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नेपाल को मुस्लिम भी चाहते हैं, हिंदु राष्ट्र बनाना

राप्ती मुस्लिम सोसायटी के अध्यक्ष अमजद अली ने कहा है कि इस्लाम को बचाने के लिए यह जरूरी है

नेपाल को मुस्लिम भी चाहते हैं, हिंदु राष्ट्र बनाना
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प्रमोद भार्गव

नेपाल में राजशाही की मांग फिर से जोर पकड़ रही है। दरअसल नेपाल की कम्युनिष्ट पार्टी का चीन की गोद में बैठना और भारत विरोधी अभियान चलाना देश की जनता को नागवार गुजर रहा है। राजशाही के साथ हिंदू राष्ट्र बहाली की मांग भी मुखर हुई है। नेपाल के मुसलमान भी देश को हिंदू राष्ट्र बनाने के पक्ष में हैं। नेपाल को हिंदू राष्ट्र बनाने की मांग के समर्थन में हो रहे प्रदर्शनों में शामिल राप्ती मुस्लिम सोसायटी के अध्यक्ष अमजद अली ने कहा है कि इस्लाम को बचाने के लिए यह जरूरी है। समाज के कुछ नेताओं का मानना है कि हिंदू राष्ट्र का दर्जा खत्म होने के बाद से नेपाल में ईसाई मिशनरियां ज्यादा सक्रिय हो गई हैं। मिशनरी इस स्थिति का फायदा उठाकर लोगों का धर्म परिवर्तन करवा रही हैं। यूसीपीएन माओवादी के मुस्लिम मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष उदबुद्दीन फ्रू भी मिशनरियों के बढ़त प्रभाव को स्वीकार करते हैं। राष्ट्रवादी मुस्लिम मोर्चा के अध्यक्ष बाबू खान पठान ने हिमालयन टाइम्स को बताया कि मुसलमान देश की धर्मनिरपेक्ष पहचान नहीं चाहते हैं। 80 फीसद मुस्लिम आबादी देश की हिंदू पहचान बहाल करने के पक्ष में है। गौरतलब है कि राजशाही समर्थक राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी और कई हिंदूवादी संगठन काफी समय से नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र का दर्जा देने के लिए अभियान चला रहे हैं। पिछले महीने राजनीतिक दलों के बीच नए संविधान में देश की धर्मनिरपेक्ष पहचान खत्म करने को लेकर सहमति बनी थी। इसके बाद से यह मांग और तेज हो गई है। देश के सभी संप्रभुदाओं के लोग मानते हैं कि पुरानी हिंदू पहचान की बहाली का कोई विकल्प नहीं है। धर्मनिरपेक्षता हिंदू-मुस्लिम एकता तोडऩे की साजिश है। दरअसल ढ़ाई साल पहले दो नेपाली युवकों को बुटवॉल में पुराने राष्ट्रगान को गाने की वजह से पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। इसके बाद से ही पूरे नेपाल में इस राष्ट्रगान को गाने का सिलसिला चलने के साथ हिंदू राज की पुनसर््थापना की मांग खड़ी हो गई। हिमालय की गोद में बसा एक छोटा और सुंदर देश है। पूरी दुनिया में नेपाल ही एकमात्र ऐसा देश है, जिसे आजतक कोई दूसरा देश परतंत्र नहीं बना पाया। इसलिए यहां स्वतंत्रता दिवस नहीं मनाया जाता है। किंतु चीन के लगातार बढ़ रहे हस्तक्षेप के चलते लोगों को लगने लगा कि कहीं यह हिंदू धर्मावलंबी देश अपनी मौलिक संस्कृति व स्वतंत्रता न खो दे ? नेपाल एक दक्षिण एशियाई देश है। नेपाल के उत्तर में चीन का स्वायत्तशासी प्रदेश तिब्बत है। जिसे चीन निगलता जा रहा है। दक्षिण पूर्व व पश्चिम में भारत की सीमा लगती है। नेपाल की 85 प्रतिशत आबादी हिंदू है, इसलिए वह प्रतिशत के आधार पर सबसे बड़ा हिंदू धर्मावलंबी देश है। नेपाल में लंबे समय तक राजशाही रही है। किंतु राजशाही के खूनी दुखद अंत के बाद यहां माओवादी नेता प्रचंड के प्रधानमंत्री बनने से सामंतशाही सिमटती चली गई और 18 मई 2006 को राजा के अधिकारों में कटौती कर नेपाल को एक धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित कर माओवादी लोकतंत्र की शुरूआत हो गई। तभी से यहां चीनी हस्तक्षेप के चलते यहां के मूल स्वरूप को बदलने के अलावा भारत के साथ संबंध खराब होने की शुरूआत भी हो गई है। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने चीन के दबाव में न केवल भारत से शत्रुतापूर्ण संबंधों की बुनियाद रखी, बल्कि चीनी सेना को खुली छूट देकर अपनी जमीन भी खोना शुरू कर दी जाहिर है, नेपाल में लोकतांत्रिक राज्य की स्थापना तो हो गई, लेकिन लचर नेतृत्व के चलते यह देश अपना अस्तित्व खोने की कगार पर आ खड़ा हुआ है। हमारे पड़ोसी देशों में नेपाल और भूटान ऐसे देश हैं, जिनके साथ हमारे संबंध विश्वास और स्थिरता के रहे हैं। यही वजह है कि भारत और नेपाल के बीच 1950 में हुई सुलह, शांति और दोस्ती की संधि आज भी कायम है। नेपाल और भूटान से जुड़ी 1850 किमी लंबी सीमा रेखा बिना किसी पुख्ता पहरेदारी के खुली है। बावजूद चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश की तरह कोई विवाद नहीं है। बिना पारपत्र के आवाजाही निरंतर है। करीब 60 लाख नेपाली भारत में काम करके रोजी-रोटी कमा रहे हैं। 3000 नेपाली छात्रों को भारत हर साल छात्रवृत्ति देता है। नेपाल के विदेशी निवेश में भी अब तक का सबसे बड़ा 47 प्रतिशत हिस्सा भारत का है। बावजूद यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि नेपाल का झुकाव चीन की ओर बढ़ रहा है। हालांकि नरेंद्र मोदी ने अगस्त 2014 में नेपाल की यात्रा करके बिगड़ते संबंधों को आत्मीय बनाने की सार्थक पहल की थी, किंतु भारतीय मूल के मधेषियों के आंदोलन ने इस पर पानी फेर दिया। अब नेपाल और चीन के बीच द्विपक्षीय संबंधों को जो नए आयाम मिले हैं, उनके तहत ऐतिहासिक पारगमन व्यापार समझौतें समेत 10 समझौतों की शुरूआत करके नेपाल ने चीन से रिश्ते मजबूत कर लिए हैं। इस समझौते में सबसे खास एवं विचित्र बात यह हुई कि नेपाल अब भारत के कोलकाता स्थित हल्दिया बंदरगाह के बजाय 3000 किमी दूर स्थित चीनी तियानजिन बंदरगाह से अपने जरूरी सामानों की आपूर्ति कर रहा है। जबकि भारत का बंदरगाह नेपाल की सीमा से करीब 1000 किमी की दूरी पर है। विडंबना है कि नेपाल चीन के इस बंदरगाह का तुरंत इस्तेमाल नहीं कर सकता है, क्योंकि चीनी बंदरगाह ऊंचाई पर है और नेपाल में आधारभूत ढांचा उन्नत नहीं है। बावजूद यह समझौता शायद इसलिए हुआ, क्योंकि इसी समझौते के ठीक पहले नेपाल में मधेशी आंदोलन के चलते भारत से आने वाले नेपाल के व्यापारिक मार्गों को करीब छह माह तक बंद कर दिया था, जिससे नेपाल का जनजीवन अस्त व्यस्त हो गया था। इस नाकेबंदी की भविष्य में पुनरावृत्ति न हो इस आशंका से मुक्ति के लिए नेपाल ने इस समझौते को अंजाम दिया है। इस समझौते के बाद नेपाल का व्यवहार उस रस्सी की तरह हो गया है, जिसका बल जलने के बाद भी नष्ट नहीं होता है। इस अहम् समझौते के अलावा चीन और नेपाल के बीच तिब्बत के रास्ते रेलमार्ग बनाने पर भी संधि हुई है। चीन ने काठमांडू से करीब 200 किमी दूर पोखरा में क्षेत्रीय हवाई अड्डा निर्माण के लिए नेपाल को 21.6 डॉलर का सस्ती ब्याज दर पर ऋण दिया है। मुक्त व्यापार समझौते पर भी हस्ताक्षर हुए हैं। नेपाल में तेल और गैस की खोज करने पर भी चीन सहमत हुआ है। इसके लिए वह नेपाल को आर्थिक और तकनीकि मदद देने को राजी हो गया है। चीन ने नेपाल में अपने व्यावसायिक बैंक की शाखाएं भी खोल दी हैं। नेपाली बैंक भी अपनी शाखाएं चीन में खोल रहे हैं। संस्कृति, शिक्षा और पर्यटन जैसे मुद्दों पर भी चीन का दखल नेपाल में बढ़ गया है। ओली ने तिब्बत के रास्ते चीन के रणनीतिक रेल लिंक को नेपाल तक बढ़ाने का भी प्रस्ताव रखा है। चीन के लिए यह प्रस्ताव अपनी रणनीति के अनुकूल है। क्योंकि चीन पहले से ही रेलवे को तिब्बती शहर शिगात्से से नेपाल सीमा पार गायरोंग तक बढ़ाने की योजना बना रहा है। अर्से से इन्हीं कूटिल कूटनीतिक चालों के चलते कम्युनिष्ट विचारधारा के पोषक चीन ने माओवादी नेपालियों को अपनी गिरफ्त में लिया और नेपाल के हिंदू राष्ट्र होने के संवैधानिक प्रावधान को खत्म करके प्रचंड को प्रधानमंत्री बनवा दिया था। चीन नेपाल की पाठशालाओं में चीनी अध्यापकों से चीनी भाषा मंदारिन की मुफ्त में शिक्षा नेपाली नागरिकों को रहा है। इन पाठशालाओं की संख्या 19 से बढ़कर अब 50 हो गई है। चीन इस प्रयास के बहाने नेपाल की सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनैतिक संबंधों का नया इतिहास गढ़ रहा है। तराई के इलाकों में भारत के झुकाव को कम करने के लिए चीन की कुटिल रणनीति के चलते नेपाल सरकार मधेशियों के क्षेत्रों में नेपाली पहाडिय़ों को बसाकर इस जनसांख्यकीय घनत्व को बदल रहा है। जैसा कि चीन तिब्बत में कर रहा है। भारत के लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारतीय राजनीतिक नेतृत्व ने कभी भी चीन के लोकतंात्रिक मुखौटे में छिपी साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा को नहीं समझा। नतीजतन चीन की हड़प नीतियों के विरुद्ध न तो कभी दृढ़ता से खड़े हो पाए और न ही कड़ा रूख अपनाकर विश्व मंच पर अपना विरोध दर्ज करा पाए। अलबत्ता हमारे तीन प्रधानमंत्रियों जवाहरलाल नेहरू, राजीव गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी ने तिब्बत को चीन का अविभाजित हिस्सा मानने की उदारता ही जताई।

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