के बीच विधेयकों के संबंध में समाधानपरक समझौता अभी तक नहीं हो पाया है।

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