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'गोदी मीडिया'- कटु सत्य

'गोदी मीडिया' संज्ञा का चलन अभी शुरू हुआ है, किंतु यह पिछले 73 वर्षों से घुन की तरह भारतीय लोकतंत्र को खा रहा है

गोदी मीडिया- कटु सत्य
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बलबीर पुंज

भारत के सार्वजनिक विमर्श में इन दिनों 'गोदी मीडिया' जुमला बहुत प्रचलित है और दुर्भाग्य से इसका अस्तित्व एक कड़वा सच भी है। चाहे 'गोदी मीडिया' संज्ञा का चलन अभी शुरू हुआ हो, किंतु यह पिछले 73 वर्षों से घुन की तरह भारतीय लोकतंत्र को खा रहा है।

'गोदी मीडिया' के जन्म और इसके बढ़ते प्रभाव का एक लंबा इतिहास है। पं. नेहरू का सेकुलरवाद, वामपंथी विचारधारा का अधिनायकवाद और जिहादी मानसिकता- यह तीनों अलग-अलग होते हुए भी एक बड़ी सीमा तक एक-दूसरे का पर्याय है। जब वामपंथ के सहयोग से जिहादी पाकिस्तान का जन्म हुआ, तब पं. नेहरू के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने पार्टी में उन नेताओं (मुस्लिम सहित) को शामिल करके 'सेकुलर' घोषित कर दिया, जो स्वतंत्रता से पहले पाकिस्तान के लिए आंदोलित थे। विडंबना देखिए कि जो कल तक इस्लामी पाकिस्तान के पैरोकार थे, वे 'सेकुलर' हो गए और अखंड भारत के पक्षधर 'सांप्रदायिक'। खेद है कि यह परंपरा आज भी जारी है।

उसी विरोधाभास के गर्भ से एक विशेष मीडिया संस्कृति ने जन्म लिया, जिसका विचार-वित्तपोषण तथाकथित 'सेकुलर' सत्ता प्रतिष्ठान की 'गोदी' में हुआ। कालांतर में इसी 'गोदी मीडिया' ने सच्चे राष्ट्रवादियों, प्रतिकूल विचारधारा रखने वालों और सनातन भारत पर गौरवान्वित लोगों को लांछित करने हेतु सफेद झूठ, विकृत तथ्यों और अभद्र भाषा का उपयोग धड़ल्ले से किया। वास्तव में, 'गोदी मीडिया' को इसका प्रशिक्षण उन देशों में मिला था, जहां वे सरकारी खर्चे पर 'स्वतंत्र पत्रकारिता' का पाठ सीखने सोवियत संघ और पूर्वी यूरोपीय देशों का दौरा करते थे।

'गोदी मीडिया' का एक वर्ग पूंजीवादी अमेरिका से भी बहुत प्रभावित था, जिसके वित्तपोषण का आरोप अक्सर, अमेरिकी एजेंसी सीआईए पर लगता था। वामपंथ और अमेरिका निकटवर्ती मीडिया में कुत्ते और ईंट जैसा बैर था। चूंकि इन दोनों प्रतिद्वंदी विचारधारओं का वैचारिक अधिष्ठान मैकॉले की शिक्षा से प्रेरित था, इसलिए उनमें भारत और उसके मूल सनातन दर्शन के प्रति घृणा व निंदा का समान भाव था।

टीवी मीडिया पर केंद्र सरकार का 1990 के दशक तक नियंत्रण था। प्रिंट मीडिया यूं तो सरकारी नियंत्रण से मुक्त था, परंतु सभी मुख्य समाचारपत्र या तो कांग्रेस के स्वामित्व में थे या फिर प्रभाव में। समाचारपत्रों में नीतिगत सरकारी निर्णयों और मंत्री के कदाचारों आदि की आलोचना होती थी, किंतु जब कोई सीधा प्रहार वैचारिक अधिष्ठान पर करता- तो उसे 'अमेरिकी पिट्ठू', 'पूंजीपतियों का दलाल', 'सांप्रदायिक', 'फिरकापरस्त' आदि विशेषणों से अलंकृत कर दिया जाता। पाकिस्तान के वैचारिक अधिष्ठान, जिसकी अवधारणा में काफिर-कुफ्र का चिंतन निहित है- उसके खिलाफ लिखने/बोलने वाले पर 'युद्ध-उन्मादी' या फिर 'नफरत फैलाने वाले' का बिल्ला चिपका देते। यह चमत्कार वास्तव में, तत्कालीन वैचारिक प्रतिष्ठान और उसकी 'गोदी मीडिया' का कमाल था।

वर्ष 2014 के बाद भले ही भारतीय शासन-व्यवस्था उस रूग्ण वाम-नेहरूवादी जकडऩ से बाहर निकल गई हो, किंतु उसके विषाक्त रक्तबीज आज भी शैक्षणिक, बौद्धिक, साहित्यिक, नौकरशाही, आर्थिक और पत्रकारिता आदि क्षेत्रों में न केवल सक्रिय है, अपितु बहुत हद तक व्यवस्था को नियंत्रित करने की स्थिति में भी है। वाम-नेहरूवादी चिंतकों द्वारा आज भी किसी विरोधी विचारधारा रखने वाले को आम-बोलचाल की भाषा में लांछित करना हो- तो उसे 'संघी' या अब 'भक्त' कहकर तिरस्कृत किया जाता है। स्वघोषित सेकुलरिस्टों, 'वाम'-उदारवादियों और स्वयंभू प्रगतिशीलों की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी राष्ट्रवादी नीतियों के प्रति घृणा छिपी नहीं है। याद करिए, 2002 का बीभत्स गोधरा कांड- जिसमें अयोध्या से ट्रेन में लौट रहे 59 कारसेवकों को जीवित जलाकर मार दिया गया था, जिसके बाद गुजरात में दंगे भड़क उठे। तब मीडिया के बड़े वर्ग ने पत्रकारिता के सभी मापदंडों को तिलांजलि देकर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाने पर लिया था। उन्हीं में से कई पत्रकार आज भी बड़े मीडिया संस्थानों के शीर्ष पदों पर विराजमान है। दुर्भाग्य से यही विकृत लोग आज भी देश में कौन 'सेकुलर' है और कौन 'सांप्रदायिक'- इसका प्रमाणपत्र बांट रहे है।

यही कुनबा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गरियाने के लिए दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पूर्व उप-प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी आदि भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की प्रशंसा करते थकता नहीं है। जनस्मृति अल्पकालीन होती है। मुझे स्मरण है कि 30-40 वर्ष पहले चुनाव के समय यही विकृत समूह अटल-आडवाणी के लिए भी अभद्र-अमर्यादित भाषा का उपयोग करता था। 1980 के दशक तक तो मुंबई से निकलने वाला एक भारत विरोधी वामपंथी साप्ताहिक वाजपेयी पर आधारहीन आरोप लगाकर उन्हें 'अंग्रेजों का पिट्ठू', तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनसंघ को सीआईए का दलाल बता देता था। आज ऐसे ही प्रताडऩा के शिकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हो रहे हैं।

वास्तव में 'गोदी मीडिया' नेहरूवाद, वंशवाद, वामपंथ और देशविरोधी (जिहादी सहित) मानसिकता की उपज है, जो उसके चिंतकों के प्रति निष्ठा और सहानुभूति रखता है। धारा 370-35ए के संवैधानिक क्षरण पश्चात सुरक्षा कारणों से कश्मीर में कुछ समय के लिए इंटरनेट बंद रहा था। तब 'गोदी मीडिया' ने इसे मानवाधिकार-हनन का विषय बता दिया। किंतु उसी को घाटी में इस्लामी आतंकियों और जिहादियों द्वारा बलात्कार, हत्या जैसे नृशंस दंश झेलने के बाद कश्मीरी पंडितों का विवशपूर्ण पलायन- सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनाने लायक आज भी नहीं लगता।

उत्तरप्रदेश के दादरी में उग्र भीड़ के हाथों अखलाक की निंदनीय हत्या को समाचारपत्रों की सुर्खियों और टीवी चैनलों पर घंटों सप्ताहभर चली बहस ने वैश्विक घटना बना दिया। किंतु जब महाराष्ट्र के पालघर में हिंसक भीड़ ने पुलिस की उपस्थिति में दो साधुओं की हत्या कर दी, तब 'गोदी मीडिया' के लिए यह मामला राज्य कानून व्यवस्था का विषय बना रहा। जब मीडिया का एक भाग पालघर हत्याकांड जैसे दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं को भी प्रमुखता से स्थान दे रहा है, तो उनपर 'गोदी मीडिया' और उसके वैचारिक अधिष्ठान अपमानजनक टिप्पणियां कर रहे है। बात केवल यहां तक सीमित नहीं है। 'गोदी मीडिया' अयोध्या रामजन्मभूमि की भांति सदियों पहले जिहादी दंश का शिकार हुए काशी और मथुरा को सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा नहीं बनने देना चाहता। नेहरू-गांधी परिवार के कदाचार सहित वामपंथ की काली सच्चाई पर खुली चर्चा करने से बचता है। इन लोगों के लिए पाकिस्तान की भारत विरोधी नीतियों पर बात, धारा 370-35ए को लागू करने की नीयत, मतांतरण (छल, धोखे और लालच सहित), तीन तलाक और हलाला जैसी सामाजिक बुराइयों पर चर्चा होना- मुस्लिम विरोध, सांप्रदायिकता और मानवीय अधिकारों के हनन का पर्याय बन जाता है। यह हास्यास्पद है कि हमारे देश में श्रीराम और रामायण की आलोचनात्मक चर्चा 'सेकुलर' है, परंतु कुरान और बाइबल पर खुली चर्चा 'सांप्रदायिक' है- इसलिए इसपर पूर्ण निषेध है। पिछले 20 वर्षों से इस एकतरफा सार्वजनिक विमर्श को चुनौती मिल रही है। 'गोदी मीडिया' द्वारा खींची लक्ष्मण रेखा को लांघकर सभी विषयों का दूसरा पक्ष भी अब जनता के सामने आ रहा है। राष्ट्रीय सुरक्षा, अखंडता, संप्रभुता को सर्वोपरि मानकर टुकड़े-टुकड़े गैंग, नक्सलवाद (अर्बन नक्सलवाद सहित), आतंकवाद, अलगाववाद और मजहबी कट्टरता के खिलाफ मुखर चर्चा हो रही है। तथ्यों, तर्कों और सनातन दर्शन पर आधारित दृष्टिकोण स्वतंत्रता के 73 वर्ष बाद आज राष्ट्रीय विमर्श में स्थान प्राप्त कर रहा है। वर्तमान वैचारिक अधिष्ठान- जिसकी शुरूआत कालांतर में स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, श्री अरबिंदो, विनायक दमोदर सावरकर, डॉ. बलिराम हेडगवार, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, बलराज मधोक, सीताराम गोयल, रामस्वरूप, अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी आदि ने की थी- वह अब सार्वजनिक विमर्श में है। सच तो यह है कि भारतीय दर्शन की मूल 'डिफॉल्ट सेटिंग' यही विचार है। वामपंथी-जिहादी और भारत विरोधी ये 'गोदी मीडिया' आज भी कितना शक्तिशाली है, वह अभी हाल ही में टीवी मीडिया के दो प्रसिद्ध नाम- अर्नब गोस्वामी और अमिश देवगन पर हो रहे उत्पीडऩ से स्पष्ट हो जाता है। इन दोनों पत्रकारों पर अलग-अलग मामलों में प्राथमिकियां (स्थानांतरित सहित) गैर-भाजपा शासित राज्य- महाराष्ट्र और राजस्थान में दर्ज है। यह स्थापित सत्य है कि स्वयं को वाम-उदारवादी कहने वाले समूह- बहुलतावाद और उदारवाद का शत्रु है। भारतीय लोकतंत्र को सबसे अधिक खतरा इस दशकों पुराने 'गोदी मीडिया' से ही है।

(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार, पूर्व राज्यसभा सांसद और भारतीय जनता पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय-उपाध्यक्ष हैं।)

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