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उदयपुर की शिराओं में सूखता भारतीय संस्कृति का वैभव

उदयपुर की शिराओं में सूखता भारतीय संस्कृति का वैभव
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विजय मनोहर तिवारी

उदयपुर पैलेस, खसरा नंबर-822, निजी संपत्ति

क्या मजबूत पत्थरों से बनी ऊंची चारदीवारी और बुर्जों से घिरे किसी एक हजार साल पुराने राजमहल का कोई हिस्सा किसी की निजी संपत्ति हो सकता है, जिसकी एक दीवार को तोड़कर सीमेंट और लोहे का दरवाजा लगा दिया गया हो और कोई इस तरफ ऐसी-वैसी निगाह न देखे इसके लिए पुरानी दीवार पर एक साइन बोर्ड टांग दिया गया हो-'निजी संपत्ति, उदयपुर पैलेस, खसरा नंबर-822, वार्ड नंबर-14।'

मध्यप्रदेश के विदिशा शहर से करीब 70 किलोमीटर दूर उदयपुर नाम के एक प्राचीन नगर में देश के जाने-माने इतिहासकार डॉ. सुरेश मिश्र के साथ घूमना एक यादगार अनुभव रहा। आठ हजार आबादी की इस बस्ती में हजार-बारह सौ साल की इमारतें आज भी काफी हद तक बची हुई है। पूरा नगर अपने पुराने डिजाइन पर ऊबड़-खाबड़ हालत में मौजूद है, जहां परमार राजवंश के वास्तुशिल्प के अनुसार दीवार-दरवाजे, मंदिर, महल, तालाब, बावड़ी, कमरे, दीवारें और गलियां हैं। इनसे गुजरते हुए लगता है कि आप अतीत में लौटकर सदियों पहले के खोए हुए वैभव की सैर कर रहे हैं। इस जगह की प्रसिद्धि नीलकंठेश्वर मंदिर से है, जो राजा भोज के बाद की पीढ़ी में हुए महाराज उदयादित्य ने बनवाया था। इस नगर का नाम उदयपुर भी उनसे ही जुड़ा है। उस दौर में राजा के युवराजों को राजधानी से दूर के महत्वपूर्ण नगरों और सैन्य ठिकानों की कमान सौंपी जाती थी। एक तरह से राज्य शासन चलाने के पारिवारिक प्रशिक्षण का यह हिस्सा था। जैसे मगध में सम्राट बनने के पहले अशोक के पिता बिंदुसार ने उन्हें अवंति का राज्यपाल बनाकर उज्जैन भेजा था। बहुत संभव है युवराज उदयादित्य अपने पिता के समय परमारों के राज्य की सीमा पर स्थित उदयपुर भेजे गए हों। हो सकता है कि उदयादित्य ने ही इस नगर की विकास योजना बनाई हो और अपनी वंश परंपरा के अनुसार बेहतरीन निर्माण किए हों, जो उनके राजा बनने के बाद भी जारी रहे होंगे। वर्ना ऐसे मंदिर गांव-गांव में हैं, लेकिन चौकोर दुर्ग से सुरक्षित नगर के भीतर एक विशाल चारदीवारी और बुर्जों से घिरे राजमहल की रूपरेखा इस इलाके में सिर्फ यहीं हैं। डॉ. सुरेश मिश्र ने अफसोस के साथ कहा कि पूरे नगर को नए सिरे से सहेजने की जरूरत है। यहां कई इमारतें, महल और मंदिर बचे हुए हैं, जो भारत के सदियों पुराने स्थापत्य का एक शानदार परिचय दे रहे हैं। अगर इन्हें न बचाया गया तो हमारी आंखों के सामने यह धूल में मिल रहा है। अब कोई विदेशी आक्रांता यह बरबादी नहीं कर रहे। हम इसके जिम्मेदार हैं।

उदयपुर नहीं अस्तपुर कहिए

हर दिन दूर-दूर से लोग उदयपुर आते हैं। ज्यादातर सिर्फ 11 वीं सदी के मंदिर के दर्शन करने आते हैं और वे भी सिर्फ महादेव की पूजा-अर्चना के लिए। गर्भग्रह से बाहर आकर वे हक्के-बक्के से गर्दन ऊंची करके मंदिर के स्थापत्य को देखते हैं। मोबाइल आजकल सबके पास हैं सो फोटो खींचना फूल चढ़ाने जैसी आवश्यक रस्म बन गई है ताकि सोशल मीडिया पर प्रसारित कर सकें। इक्का-दुक्का ही कोई पत्थरों पर उकेरे इस चमत्कार की डिटेल में जाना चाहता होगा। न के बराबर। उन्हें इतिहास में कोई रुचि नहीं है। जब ऐसा है तो यह भी स्वाभाविक है कि ग्राम पंचायत से लेकर जिला पंचायत के स्थानीय नुमांइदे भी एक अजीब बेफिक्री में हों। उन्हें भी कोई परवाह नहीं रही कि हजार साल पुराने इस हीरे की सही साज-संभाल करने लायक वे इस नगर को विकसित करने के बारे में सोचते। उनकी नजर में यह पुरातत्व वालों का काम है। जब ऐसा है तो यह भी स्वाभाविक है कि सिविल सेवाओं की परीक्षाएं पास करके प्रशासन तंत्र में आने वाले भी नेत्रहीन, मूक, बधिर, विकलांग और मंदबुद्धि हों, जो अपने हिस्से का तीन-चार साल का कार्यकाल काटकर अगले प्रमोशन की घात में बैठे रहें। और परमारों के नाम पर लैटरहेड पर मौजूद तरह-तरह के संगठन भी किसी क्षत्रिय महासभा की एक शाखा के रूप में साल में एक दिन अपनी शिराओं में बहते क्षत्रिय रक्त की अनुभूति के लिए केसरिया साफे बांधकर शोभायात्राएं निकाल लेते होंगे, उन्हें भी अपने महान पूर्वज के स्मारकों की बरबादी और कब्जे की कहानी से क्या लेना-देना? परमार लिख लेने से हर कोई राजा भोज या उदयादित्य तो हो नहीं जाता! मैंने कुछ समय पहले विदिशा जिले के एक कलेक्टर को इस नगर में जीवित बचे रह गए इतिहास को सहेजने की दृष्टि से कुछ सुझाव और निवेदन एक पत्र में लिखे थे। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर की तर्ज पर अगर कुछ काम हो तो उदयपुर मध्यप्रदेश में राजधानी भोपाल के काफी पास पर्यटन मानचित्र पर चमक सकता है। कलेक्टर का नाम भी किसी प्राचीन सूयर्वंशी राजवंश की तरह काफी प्रभावशाली था, जिसका जिक्र मैंने उस पत्र में विशेष रूप से किया था कि आपके नाम से लगता है कि यह पराक्रम आप कर सकते हैं-'परमवीर अशोकचक्र वीर बहादुर महाप्रतापी कुंअर विक्रमसिंह।' मुझे बड़ी उम्मीद थी कि वे कम से कम कागजों पर एक योजना ही बनाते, कोई मीटिंग करते। हो सकता है कुछ क्रांतकारी रचना फाइलों में रखकर चले गए हों। अक्सर नाम भी एक किस्म का फरेब रचते हैं। विजय नाम होने से भर से कोई विजेता नहीं हो सकता! कलेक्टर या कमिश्नर हो सकता है!! राजधानी भोपाल की नाक के नीचे सिर्फ डेढ़ सौ किलोमीटर दूर एक पूरा और पुराना नगर अपने एक हजार साल पुराने वैभव में बचा हुआ जैसे दम तोड़ रहा है, लेकिन ग्राम पंचायत से लेकर संसद तक की यात्रा करने वाले जनता के प्रतिनिधियों और प्रशासनिक पराक्रमियों ने इसे घूरे की तरह रखकर छोड़ा है। जैसा कि सब जानते हैं, उनकी प्राथमिकताओं में खदानें, कब्जे, निर्माण, बजट, कमीशन, सेटिंग, तबादले, प्रमोशन, टिकट, चुनाव जैसे ऐतिहासिक कर्म सबसे ऊपर रहे हैं। दृष्टि होती तो दूरदृष्टि की अपेक्षा उनसे होती। मैं यह प्रसंग इसलिए लिख रहा हूं कि अखबारों से पता चला है कि सरकार अवैध कब्जे करने वाले माफियाओं का हालचाल जरा जोर से ही पूछ रही है। मैं ध्यान दिलाना चाहता हूं कि अवैध कब्जे सिर्फ शहरों में नहीं हैं, जहां झुग्गी-झोपड़ी प्रकोष्ठ और ठेला-गुमटियों को संरक्षण देने वालों ने नर्क का नजारा पेश किया है। उदयपुर की गलियों के कोनों, तिराहों, सड़कों और दीवारों पर हरी चादरों के टुकड़े हाल ही में डाले गए हैं। मासूम ग्रामवासी हिंदू किसी परमज्ञानी मौलवी के हवाले से यहां किसी पीर (रहमतउल्लाअलैह) के प्रकट होने की ब्रेकिंग न्यूज हाथ जोड़कर थमा देते हैं। ज्योतिष का जानकार नहीं हूं लेकिन भविष्यवाणी कर सकता हूं कि यहां आने वाले सालों में रौनकदार मजारें बनेंगी, जहां कौमी एकता के उर्स और मुशायरों में यही जनप्रतिनिधि पधारेंगे और यही महाप्रतापी अफसर उनके इंतजामों में लगेंगे। उदयपुर की शिराओं में सूखता भारतीय संस्कृति का वैभव तब दम तोड़ चुका होगा। परमार वंश के महाराजा उदयादित्य के राजमहल के एक बंद दरवाजे पर टंगा वह साइनबोर्ड नए इतिहास की घोषणा कर रहा है- 'निजी संपत्ति, उदयपुर पैलेस, वार्ड नंबर-14, खसरा नंबर-822, काजी सैयद इरफान अली, काजी सैयद महबूब अली, काजी सैयद अहमद अली।Ó परमारों के समय उदयपुर की पहाड़ी पर भी किले की सुरक्षा दीवार बनाई गई थी, जो आज भी सामने और गूगल मैप पर दिखाई देती है। इस पहाड़ को काटकर एलोरा की तर्ज पर रॉक टेंपल की परियोजना के अवशेष भी हैं, जो अधूरी रह गई। कटी हुई पहाड़ी पर आज भी मूर्तियां दिखाई देती हैं। लेकिन सोए हुए प्रशासन और इतिहास के प्रति मूर्छा से भरे जनप्रतिनिधियों की जुगलबंदी का ही नतीजा है कि यह पहाड़ी अब परमारों की विरासत की बजाए हरी-हरी चादरों की बहार में गुम हो रही है। नगर से लेकर पहाड़ की ऊंचाइयों तक पत्थरों पर हरी-हरी चादरें ओढ़ाई जा रही है और ताज्जुब है कि किसी को कुछ पता ही नहीं है। जो लोग उदयपुर गए हैं या इस इलाके के बाशिंदे हैं, वे जानते हैं कि महाराज उदयादित्य का बनवाया हुआ मंदिर पांच किलोमीटर दूर से दिखाई देने लगता है। जब आप मुख्य सड़क से उदयपुर की तरफ बढ़ते हैं तो मंदिर की भव्यता देखने लायक होती है। लेकिन जल्दी ही यह दिखाई देना बंद हो जाएगा क्योंकि मंदिर तक पहुंचने की एकमात्र संकरी गली की एक इमारत में जामा मस्जिद का बोर्ड टंग गया है। इसकी छोटी मीनारों पर लोहे और प्लाईवुड की बड़े आकार की मीनारें टोपी की तरह पहना दी गई हैं। अब मंदिर नहीं यह मस्जिद दिखाई देना शुरू हो जाएगी। धीमी रफ्तार के ये बदलाव गुनगुने पानी में बैठे मेंढक की तरह हैं, जिसका तापमान धीरे-धीरे बढ़ता रहता है। मेंढक अनुकूलन करता रहता है और उसी में उबलकर खत्म हो जाता है। विदिशा का ज्ञात इतिहास ढाई हजार साल का है। एक लंबी समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा है, लेकिन आज के समाज में उसका लेशमात्र नहीं है। वे विनाशकारी शक्तियां बचे-खुचे को लीलने में आंखों के सामने लगी हैं और हम पान चबाकर थूक रहे हैं। नेता अपने लिए किसी मालदार अवसर की घात में लगाए हुए हैं। अफसर तो ढाई-तीन साल के मेहमान हैं। यह सिर्फ उदयपुर के राजमहल के खसरा नंबर 822 की बात नहीं है। यह पूरे उदयपुर को नया जीवन देने का विषय है। वर्ना उदयपुर को अस्तपुर होते देर नहीं। मेरा मानना है कि पूरे जिले के सारे सामाजिक और कारोबारी संगठनों को दिल और जेब खोलकर जुटना चाहिए। हर महीने एक दिन उदयपुर को देना चाहिए। गली-गली में जाएं। प्राचीन द्वार-दरवाजों पर कान लगाएं। खंडहरों की सफाई करें। सब तरह का कूड़ा साफ करें। इतिहास उनसे कुछ कहना चाहता है। लेकिन क्या वे कुछ सुनना चाहते हैं?

हे देवी, अपनी व्यथा कहो!

'वह एक लंबी कथा है। सुख के छोटे और दुख के लंबे कालखंड की व्यथा कथा। मुझे परमारों के वो महान शिल्पी याद हैं जिन्होंने खदानों से लाए पत्थरों पर कई सालों के परिश्रम और कौशल से हमें उभारा था। वे चकित होकर देखते थे और लगातार प्रयास करते थे कि सौंदर्य में कोई कमी न रह जाए। प्रतिमा जब तक जीवंत न हो वह पाषाण ही है। जब इस स्थान पर मंदिर का निर्माण शुरू हुआ तो वर्षों तक उत्सव का वातावरण रहा। भूमिपूजन, शिलान्यास और गर्भगृह में अभिषेक का वह उत्सव, जब महाराज उदयादित्य स्वयं अपने मंत्रियों सहित सपरिवार यहां उपस्थित थे। धारा नगरी, उज्जयिनी, मंडपदुर्ग और भोजपाल से भी अनेक प्रमुख सामंत और शिल्पी अपने शिष्यों के साथ यहां आए थे। वे सब राजमहल के अतिथि थे। उदयपुर में एक नया अध्याय आरंभ हो रहा था। यह मंदिर किसी स्वर्ण मुद्रिका में जड़े दुर्लभ हीरे जैसा दूर से चमकता था।'-'तराशे गए हजारों शिलाखंडों और प्रतिमाओं की अंतिम नापजोख के बाद उन्हें सही जगह स्थापित करने के लिए अनगिनत कुशल कारीगर और दक्ष श्रमिक परमारों की कार्यशालाओं से यहां आए। वास्तुविद के शिविर में सबको अंतिम निर्देश दिए गए और देखते ही देखते मंदिर भूमि की सतह से ऊपर उठने लगा। आसपास के नगर-ग्रामों से लोग देखने आते थे। वे राजमहल की ओर इस आशा के साथ चले जाते थे कि महाराज उदयादित्य के दर्शन होंगे। चारों ओर दुर्ग की प्राचीरों से घिरे इस नगर की शोभा में चार चांद लगने वाले थे। दुर्ग की पश्चिम की दीवार के नीचे एक विशाल जलाशय बन रहा था। वह यहां से गुजरने वाले सैन्य और व्यवसायी काफिलों के साथ कृषकों और श्रद्धालुओं के लिए जल की आपूर्ति करेगा। खदानों से उच्च कोटि के चुने हुए शिलाखंड के परिवहन में भी उतने ही लोग लगे थे।'-'और यह अकेला मंदिर नहीं था। परमार वंश के सभी राजा कलाप्रिय थे। मंदिरों के निर्माण पूरे राज्य में चलते थे। भोजपुर की चट्टान से लेकर धारा नगरी, उज्जियनी, मंडपदुर्ग और ओंकारेश्वर तक कितने नाम गिनाएं। अगर परमारों के राज में कोई सबसे व्यस्त था तो वे आदरणीय शिल्पकार थे। वे पत्थरों पर आश्चर्य उकेरते थे। एक दिन हम सब देव प्रतिमाएं अपनी जगह पर स्थित हो गईं और मुख्य शिल्पी अवलोकन के लिए आए। मंदिर के समर्पण समारोह की शोभा ने लोगों को सरस्वती कंठाभरणों के उत्सव स्मरण करा दिए। उदयपुर की स्मृतियों में वैसा समारोह दूसरा नहीं हुआ। राजमहल से लेकर दुर्ग के सभी द्वारों, नगर के द्वारों और रास्तों, सभी मंदिरों को दीयों और पुष्पों से सजाने की व्यापक तैयारियां की गई थीं। भोज की वंश परंपरा गौरवान्वित थी। नीलकंठेश्वर महादेव मंदिर लोक को समर्पित हो रहा था। दूर-दूर के राजाओं ने अपने शुभकामना संदेश सहित यहां के शिल्पियों के समूहों की मांग भेजी थी। -'एक दिन दुर्ग के बाहर कुछ अनजाने चेहरे मंडराते हुए दिखे। उनका हुलिया और भाषा अलग थी। वे घेरकर हमले की तैयारी करते रहे। फिर हमने नगर में कोलाहल सुना। चीख-पुकार, आग और धुएं से उदयपुर का आसमान भर गया। कई लोग अपनी प्राण रक्षा के लिए ऊपर पहाड़ पर छिप गए। आक्रमणकारियों के समूह कुछ अजीब से नारे लगाते हुए मंदिर के चारों तरफ के रास्तों पर भर गए। राज्यों के लिए ये संघर्ष नए नहीं थे। हमने समझा नगर के नए स्वामी आ गए हैं। अब यहां परमार नहीं रहेंगे। संभवत: कलचुरियों ने आधिपत्य कर लिया है। किंतु यह हमारी चिंता का विषय नहीं था। हमें अपनी सुरक्षा या सम्मान को लेकर कोई चिंता नहीं थी। परमार हों या कलचुरि, चोल या राष्ट्रकूट, पल्लव या पांड्य या पाल वे सब भारतीय सनातन परंपरा के राजवंश थे? -'वे लोग चारों द्वारों से मंदिर की तरफ आए। क्यों न आते, आखिर यह उदयपुर का सबसे प्रमुख आकर्षण जो था। हमने मूर्तियों में से मुस्कुराकर उन्हें देखा। राज्य के विस्तार की कामना के वशीभूत वे विजयी मुद्रा में थे। उनकी तलवारों से खून टपक था। वे चारों तरफ घूम-घूमकर अपलक हम सब देवप्रतिमाओं को निहार रहे थे। उनकी भाषा समझ के परे थी। कुछ लोग मंदिर के तीनों प्रवेश द्वारों से भीतर जाने लगे। उनके हाथों में लोहे के छैनी और हथौड़े देखकर विचित्र लगा। कुछ ही देर में भीतर से ठोकने-पीटने की आवाजें सुनाई दीं। कुछ लोग मंदिर में ऊपर चढऩे लगे। इससे पहले कि मैं कुछ समझती मेरे ऊपर से कुछ पत्थर गिरना शुरू हो गए। -'विष्णु का हाथ उनके अस्त्रों सहित टूटकर गिरा, गणेश का मुकुट कई टुकड़ों में जाकर नीचे बिखर गया, काली के नरमुंड पाषाण के टुकड़ों में झरने लगे, यह पहचान पाना एक संकट का विषय बन गया कि किसका हाथ टूटा और किसका सिर। वे जहां तक ऊपर चढ़कर जा सकते थे, चढ़े और मूर्तियों पर प्रहार करते रहे। वे सबसे पहले चेहरों को विकृत कर रहे थे। फिर हाथ और पैरों पर एक अंतिम चोट। पूरे प्रांगण में विध्वंस का अकल्पनीय दृश्य देखा। चारों कोनों पर बने मंडप क्षत-विक्षत कर दिए गए। वे विक्षिप्त भयंकर शोर कर रहे थे। तभी एक जत्था मंदिर के भीतर संग्रहीत अमूल्य रत्नाभूषण और स्वर्ण मुद्राओं को लेकर बाहर आया। सब कुछ लूट लिया गया था। -'एक लंबी सी दाढ़ी वाले ने प्रार्थना में अपने हाथ आसमान की तरफ उठाए और उन विध्वंसकारियों को आशीष दिए। वह उनका सरदार या कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति था, जो बड़ी ठसक से वहां आया था। उसके सम्मान में तलवारें उठाकर सबने गले फाड़ दिए और कोई नारा लगाया। अब वे मंदिर के पीछे एक दीवार बनाने का प्रयास करने लगे। इसके लिए वो सारे पत्थर मंदिर से ही तोड़कर निकाल रहे थे। अपनी भाषा में दो शिलालेख बनाकर दो द्वारों में लगा दिए। एक पर लिखा नाम अब तक याद है-'मोहम्मद बिन तुगलक।' जब वह मेरी प्रतिमा के सामने आया तो देवता के एक कटे हुए सिर को जोर की ठोकर मारकर दो शब्द बोला-'बुतपरस्ती हराम।' मैं इसका अर्थ नहीं समझी, लेकिन उसकी घोर घृणा का अनुभव बहुत निकट से किया। उसने संकेत से किसी श्रमिक को बुलाया जो दूर प्रांगण में एक मंडप की मूर्तियों को तोड़ रहा था:--'अब वह मेरी तरफ संकेत कर रहा था। मैं पाषाण निश्छल और साक्षी भाव में थी। दो लोग मेरी तरफ चढऩे लगे। उनकी दाढिय़ां थीं। मूंछे नहीं थीं। वे ललचाई नजरों से ऊपर से नीचे तक मुझे देख रहे थे। एक अपना हाथ मेरे वक्ष पर फेरते हुए बोला-'हूर से कम नहीं मगर कम्बख्त पत्थर है।' बस यही मैंने सुना और मेरे मस्तक पर एक भरपूर प्रहार हुआ। एक गलाफाड़ नारे की गूंज- 'अल्लाहो-अकबर।' मेरी पाषाण देह पर उनके छैनी-हथौड़ों की ठक-ठक देर तक मुझे अनुभव होती रही। उस दिन जैसे उदयपुर का वैभव अस्त हो रहा था। -'उदयपुर अकेला कहां था? विदिशा में विजय मंदिर का वैभव तो पूरी तरह ध्वस्त कर दिया गया। इतिहास ने धार, उज्जैन और मंडप दुर्ग के सरस्वती कंठाभरणों को इबादतगाहों और मकबरों में बदलते हुए देखा। स्थापत्य के महान स्मारक उजाड़ टीलों या बदशक्ल इमारतों में बदल गए। याददाश्त पर धूल जमती गई। फिर जब जिसके मन में जहां आया वह वहां कब्जे जमाता गया। मैं अपने उसी शिलाखंड में स्थिर खंडित रूप में सदियों से यह सब देखती रही। किसी ने कहा देश दासता की बेडिय़ों में था। फिर कोई आया और बोला कि स्वतंत्र हो गया। दशकों हो गए। दासता तो समझी थी लेकिन इस स्वतंत्रता का अर्थ समझ में नहीं आया। क्या यह सच है कि देश स्वतंत्र हो गया?' (उदयपुर के नीलकंठेश्वर महादेव मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार के दाईं ओर लगभग छह फुट ऊंचाई पर यह देवी दुर्गा की खंडित प्रतिमा है। शीश काट डाला गया है। हाथ तोड़ दिए गए हैं। पैर भी नहीं हैं। देह पर चोटों के निशान अब तक हैं। यह व्यथा उन्हीं की है।) दरअसल उदयपुर की सचित्र सच्चाई प्रधानमंत्री, केंद्रीय पर्यटन मंत्री और मुख्यमंत्री को भी ट्वीट की गई थीं। एक अखबार ने मुहिम के रूप में अपनी जिम्मेदारी समझी और फौरन असर यह हुआ कि एक तहसीलदार को राजमहल के खंडहरों पर जाना पड़ गया। सवालों के साथ कुछ कैमरापर्संस भी वहां गए। अब आगे का दृश्य मजेदार है। एक कैमरापर्सन ने सवाल पूछा तो एक साहब सीधे बादशाह जहांगीर के दरबार में जा पहुंचे और बताया कि जहांगीर ने इस महल की संगे-बुनियाद उदयपुर में रखी थी। शाहजहां के समय यह बनकर तैयार हुआ और काजी साहब के खानदान को दे दिया गया ताकि वे मस्जिद में नमाज पढ़ाते रहें। काजी साहब कहीं शहर में बस गए और महल में मदरसा खोल दिया। अगर जहांगीर या शाहजहां ने इन्हें यह जगह दी है और यह इनकी निजी संपत्ति मान ली जाती है तो सरकार को वे 84 गांव भी इन्हें देने होंगे, जिनकी जमींदारी इनके अनुसार इन्हें मुगलों ने दी थी। किले पर अपनी निजी संपत्ति का ऐलान करने वाले साइनबोर्ड की सफाई में इनके पास जहांगीर-शाहजहां का यही किस्सा है। शायद उनके संज्ञान में यह नहीं है कि 15 अगस्त 1947 के बाद ही निजाम नहीं बदला है। 1857 में अंग्रेज ही आखिरी मुगल को रंगून रवाना कर चुके थे। अब लालकिले पर मुगलों का कोई दावा नहीं है। न कोई मुगल हैं। वो इरफान हबीबों के ख्यालों में रोशन हैं। और अब तहसीलदार दृश्य में आते हैं। वे कह रहे हैं कि कल किसी ने गेट पर निजी संपत्ति का बोर्ड लगा दिया था, उसे हटा दिया गया है। यह साढ़े तीन बीघा में फैला राजमहल पुरातत्व विभाग में आता है। राजस्व विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार यह निजी संपत्ति नहीं है। तहसीलदार शायद जीवनकाल में पहली बार इस गली में फटके। वह बोर्ड कल नहीं लटका था। कई सालों से था। चार दिन पहले इतिहासकार डॉ. सुरेश मिश्र दिल्ली से आकर उदयपुर के मुआयने में वह देखकर लौटे थे। तहसीलदार को अपने क्षेत्रीय पटवारी से पूछना चाहिए कि ऐेसे कितने पुराने खंडहरों पर कौन कब्जा किए हुए है, जिसके बारे में अभी जानकारियां आना बाकी हैं? फिलहाल राजमहल के खंडहरों में मदरसा संचालित है, जहां मुस्लिम बच्चों को मजहबी तालीम दी जाती होगी। मुमकिन है उन्हें उदयपुर के इतिहास के बारे में भी कुछ ज्ञान दिया जाता होगा। पता नहीं मौलवी को खुद उदयपुर का कितना असल इतिहास पता होगा और कितना वे जहांगीर से शुरू होकर काजी पर खत्म कर देते होंगे। क्या बच्चे कभी पूछते होंगे कि उदयपुर की सबसे शानदार पहचान यह हजार साल पुराना बुतखाना किसने बनाया था? जब वह बुतखाना बन रहा था तब हमारे पुरखे यहां कहां थे, क्योंकि तब तो इस्लाम की डाक यहां के किसी पते पर आई नहीं थी? तब हमारे पुरखे उदयपुर में किस असल नाम से क्या करते थे? फिर जहांगीर (सलीम बल्द अकबर, जो नशेड़ी शहजादों में से एक था) कब, कहां से और क्यों चले आए? मंदिर की दीवारों पर तोड़ी गई मूर्तियों में किसका हाथ है और एक सबसे अहम सवाल यह कि यह मंदिर बच कैसे गया? इसका भी वही हाल क्यों नहीं हो पाया जो विदिशा में विजय मंदिर का किया गया? क्या हमलावरों का प्रतिकार करने वाले स्थानीय नागरिक भारी पड़ गए थे जो मामूली तोडफ़ोड़ के बाद ही यह मंदिर बचा लिया गया? मदरसे में पता नहीं बच्चे ऐसे सवाल करते होंगे या नहीं या जो मौलवी ने बता दिया वही इतिहास है कि जहांगीर ने संगे बुनियाद रखी थी। परमार वंश के राजा उदयादित्य के मंदिर में तीनों द्वारों के पत्थरों पर बीस से ज्यादा शिलालेख हैं, जो उस समय की महत्वपूर्ण जानकारियां देते हैं। यह तब की बात है जब जहांगीर तो छोडि़ए बाबर के बापदादों के फरगाना में भी अते-पते नहीं होंगे। यह ग्यारहवीं सदी की बात है। पत्रिका अखबार में प्रमुखता से मसला सामने आने के बाद विदिशा शहर के प्रबुद्ध लोगों ने कलेक्टर के नाम एक ज्ञापन दिया है। किसी ज्ञापन की प्रतीक्षा के बगैर कलेक्टर को खुद जाकर देखना चाहिए और कानूनी कार्रवाई कागजों पर नहीं करनी चाहिए। उदयपुर के चप्पे-चप्पे के प्राचीन स्मारकों के संरक्षण की कार्ययोजना बनानी चाहिए और अगले तबादले के पहले उसे अमल में लाना चाहिए।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मप्र के सूचना आयुक्त हैं)

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