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किसान आंदोलन की दिशा

अभी तक देश में किसानों के लिए उनके उत्पाद को बिक्री को लेकर किसी प्रकार का विकल्प नहीं था

किसान आंदोलन की दिशा
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डॉ. समन्वय नंद

वर्तमान में दिल्ली की सीमा पर किसानों का आंदोलन जारी है। यह आंदोलनरत किसान केंद्र सरकार द्वारा पारित तीन कृषि कानूनों का को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। अभी तक देश में किसानों के लिए उनके उत्पाद को बिक्री को लेकर किसी प्रकार का विकल्प नहीं था। वे अपने उत्पाद को मंडी में भेजने के लिए बाध्य थे। इस कारण किसानों को विकल्प प्रदान करने हेतु मांग काफी दिनों से हो रही थी। पूर्व प्रधानमंत्री तथा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डॉ मनमोहन सिंह से लेकर एनसीपी प्रमुख शरद पवार व अन्य नेता किसानों को विकल्प प्रदान करने की बात काफी दिनों से कहते आ रहे थे लेकिन इस दिशा में किसी प्रकार का ठोस कार्यवाही नहीं की गई थी। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों को विकल्प प्रदान करने के लिए यह कानून पारित करवाया है। वास्तव में देखा जाए तो सरकार किसानों को विकल्प प्रदान करने का काम किया है। साथ ही सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि मंडी की व्यवस्था पूर्ववत जारी रहेगी तथा न्यूनतम समर्थन मूल्य के व्यवस्था में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं होगा। इस कारण यह कहा जा सकता है वर्तमान कि मोदी सरकार केवल पूर्व से पूर्व में हो रही मांग को पूरा किया है। साथ ही पूर्व की व्यवस्था को भी जारी रखा है।

लेकिन इसे लेकर कुछ किसान संगठन विशेषकर पंजाब के वामपंथी रुझान वाले किसान संगठन नाराज हैं । इन कानूनों को वापस लेने की मांग को लेकर दिल्ली सीमा में आंदोलन कर रहे हैं। सरकार भी यह कह रही है कि वह किसानों की शंकाओं को दूर करने के लिए बातचीत हेतु तैयार है और सरकार बातचीत भी कर रही है।

सरकार यदि कोई कानून लाती है अगर वह जनविरोधी होती है तो इसका विरोध होना जरुरी है। लोकतंत्र की यही खूबी है। लोकतंत्र में यदि जनविरोधी निर्णय किया जाता है तो इसका सड़क पर विरोध होना जरूरी भी है और उसे स्वागत किया जाना चाहिए। किसानों के मन में यदि इन कानूनों को लेकर किसी प्रकार की चिंताव आशंकाएं है तो उनकी चिंताओं को सुनना उनके समस्याओं का समाधान का रास्ता निकालना सरकार की जिम्मेदारी है। किसानों की चिंता दूर होना अत्यंत जरूरी है। केंद्र सरकार भी उनकी जिम्मेदारी को समझ रही है तथा किसानों के साथ निरंतर वार्ता कर रही है और आगे भी करने की बात कही है।

लेकिन अब यह देखने में आ रहा है कि किसान आंदोलन बोलन धीरे-धीरे अलग मोड लेता जा रहा है। अभी हाल ही में कुछ ऐसी घटनाएं देखने को मिल रही है जिससे यह संदेह हो रहा है कि यह आंदोलन किसानों की के हाथ से निकल कर कुछ भारत विरोधी भारत को विभाजित करने वाली शक्तियों के हाथ में चली गई है। इसके एक के बाद एक उदाहरण देखने को मिल रहा है।

इस आंदोलन के दौरान किसानों की समस्या पर पोस्टर लगने चाहिए लेकिन अब यह देखा जा रहा है कि नागरिकता संशोधन कानून को वापस लेने तथा जम्मू कश्मीर से धारा 370 को फिर से बहाल करने संबंधी पोस्टर भी दिखने लगे है। केवल इतना ही नहीं किसानों आंदोलन के दौरान और अर्बन नक्सल के नाम से परिचित भीमा कोरेगांव मामले में आरोपी तथा विभिन्न जेलों में बंद गौतम नवलखा, सुधा भारद्वाज, वरवरा राव तथा दिल्ली दंगा मामले में आरोपी शरजिल इमाम, उमर खालिद आदि लोगों को जेल से मुक्त करने की मांग भी होने लगी है। किसानों की समस्या उनके इस आंदोलन में प्रतिफलित होने के बदले अब टुकड़े टुकड़े गैंग के इस किसान आंदोलन को कब्जे में लेने जैसी अनुभव होने लगा है। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। इसमें नक्सलवाद और खालिस्तान समर्थक तत्वों भी घुस चुके हैं, ऐसा भी प्रमाण मिल रहे हैं।

भारत को अस्थिर करने के लिए अनेक शक्तियां लंबे समय से कार्य कर रही है। पाकिस्तान की कुख्यात खुफिया एजेंसी आईएसआई खालिस्तान प्रोजेक्ट के तहत भारत को अस्थिर करने की योजना पर लगातार काम कर रही है । यह किसी से छुपा हुआ नहीं है। खलिस्तानी परियोजना को बढ़ावा देने के लिए कनाडा एक प्रमुख केंद्र है यह भी सभी को पता है। कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडु ने भी भारत में हो रहे इस किसान आंदोलन को लेकर बयान दिया है। वह भी अपने भारत विरोधी होने के लिए परिचित हैं। उनका इस मामले में कूदना और और बयान देना यह प्रमाणित करता है कि अंतरराष्ट्रीय भारत विरोधी शक्तियां किसान आंदोलन के नाम पर भारत को अस्थिर करने के प्रयास में लगे हुए हैं। पंजाब के मुख्यमंत्री तथा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह ने भी किसान आंदोलन के संबंध में जो बयान दिया है उस पर ध्यान देना जरूरी है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि किसान आंदोलन अब देश के सुरक्षी लिए एक खतरा बनता जा रहा है। अमरिंदर सिंह भाजपा के नेता नहीं है, वह कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं इसके बावजूद भी वह इस खतरे को भांप रहे हैं और देश को आगाह कर रहे हैं। केवल कैप्टन अमरिंदर सिंह ही नहीं है बल्कि पंजाब के लुधियाना के कांग्रेसी सांसद रवनीत सिंह बिट्टू ने भी कहां है कि अबकी किसान आंदोलन किसानों के हाथ में नहीं है और यह भारत को विभाजित करने का स्वप्न देखने वाले खाली स्थानों के हाथ में चला गया है। अमेरिका में खालिस्तान समर्थकों द्वारा कृषि कानून के खिलाफ आंदोलन के नाम पर महात्मा गांधी के प्रतिमूर्ति को तोड़ा गया । यदि कोई किसान यदि किसानों की समस्या को उठाना चाहता है तो उसे महात्मा गांधी की प्रतिमूर्ति को तोडऩे की आवश्यकता है। यह घटना भी स्पष्ट कर रही है किसानों के ढाल बनाकर भारत को अस्थिर करने का प्रयास किया जा रहा है। धारा 370 हटाये जाने व सीएए कानून कानून पारित होने के जिस ढंग से देश भर में विरोध हुआ और कुछ स्थानों पर उपद्रव किए गए तथा दिल्ली में शाहीन बाग में आंदोलन के नाम पर पूरी दिल्ली को बंधक बनाने का प्रयास किया गया उससे यह स्पष्ट हो रहा है कि कुछ लोग लोकतंत्र की परीक्षा में उत्तीर्ण ना होने के बाद अराजकता के माध्यम से देश में अस्थिरता पैदा करने के लिए प्रयासरत हैं। यह भी उसी मानसिकता का विस्तार प्रतीत होता है। किसानों की मन में जो आशंकाएं हैं उसे उन्हें निश्चित रूप से दूर किया जाना चाहिए। किसानों की चिंताओं को सरकार को निश्चित रूप से सुनना चाहिए और उन्हें दूर करने के लिए आवश्यक कार्यवाही तत्काल किया जाना चाहिए। इस पर किसी प्रकार का विवाद नहीं हो सकता। लेकिन इसके साथ ही किसानों को ढाल बनाकर भारत को अस्थिर करने वाले इन भारत विरोधी शक्तियों को भी यथाशीघ्र पहचान कर उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई करने की आवश्यकता है। दो-तीन दशकों पूर्व पाकिस्तान प्रायोजित खालिस्तानी आतंकवाद का दंश भारत ने विशेष कर पंजाब झेल चुका है। हजारों की संख्या में लोग पाकिस्तान प्रायोजित इस आतंकवाद का शिकार हुए हैं। अब किसानों के नाम पर वही शक्तियां फिर से उसी आग झौंकने का प्रयास कर रहे हैं। इस कारण भारत सरकार को इस मामले को गंभीरता से लेते हुए इन शक्तियों के खिलाफ यथाशीघ्र कठोर कार्रवाई करने की आवश्यकता है।

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