Top
undefined

साधना के प्रति अभिरुचि जगाते हैं सात्विक आहार

साधना के प्रति अभिरुचि जगाते हैं सात्विक आहार
X

श्री श्री आनन्दमूर्ति

हम अपने शरीर की रक्षा के लिए जिस रोशनी, हवा, अन्न व जल को ग्रहण करते हैं, उन्हीं से सब जीव-कोश तैयार होते हैं। जब अनगिनत जीव-कोशों की सामूहिक मानस-प्रकृति मनुष्य के मन को प्रभावित करती है, तब साधक मात्र के लिए यह उचित है कि खाद्य-अखाद्य पर विचार करके ही ग्रहण करें। मान लिया जाये कि किसी ने तामसिक आहार ग्रहण किया। फलस्वरूप निर्दिष्ट समय पर उसमें तमोगुणी जीव-कोशों का जन्म होगा और वे ही साधक के मन पर तमोगुणी प्रभाव को फैलायेंगे। इसी कारण मनुष्य स्थान-काल-पात्र के अनुसार सतोगुणी या रजोगुणी भोजन ग्रहण करेंगे, तो सतोगुणी 'सेलÓ तैयार होंगे। इस अवस्था में साधक के मन में सहज रूप से ही साधना के प्रति अभिरुचि जगेगी और मन में साम्य अर्जन करके वह अपने को अध्यात्म भूमि पर प्रतिष्ठित करेगा।

प्राय: 21 दिनों के बाद पुराने जीव-कोश झड़कर गिर जाते हैं और नये जीव-कोशों का जन्म होता है, परंतु वृद्धावस्था में जीव कोशिक त्रुटियों के कारण चेहरे की कोमलता नष्ट हो जाती है, अंग-प्रत्यंग दुर्बल हो जाते हैं। मनुष्य के देह की जो ज्योति है, वह उसके शरीर के समस्त जीव-कोशों की सामूहिक ज्योति है। वृद्धावस्था में अनेक जीव-कोशों के शक्तिहीन हो जाने के कारण यह ज्योति कम हो जाती है। मनुष्य के मुखमंडल में ही करोड़ों जीव-कोश होते हैं। जब वह क्रोध में होता है तब शरीर का रक्त हठात मुखमंडल पर आ जाता है और मुख लाल हो उठता है। इससे भी जीव-कोश मरने लगते हैं। सात्विक भोजन और साधना के फलस्वरूप मनुष्य के शरीर के जीव-कोश भी सात्विक हो जाते हैं। तब उनसे एक सफेद ज्योति निकल आती है। साधारणत: महापुरुष के सिर के पीछे चारों ओर जो श्वेत ज्योतिर्मंडल दिखता है, उसका भी यही कारण है। अर्थात् इन जीवकोशों की प्रकृति के अनुसार मनुष्य की प्रकृति बन जाती है। अत: वही खाद्य सामग्री ग्रहण करना उचित है, जिससे हमारे शरीर और मन की पवित्रता बनी रहे।

समस्त वस्तुओं में सत्, रज तथा तमगुण

जगत् के समस्त वस्तुओं में ही सत्, रज तथा तम तीन गुण हैं, जिनमें किसी एक गुण की प्रधानता देखी जाती है। इस कारण खाद्य वस्तु भी गुण के अनुसार सात्विक, राजसिक व तामसिक, इन तीन प्रकारों में विभक्त हैं।

सात्विक आहार : जो खाद्य पदार्थ देह और मन दोनों के लिए हितकारी है, वह सात्विक है। सात्विक आहार सत्वगुणी जीव-कोशों को तैयार करता है। जैसे- चावल, गेहूं, जौ, सब तरह की दालें, (मसूरदाल छोड़कर) दूध, दूध की बनी वस्तुएं और फल-मूल, साग-सब्जी आदि।

राजसिक आहार : जो खाद्य सामग्री शरीर के लिए हितकारी है, पर मन के लिए हितकारी हो भी सकती है और नहीं भी हो सकती है, पर वह मन के लिए क्षतिकारक नहीं है, इस कारण राजसिक कहलाती है।

तामसिक आहार : जो खाद्य मन के लिए अनिष्टकारी है, परंतु शरीर के लिए हितकारी हो सकता है और नहीं भी हो सकता, जैसे- बासी और सड़ी चीजें।मन से सामंजस्य रखने तथा आध्यात्मिक प्रगति के लिए मनुष्य को खाद्य के गुणों की ओर लक्ष्य रखना ही होगा।

Next Story
Share it