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अब क्रांति नहीं, विकास चाहिए

उम्मीद सिर्फ इतनी है कि 2020 में हम जिन कष्टों से गुजरे हैं, 2021 हमें वैसे कष्टों से बचा लेगा

अब क्रांति नहीं, विकास चाहिए
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हरजिंदर

जैसे पर्वतीय घाटियों से निकलने वाली कोई उछलती-कूदती वेगवती नदी मैदान में पहुंचकर अचानक ही शांत होने लग जाए। 21वें साल को उम्र का वह पड़ाव माना जाता है, जब बचपन और जवानी का शुरुआती अल्लहड़पन पीछे छूट जाता है और परिपक्वता का दौर शुरू होता है। इस सदी के 21वें साल से भी क्या बस इतनी उम्मीद बांधनी होगी? वैसे, इस समय हम 21वीं सदी में भी हैं। अगर पिछली सारी सदियों से तुलना करें, तो कम से कम अपने शुरुआती दो दशकों में तो यह सदी नीरसता में लिपटी परिपक्वता से बार-बार मुलाकात कराती रही है। पिछली सदी का पूरा पूर्वाद्र्ध बदलाव की कसमें खाने और क्रांतियों के लिए अधीर दिखाई देता है। लेकिन 21वीं सदी के आते-आते वे सारे उबाल ठंडे पड़ चुके हैं और अब क्रांति नहीं, विकास की बात होती है। बदलाव के हरावल दस्तों को संगठित करने पर नहीं, बल्कि संसाधनों को जुटाने पर जोर दिया जाता है। एक तरह से यह ठंडे पड़ चुके जोश की सदी का 21वां साल भी है। इस सदी के 21वें साल की तुलना अगर हम पिछली सदी के 21वें साल से करें, तो एक समानता साफ तौर पर दिखाई देती है। दोनों की शुरुआत महामारी के भयानक सदमे के बीच हुई। हालांकि, स्पैनिश फ्लू की शुरुआत 1918 में हुई थी, लेकिन उसका ज्यादा प्रकोप 1919 और 1920 में रहा, और उसका अंतिम सिरा 1921 तक गया। वैसे ही, जैसे कोविड-19 दरअसल 2019 में शुरू हुआ, लेकिन उसके प्रकोप का वर्ष 2020 को ही माना जाएगा। दोनों सदी का एक अंतर हम इन दो महामारियों से भी समझ सकते हैं। स्पैनिश फ्लू निश्चित तौर पर ज्यादा भयावह महामारी थी। उसने कहीं ज्यादा लोगों की जान ली। और सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह था कि जहां कोरोना वायरस संक्रमण ने सबसे ज्यादा संख्या में बुजुर्गों को अपना निशाना बनाया, तो वहीं स्पैनिश फ्लू का ज्यादातर शिकार नौजवान थे। एक अंतर ज्ञान और विज्ञान का भी है। स्पैनिश फ्लू जब फैला, तब वायरस शब्द का इस्तेमाल भले ही होने लगा था, लेकिन वायरस क्या होता है, यह जानकारी नहीं थी। वायरस के बारे में जानकारी तो एक दशक के बाद मिल पाई, जब इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप बना और पहली बार उसे देखा जा सका। जबकि इस बार महामारी फैलने के कुछ ही सप्ताह बाद कोरोना वायरस की पूरी जिनोम कुंडली दुनिया भर के वैज्ञानिकों के पास थी और चंद महीनों के बाद अब हमारे पास एक दर्जन से ज्यादा तरह की वैक्सीन भी लगभग तैयार हैं। पिछली सदी के 21वें साल की तारीखों और घटनाओं को अगर गौर से देखें, तो वह एक तरह से महामारी के दुखों को भुलाने का साल था। यह वह साल था, जब पूरी दुनिया ने सारे गम भुलाकर फिर से बदलाव की अपनी प्रतिबद्धता की ओर लौटना शुरू कर दिया था। वे सारे संकल्प लौट आए, महामारी का तूफान भी जिनका बाल-बांका नहीं कर सका था। भारत के संदर्भ में देखें, तो 1921 ही वह साल था, जब देश में चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन ने तिरंगे झंडे को अपनाया और उसे गुलामी से मुक्ति की चाह का परचम बना दिया। खादी अपनाने का आंदोलन भी इसी साल शुरू हुआ था। बदलाव की इतनी ही तेज चाह इसी साल पूरी दुनिया में लौटी थी। इसी साल चीन में कम्युनिस्ट पार्टी बनी और अफीमचियों का देश कहलाने वाले इस मुल्क ने इस छवि से मुक्ति की राह पकडऩी शुरू कर दी। एशिया के तकरीबन सभी देशों में साम्यवादी और समाजवादी पार्टियों की स्थापना इसी के बाद शुरू हुई। नया हासिल करने की कोशिश में 1921 के पुराने गम न सिर्फ भुलाए गए, बल्कि उसका रिकॉर्ड रखने की भी जरूरत नहीं समझी गई। दो साल पहले स्पैनिश फ्लू की एक सदी पूरी होने पर जब कुछ इतिहासकारों ने दस्तावेज खंगालने शुरू किए, तो पता चला कि उस महामारी की बहुत सी बातें कहीं दर्ज ही नहीं हैं। यहां तक कि भारत समेत बहुत सारे देशों में ऐसे प्रामाणिक आंकड़े भी उपलब्ध नहीं हैं कि महामारी ने कितने लोगों को संक्रमित किया, कितने बच पाए और कितनों को नहीं बचाया जा सका? एक कारण यह भी है कि दुनिया पहले विश्व युद्ध से बस निकली ही थी और ज्यादातर देशों की दिलचस्पी आंकड़ों को जमा करने से ज्यादा उन्हें छिपाने में थी। खासकर वे आंकड़े, जो उस समय की विश्व शक्तियों के उपनिवेशों के थे। यानी 1921 में बीते समय की बुरी यादों को सिर्फ भुलाया नहीं गया, बल्कि दफ्न भी कर दिया गया। इस मामले में 2021 एक अलग तरह का वर्ष होगा। इस समय हमारे पास महामारी के ढेर सारे आंकड़े हैं। कंप्यूटर की भाषा में बात करें, तो अभी तक कई टेराबाइट आंकड़े जमा हो चुके हैं और हर रोज जमा हो रहे हैं। इसके अलावा, हम जितनी भी तरह की मानव त्रासदियों से इस दौर में गुजरे हैं, उनमें से ज्यादातर लेखों, रिपोर्टों और कई तरह के वीडियो में दर्ज हो चुकी हैं। ये सब चीजें हमारे पास अब हमेशा रहने वाली हैं। बाद में भले ही इनकी याद धूमिल पड़ जाए, लेकिन 2021 में इन्हें कोशिश करके भुला पाना शायद मुमकिन नहीं होगा। भुलाया भी जाए, तो किसके लिए? उसके बचपन और जवानी ने 21वीं सदी को वे सपने और संकल्प नहीं दिए, जिनकी दीवानगी सब कुछ भुलाने का एक बड़ा और वाजिब कारण बन सकती थी। हम यह उम्मीद भी नहीं बांध रहे कि 2021 हमें 2020 की बुरी यादों से मुक्ति दिला देगा। उम्मीद सिर्फ इतनी है कि 2020 में हम जिन कष्टों से गुजरे हैं, 2021 हमें वैसे कष्टों से बचा लेगा। और शायद कुछ ऐसी व्यवस्थाएं भी देगा, जो भविष्य की किसी महामारी में हमारी रक्षा करेंगी। यथार्थ की जमीन पर खड़ा 2021 एक परिपक्व सदी का परिपक्व साल साबित होने वाला है।

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