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झूठ-सच के चक्रव्यूह में जीवन

झूठ-सच के चक्रव्यूह में जीवन
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नंदकिशोर श्रीमाली

आजकल जिसे देखिए वह परेशान है। तनाव का स्तर बहुत बढ़ा हुआ है। मानसिक अशांति और परेशानी से हर कोई घिरा हुआ है। झूठ-सच के चक्रव्यूह में उलझ कर जीवन घनचक्कर बन गया है। क्या सच बोलने से इन मानसिक परेशानियों का समाधान शुरू होता है? बचपन से हमने यही सुना है कि झूठ की उम्र नहीं होती। एक झूठ छिपाने के लिए दस झूठ बोलने पड़ते हैं, फिर भी झूठ किसी न किसी कोने से झांकता रहता है। इसलिए हमें सच बोलने की ओर प्रेरित करने के लिए गीतों, मुहावरों में सत्य का खूब गुणगान हुआ है। कहा गया है कि झूठ बोलने वाले को कौआ काटेगा तो कभी उसे ईश्वर के दरबार में होने वाले न्याय का भय दिया गया है। लेकिन सच के साथ एक समस्या है कि वह सीधा और सपाट होता है। इसी कारण सच कई बार समस्याओं को आमंत्रित कर देता है, जैसे द्रौपदी का दुर्योधन को कहना, 'अंधे का बेटा अंधा।' इस उक्ति को पचाने का दुर्योधन में सामथ्र्य नहीं था और यह महाभारत के युद्ध का कारण बन गया। इसलिए सत्यम् ब्रूयात् प्रियम् ब्रूयात का सिद्धांत दिया गया, यानी सच बोलो मगर प्रिय बोलो। कई बार ऐसी परिस्थितियां आ जाती हैं जब सत्य पर चाशनी का मुलम्मा नहीं चढ़ाया जा सकता है। ऐसे में याद तो 'अश्वत्थामा हत:' वाला आधा अधूरा सच बोला जाए या फिर झूठ! 'अश्वत्थामा हत:' वाले आधे अधूरे सच के बारे में सभी जानते हैं कि किस प्रकार युधिष्ठिर ने कुरुक्षेत्र की युद्ध भूमि में अश्वत्थामा हाथी मरने की घटना को गुरु पुत्र द्रोणाचार्य के अश्वत्थामा पुत्र से जोड़ दिया था। मगर बहुत कम लोग जानते हैं कि धर्मग्रंथों में आधे-अधूरे सच को, जिसे अपना-अपना सच भी कहा जा सकता है, यानी उपयुक्तता (कन्वीनियंस) को गलत नहीं माना गया है। वैदिक साहित्य में सच के दो प्रकार बताए गए हैं। ऋत का अर्थ निरपेक्ष सत्य (एबसॉल्यूट ट्रूथ) वह सच तो हर परिस्थिति में एक होता है और सत्य परिस्थिति के हिसाब से बदलता रहता है, यानी सापेक्ष सत्य (रिलेटिव ट्रूथ)। देवी भागवत में भी सत्यतपा मुनि की ऐसी ही एक कथा आई है। हालांकि वहां पर बिंदुरहित 'ऐ' मंत्र के उच्चारण द्वारा ज्ञान चक्षु खुलने पर जोर दिया गया है, मगर मूल बात तो सुविधा अनुसार सच कहना है। कथा इस प्रकार है: किसी समय में विद्वान पंडित देवदत्त ने पुत्र प्राप्ति के लिए विधिपूर्वक यज्ञ किया। उस यज्ञ में गोभिल मुनि सामवेद का पाठ कर रहे थे। सांस लेने के कारण उनका स्वर भंग हो गया। तब देवदत्त ने क्रोधित होकर गोभिल मुनि को कटु वचन कह दिया जिससे उत्तेजित होकर मुनि ने देवदत्त को शाप दे दिया। मुनि ने देवदत्त से कहा, 'श्वास लेने के कारण हुए स्वर भंग से तुमने क्रुद्ध होकर मुझे कटुु वचन कहा है जबकि श्वास लेना शरीर का धर्म है। अत: तुम्हारा पुत्र मूर्ख और गूंगा होगा।' गोभिल मुनि के ऐसे वचन सुनकर देवदत्त अत्यंत दुखी हो गया। उन्हें अपने पुत्र का भविष्य अत्यंत अंधकारमय दिखा। आंखों में आंसू भरकर वह मुनि के चरणों में गिर पड़े। देवदत्त की ग्लानि देखकर मुनि ने उन्हें आश्वासन दिया कि तुम्हारा पुत्र मूर्ख होकर भी बाद में विद्वान बन जाएगा। शुभ नक्षत्र में देवदत्त की पत्नी रोहिणी ने पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम उतथ्य था। उतथ्य जड़ बुद्धि था। माता-पिता ने उसे विद्वान बनाने की बहुत चेष्टा की, मगर शाप से प्रभावित बालक को कुछ भी समझ नहीं आता था। धीरे-धीरे यह बात सब लोग जान गए कि उतथ्य मूर्ख है और वह बालक बारह वर्ष की अवस्था में माता-पिता को अपमान से बचाने के लिए वन में जाकर रहने लगा। उतथ्य वेद अध्ययन, जप-तप आराधना कुछ भी नहीं जानता था। उसे इस बात का बहुत दुख था कि वह उत्तम कुल में जन्म लेकर भी अपने जीवन में ज्ञान अर्जित नहीं कर पाया। परंतु उसमें एक खास बात थी। वह हमेशा सच बोलता था। इसलिए उसका नाम सत्यतपा रख दिया था। वह ना तो किसी का अहित करता और ना कोई ऐसा कार्य करता था जिससे किसी को दुख पहुंचे। गोभिल मुनि के शाप के प्रभाव से उसमें ना तो वेद का ज्ञान था ना ही वह तप में पारंगत था परन्तु सत्य की शक्ति में स्थित होने के प्रभाव से वह हमेशा शांतचित्त रहता था। वह एक बात पर अडिग था कि उसे हर परिस्थिति में सच बोलना है। परंतु एक बार उसके आश्रम में बाण से बींधा हुआ रक्त से लथपथ एक सुअर आया। उसे देख कर सत्यतपा का मन करुणा से भर गया और बिना जाने, बिना समझे उसने बिंदुरहित सारस्वत बीजमंत्र 'ऐ' का उच्चारण किया। थोड़ी देर में वह भील मुनि सत्यतपा के सामने आकर उनसे पूछता है, 'क्या आपने बाण से बींधा हुआ सुअर देखा है?' आप सत्यव्रत हैं। कृपया सत्य बताइए। भील के इस प्रकार पूछने पर सत्यतपा मुनि परेशान होकर सोचे, अगर सत्य बोला तो हिंसा होगी और नहीं बोला तो सत्यव्रत का पालन नहीं होगा। यह सोचकर मुनि उस भील से कहते हैं, ''जो आंख देखती है वह बोलती नहीं है और जो वाणी बोलती है, देखती नहीं है।'' इस उत्तर को सुन भील वापस लौट गया और सत्यतपा मुनि इस जगत में वाल्मीकि मुनि के भांति विख्यात हो गए। इस कथा से यह समझ में आ जाता है कि सत्य की शक्ति शाप के प्रभाव का भी अंत कर सकती है। हम सब जानते हैं कि प्रत्येक धर्म सच बोलने को प्रेरित करता है। क्योंकि सच कहने से मनुष्य के भीतर सात्विकता या सत्वगुण जगता है। देवी भागवत में ब्रह्माजी सत्वगुण की महिमा बताते हुए कहते हैं कि इसका वर्ण सफेद है, और धर्म की ओर प्रेम बढ़ाने वाला तत्व है। धार्मिकता करुणा और सौहार्द्र से परे नहीं है। देवी भागवत पुराण में स्पष्ट लिखा गया है कि काम, क्रोध, मोह, तृष्णा, द्वेष, राग, मद:, अहंकार, परदोष दर्शन, ईर्ष्या, सहनशीलता का अभाव और अशान्ति पापमय शरीर के विकार हैं। जब तक ये पाप मनुष्य के शरीर से नहीं निकलते हैं तब तक मनुष्य मानसिक उत्थान की ओर नहीं बढ़ पाता है। मनुष्य को अगर अपने को बड़ा बनाना है तो उसे निरन्तर अपनी ऊर्जा, अपने विकारों और दोषों को दूर करने में लगाना है जिसकी शुरुआत सच बोलने से हो जाती है। संभवत इसी कारण से हमारे राष्ट्रीय प्रतीक के नीचे मुंडक उपनिषद का वाक्यांश सत्यमेव जयते लिखा हुआ है, यानी सत्य की विजय होती है।

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